क़ुरआन का पृष्ठ 536 पढ़ें

मुसहफ़ का पृष्ठ 536 26 आयतों को समाहित करता है। यह जुज़ 27, हिज़्ब 54 में है।

05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया

क़ुरआन में पृष्ठ 536

26
आयतें
27
जुज़
54
हिज़्ब
1
सूरह

पृष्ठ 536 में सूरह

الواقعة · जुज़ 27
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जुज़ 27
पृष्ठ 536
سورة الواقعة
जुज़ 27 81.2% (324/399)
हिज़्ब 54 63.1% (128/203)

ثُمَّ إِنَّكُمْ أَيُّهَا ٱلضَّآلُّونَ ٱلْمُكَذِّبُونَ ﴿51﴾

फिर तुमको बेशक ऐ गुमराहों झुठलाने वालों

لَـَٔاكِلُونَ مِن شَجَرٍۢ مِّن زَقُّومٍۢ ﴿52﴾

यक़ीनन (जहन्नुम में) थोहड़ के दरख्तों में से खाना होगा

فَمَالِـُٔونَ مِنْهَا ٱلْبُطُونَ ﴿53﴾

तो तुम लोगों को उसी से (अपना) पेट भरना होगा

فَشَـٰرِبُونَ عَلَيْهِ مِنَ ٱلْحَمِيمِ ﴿54﴾

फिर उसके ऊपर खौलता हुआ पानी पीना होगा

فَشَـٰرِبُونَ شُرْبَ ٱلْهِيمِ ﴿55﴾

और पियोगे भी तो प्यासे ऊँट का सा (डग डगा के) पीना

هَـٰذَا نُزُلُهُمْ يَوْمَ ٱلدِّينِ ﴿56﴾

क़यामत के दिन यही उनकी मेहमानी होगी

نَحْنُ خَلَقْنَـٰكُمْ فَلَوْلَا تُصَدِّقُونَ ﴿57﴾

तुम लोगों को (पहली बार भी) हम ही ने पैदा किया है

أَفَرَءَيْتُم مَّا تُمْنُونَ ﴿58﴾

फिर तुम लोग (दोबार की) क्यों नहीं तस्दीक़ करते

ءَأَنتُمْ تَخْلُقُونَهُۥٓ أَمْ نَحْنُ ٱلْخَـٰلِقُونَ ﴿59﴾

तो जिस नुत्फे क़ो तुम (औरतों के रहम में डालते हो) क्या तुमने देख भाल लिया है क्या तुम उससे आदमी बनाते हो या हम बनाते हैं

نَحْنُ قَدَّرْنَا بَيْنَكُمُ ٱلْمَوْتَ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ ﴿60﴾

हमने तुम लोगों में मौत को मुक़र्रर कर दिया है और हम उससे आजिज़ नहीं हैं

عَلَىٰٓ أَن نُّبَدِّلَ أَمْثَـٰلَكُمْ وَنُنشِئَكُمْ فِى مَا لَا تَعْلَمُونَ ﴿61﴾

कि तुम्हारे ऐसे और लोग बदल डालें और तुम लोगों को इस (सूरत) में पैदा करें जिसे तुम मुत्तलक़ नहीं जानते

وَلَقَدْ عَلِمْتُمُ ٱلنَّشْأَةَ ٱلْأُولَىٰ فَلَوْلَا تَذَكَّرُونَ ﴿62﴾

और तुमने पैहली पैदाइश तो समझ ही ली है (कि हमने की) फिर तुम ग़ौर क्यों नहीं करते

أَفَرَءَيْتُم مَّا تَحْرُثُونَ ﴿63﴾

भला देखो तो कि जो कुछ तुम लोग बोते हो क्या

ءَأَنتُمْ تَزْرَعُونَهُۥٓ أَمْ نَحْنُ ٱلزَّٰرِعُونَ ﴿64﴾

तुम लोग उसे उगाते हो या हम उगाते हैं अगर हम चाहते

لَوْ نَشَآءُ لَجَعَلْنَـٰهُ حُطَـٰمًۭا فَظَلْتُمْ تَفَكَّهُونَ ﴿65﴾

तो उसे चूर चूर कर देते तो तुम बातें ही बनाते रह जाते

إِنَّا لَمُغْرَمُونَ ﴿66﴾

कि (हाए) हम तो (मुफ्त) तावान में फॅसे (नहीं)

بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ ﴿67﴾

हम तो बदनसीब हैं

أَفَرَءَيْتُمُ ٱلْمَآءَ ٱلَّذِى تَشْرَبُونَ ﴿68﴾

तो क्या तुमने पानी पर भी नज़र डाली जो (दिन रात) पीते हो

ءَأَنتُمْ أَنزَلْتُمُوهُ مِنَ ٱلْمُزْنِ أَمْ نَحْنُ ٱلْمُنزِلُونَ ﴿69﴾

क्या उसको बादल से तुमने बरसाया है या हम बरसाते हैं

لَوْ نَشَآءُ جَعَلْنَـٰهُ أُجَاجًۭا فَلَوْلَا تَشْكُرُونَ ﴿70﴾

अगर हम चाहें तो उसे खारी बना दें तो तुम लोग यक्र क्यों नहीं करते

أَفَرَءَيْتُمُ ٱلنَّارَ ٱلَّتِى تُورُونَ ﴿71﴾

तो क्या तुमने आग पर भी ग़ौर किया जिसे तुम लोग लकड़ी से निकालते हो

ءَأَنتُمْ أَنشَأْتُمْ شَجَرَتَهَآ أَمْ نَحْنُ ٱلْمُنشِـُٔونَ ﴿72﴾

क्या उसके दरख्त को तुमने पैदा किया या हम पैदा करते हैं

نَحْنُ جَعَلْنَـٰهَا تَذْكِرَةًۭ وَمَتَـٰعًۭا لِّلْمُقْوِينَ ﴿73﴾

हमने आग को (जहन्नुम की) याद देहानी और मुसाफिरों के नफे के (वास्ते पैदा किया)

فَسَبِّحْ بِٱسْمِ رَبِّكَ ٱلْعَظِيمِ ﴿74﴾

तो (ऐ रसूल) तुम अपने बुज़ुर्ग परवरदिगार की तस्बीह करो

۞ فَلَآ أُقْسِمُ بِمَوَٰقِعِ ٱلنُّجُومِ ﴿75﴾

तो मैं तारों के मनाज़िल की क़सम खाता हूँ

وَإِنَّهُۥ لَقَسَمٌۭ لَّوْ تَعْلَمُونَ عَظِيمٌ ﴿76﴾

और अगर तुम समझो तो ये बड़ी क़सम है

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