क़ुरआन का पृष्ठ 567 पढ़ें

मुसहफ़ का पृष्ठ 567 26 आयतों को समाहित करता है। यह जुज़ 29, हिज़्ब 57 में है।

05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया

क़ुरआन में पृष्ठ 567

26
आयतें
29
जुज़
57
हिज़्ब
1
सूरह

पृष्ठ 567 में सूरह

الحاقة · जुज़ 29
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जुज़ 29
पृष्ठ 567
سورة الحاقة
जुज़ 29 20.9% (90/431)
हिज़्ब 57 43.7% (90/206)

وَجَآءَ فِرْعَوْنُ وَمَن قَبْلَهُۥ وَٱلْمُؤْتَفِكَـٰتُ بِٱلْخَاطِئَةِ ﴿9﴾

और फिरऔन और जो लोग उससे पहले थे और वह लोग (क़ौमे लूत) जो उलटी हुई बस्तियों के रहने वाले थे सब गुनाह के काम करते थे

فَعَصَوْا۟ رَسُولَ رَبِّهِمْ فَأَخَذَهُمْ أَخْذَةًۭ رَّابِيَةً ﴿10﴾

तो उन लोगों ने अपने परवरदिगार के रसूल की नाफ़रमानी की तो ख़ुदा ने भी उनकी बड़ी सख्ती से ले दे कर डाली

إِنَّا لَمَّا طَغَا ٱلْمَآءُ حَمَلْنَـٰكُمْ فِى ٱلْجَارِيَةِ ﴿11﴾

जब पानी चढ़ने लगा तो हमने तुमको कशती पर सवार किया

لِنَجْعَلَهَا لَكُمْ تَذْكِرَةًۭ وَتَعِيَهَآ أُذُنٌۭ وَٰعِيَةٌۭ ﴿12﴾

ताकि हम उसे तुम्हारे लिए यादगार बनाएं और उसे याद रखने वाले कान सुनकर याद रखें

فَإِذَا نُفِخَ فِى ٱلصُّورِ نَفْخَةٌۭ وَٰحِدَةٌۭ ﴿13﴾

फिर जब सूर में एक (बार) फूँक मार दी जाएगी

وَحُمِلَتِ ٱلْأَرْضُ وَٱلْجِبَالُ فَدُكَّتَا دَكَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ ﴿14﴾

और ज़मीन और पहाड़ उठाकर एक बारगी (टकरा कर) रेज़ा रेज़ा कर दिए जाएँगे तो उस रोज़ क़यामत आ ही जाएगी

فَيَوْمَئِذٍۢ وَقَعَتِ ٱلْوَاقِعَةُ ﴿15﴾

और आसमान फट जाएगा

وَٱنشَقَّتِ ٱلسَّمَآءُ فَهِىَ يَوْمَئِذٍۢ وَاهِيَةٌۭ ﴿16﴾

तो वह उस दिन बहुत फुस फुसा होगा और फ़रिश्ते उनके किनारे पर होंगे

وَٱلْمَلَكُ عَلَىٰٓ أَرْجَآئِهَا ۚ وَيَحْمِلُ عَرْشَ رَبِّكَ فَوْقَهُمْ يَوْمَئِذٍۢ ثَمَـٰنِيَةٌۭ ﴿17﴾

और तुम्हारे परवरदिगार के अर्श को उस दिन आठ फ़रिश्ते अपने सरों पर उठाए होंगे

يَوْمَئِذٍۢ تُعْرَضُونَ لَا تَخْفَىٰ مِنكُمْ خَافِيَةٌۭ ﴿18﴾

उस दिन तुम सब के सब (ख़ुदा के सामने) पेश किए जाओगे और तुम्हारी कोई पोशीदा बात छुपी न रहेगी

فَأَمَّا مَنْ أُوتِىَ كِتَـٰبَهُۥ بِيَمِينِهِۦ فَيَقُولُ هَآؤُمُ ٱقْرَءُوا۟ كِتَـٰبِيَهْ ﴿19﴾

तो जिसको (उसका नामए आमाल) दाहिने हाथ में दिया जाएगा तो वह (लोगो से) कहेगा लीजिए मेरा नामए आमाल पढ़िए

إِنِّى ظَنَنتُ أَنِّى مُلَـٰقٍ حِسَابِيَهْ ﴿20﴾

तो मैं तो जानता था कि मुझे मेरा हिसाब (किताब) ज़रूर मिलेगा

فَهُوَ فِى عِيشَةٍۢ رَّاضِيَةٍۢ ﴿21﴾

फिर वह दिल पसन्द ऐश में होगा

فِى جَنَّةٍ عَالِيَةٍۢ ﴿22﴾

बड़े आलीशान बाग़ में

قُطُوفُهَا دَانِيَةٌۭ ﴿23﴾

जिनके फल बहुत झुके हुए क़रीब होंगे

كُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ هَنِيٓـًٔۢا بِمَآ أَسْلَفْتُمْ فِى ٱلْأَيَّامِ ٱلْخَالِيَةِ ﴿24﴾

जो कारगुज़ारियाँ तुम गुज़िशता अय्याम में करके आगे भेज चुके हो उसके सिले में मज़े से खाओ पियो

وَأَمَّا مَنْ أُوتِىَ كِتَـٰبَهُۥ بِشِمَالِهِۦ فَيَقُولُ يَـٰلَيْتَنِى لَمْ أُوتَ كِتَـٰبِيَهْ ﴿25﴾

और जिसका नामए आमाल उनके बाएँ हाथ में दिया जाएगा तो वह कहेगा ऐ काश मुझे मेरा नामए अमल न दिया जाता

وَلَمْ أَدْرِ مَا حِسَابِيَهْ ﴿26﴾

और मुझे न मालूल होता कि मेरा हिसाब क्या है

يَـٰلَيْتَهَا كَانَتِ ٱلْقَاضِيَةَ ﴿27﴾

ऐ काश मौत ने (हमेशा के लिए मेरा) काम तमाम कर दिया होता

مَآ أَغْنَىٰ عَنِّى مَالِيَهْ ۜ ﴿28﴾

(अफ़सोस) मेरा माल मेरे कुछ भी काम न आया

هَلَكَ عَنِّى سُلْطَـٰنِيَهْ ﴿29﴾

(हाए) मेरी सल्तनत ख़ाक में मिल गयी (फिर हुक्म होगा)

خُذُوهُ فَغُلُّوهُ ﴿30﴾

इसे गिरफ्तार करके तौक़ पहना दो

ثُمَّ ٱلْجَحِيمَ صَلُّوهُ ﴿31﴾

फिर इसे जहन्नुम में झोंक दो,

ثُمَّ فِى سِلْسِلَةٍۢ ذَرْعُهَا سَبْعُونَ ذِرَاعًۭا فَٱسْلُكُوهُ ﴿32﴾

फिर एक ज़ंजीर में जिसकी नाप सत्तर गज़ की है उसे ख़ूब जकड़ दो

إِنَّهُۥ كَانَ لَا يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ ٱلْعَظِيمِ ﴿33﴾

(क्यों कि) ये न तो बुज़ुर्ग ख़ुदा ही पर ईमान लाता था और न मोहताज के खिलाने पर आमादा (लोगों को) करता था

وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ ﴿34﴾

तो आज न उसका कोई ग़मख्वार है

بسم الله الرحمن الرحيم गुरु 4 रबी अल-सानी
الخميس 4 ربيع الآخر
هلال متزايد बढ़ता हुआ अर्धचंद्र दिन 5.8 / 29.5
रोशनी 33%
9 दिनों में पूर्णिमा
سبحان الله وبحمده अल्लाह की महिमा और स्तुति है