क़ुरआन का पृष्ठ 526 पढ़ें

मुसहफ़ का पृष्ठ 526 26 आयतों को समाहित करता है। यह जुज़ 27, हिज़्ब 53 में है।

05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया

क़ुरआन में पृष्ठ 526

26
आयतें
27
जुज़
53
हिज़्ब
1
सूरह

पृष्ठ 526 में सूरह

النجم · जुज़ 27
जुज़ 27
पृष्ठ 526
سورة النجم
जुज़ 27 19.8% (79/399)
हिज़्ब 53 40.3% (79/196)

وَٱلنَّجْمِ إِذَا هَوَىٰ ﴿١﴾

तारे की क़सम जब टूटा

مَا ضَلَّ صَاحِبُكُمْ وَمَا غَوَىٰ ﴿٢﴾

कि तुम्हारे रफ़ीक़ (मोहम्मद) न गुमराह हुए और न बहके

وَمَا يَنطِقُ عَنِ ٱلْهَوَىٰٓ ﴿٣﴾

और वह तो अपनी नफ़सियानी ख्वाहिश से कुछ भी नहीं कहते

إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْىٌۭ يُوحَىٰ ﴿٤﴾

ये तो बस वही है जो भेजी जाती है

عَلَّمَهُۥ شَدِيدُ ٱلْقُوَىٰ ﴿٥﴾

इनको निहायत ताक़तवर (फ़रिश्ते जिबरील) ने तालीम दी है

ذُو مِرَّةٍۢ فَٱسْتَوَىٰ ﴿٦﴾

जो बड़ा ज़बरदस्त है और जब ये (आसमान के) ऊँचे (मुशरक़ो) किनारे पर था तो वह अपनी (असली सूरत में) सीधा खड़ा हुआ

وَهُوَ بِٱلْأُفُقِ ٱلْأَعْلَىٰ ﴿٧﴾

फिर करीब हो (और आगे) बढ़ा

ثُمَّ دَنَا فَتَدَلَّىٰ ﴿٨﴾

(फिर जिबरील व मोहम्मद में) दो कमान का फ़ासला रह गया

فَكَانَ قَابَ قَوْسَيْنِ أَوْ أَدْنَىٰ ﴿٩﴾

बल्कि इससे भी क़रीब था

فَأَوْحَىٰٓ إِلَىٰ عَبْدِهِۦ مَآ أَوْحَىٰ ﴿١٠﴾

ख़ुदा ने अपने बन्दे की तरफ जो 'वही' भेजी सो भेजी

مَا كَذَبَ ٱلْفُؤَادُ مَا رَأَىٰٓ ﴿١١﴾

तो जो कुछ उन्होने देखा उनके दिल ने झूठ न जाना

أَفَتُمَـٰرُونَهُۥ عَلَىٰ مَا يَرَىٰ ﴿١٢﴾

तो क्या वह (रसूल) जो कुछ देखता है तुम लोग उसमें झगड़ते हो

وَلَقَدْ رَءَاهُ نَزْلَةً أُخْرَىٰ ﴿١٣﴾

और उन्होने तो उस (जिबरील) को एक बार (शबे मेराज) और देखा है

عِندَ سِدْرَةِ ٱلْمُنتَهَىٰ ﴿١٤﴾

सिदरतुल मुनतहा के नज़दीक

عِندَهَا جَنَّةُ ٱلْمَأْوَىٰٓ ﴿١٥﴾

उसी के पास तो रहने की बेहिश्त है

إِذْ يَغْشَى ٱلسِّدْرَةَ مَا يَغْشَىٰ ﴿١٦﴾

जब छा रहा था सिदरा पर जो छा रहा था

مَا زَاغَ ٱلْبَصَرُ وَمَا طَغَىٰ ﴿١٧﴾

(उस वक्त भी) उनकी ऑंख न तो और तरफ़ माएल हुई और न हद से आगे बढ़ी

لَقَدْ رَأَىٰ مِنْ ءَايَـٰتِ رَبِّهِ ٱلْكُبْرَىٰٓ ﴿١٨﴾

और उन्होने यक़ीनन अपने परवरदिगार (की क़ुदरत) की बड़ी बड़ी निशानियाँ देखीं

أَفَرَءَيْتُمُ ٱللَّـٰتَ وَٱلْعُزَّىٰ ﴿١٩﴾

तो भला तुम लोगों ने लात व उज्ज़ा और तीसरे पिछले मनात को देखा

وَمَنَوٰةَ ٱلثَّالِثَةَ ٱلْأُخْرَىٰٓ ﴿٢٠﴾

(भला ये ख़ुदा हो सकते हैं)

أَلَكُمُ ٱلذَّكَرُ وَلَهُ ٱلْأُنثَىٰ ﴿٢١﴾

क्या तुम्हारे तो बेटे हैं और उसके लिए बेटियाँ

تِلْكَ إِذًۭا قِسْمَةٌۭ ضِيزَىٰٓ ﴿٢٢﴾

ये तो बहुत बेइन्साफ़ी की तक़सीम है

إِنْ هِىَ إِلَّآ أَسْمَآءٌۭ سَمَّيْتُمُوهَآ أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُم مَّآ أَنزَلَ ٱللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَـٰنٍ ۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَمَا تَهْوَى ٱلْأَنفُسُ ۖ وَلَقَدْ جَآءَهُم مِّن رَّبِّهِمُ ٱلْهُدَىٰٓ ﴿٢٣﴾

ये तो बस सिर्फ नाम ही नाम है जो तुमने और तुम्हारे बाप दादाओं ने गढ़ लिए हैं, ख़ुदा ने तो इसकी कोई सनद नाज़िल नहीं की ये लोग तो बस अटकल और अपनी नफ़सानी ख्वाहिश के पीछे चल रहे हैं हालॉकि उनके पास उनके परवरदिगार की तरफ से हिदायत भी आ चुकी है

أَمْ لِلْإِنسَـٰنِ مَا تَمَنَّىٰ ﴿٢٤﴾

क्या जिस चीज़ की इन्सान तमन्ना करे वह उसे ज़रूर मिलती है

فَلِلَّهِ ٱلْـَٔاخِرَةُ وَٱلْأُولَىٰ ﴿٢٥﴾

आख़ेरत और दुनिया तो ख़ास ख़ुदा ही के एख्तेयार में हैं

۞ وَكَم مِّن مَّلَكٍۢ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ لَا تُغْنِى شَفَـٰعَتُهُمْ شَيْـًٔا إِلَّا مِنۢ بَعْدِ أَن يَأْذَنَ ٱللَّهُ لِمَن يَشَآءُ وَيَرْضَىٰٓ ﴿٢٦﴾

और आसमानों में बहुत से फरिश्ते हैं जिनकी सिफ़ारिश कुछ भी काम न आती, मगर ख़ुदा जिसके लिए चाहे इजाज़त दे दे और पसन्द करे उसके बाद (सिफ़ारिश कर सकते हैं)

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