क़ुरआन का पृष्ठ 594 पढ़ें

मुसहफ़ का पृष्ठ 594 27 आयतों को समाहित करता है। यह जुज़ 30, हिज़्ब 60 में है।

05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया

क़ुरआन में पृष्ठ 594

27
आयतें
30
जुज़
60
हिज़्ब
2
सूरह

पृष्ठ 594 में सूरह

الفجر · जुज़ 30
जुज़ 30
पृष्ठ 594
سورة الفجر
जुज़ 30 61.0% (344/564)
हिज़्ब 60 23.6% (68/288)

يَقُولُ يَـٰلَيْتَنِى قَدَّمْتُ لِحَيَاتِى ﴿٢٤﴾

(उस वक्त) क़हेगा कि काश मैने अपनी (इस) ज़िन्दगी के वास्ते कुछ पहले भेजा होता

فَيَوْمَئِذٍۢ لَّا يُعَذِّبُ عَذَابَهُۥٓ أَحَدٌۭ ﴿٢٥﴾

तो उस दिन ख़ुदा ऐसा अज़ाब करेगा कि किसी ने वैसा अज़ाब न किया होगा

وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُۥٓ أَحَدٌۭ ﴿٢٦﴾

और न कोई उसके जकड़ने की तरह जकड़ेगा

يَـٰٓأَيَّتُهَا ٱلنَّفْسُ ٱلْمُطْمَئِنَّةُ ﴿٢٧﴾

(और कुछ लोगों से कहेगा) ऐ इत्मेनान पाने वाली जान

ٱرْجِعِىٓ إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةًۭ مَّرْضِيَّةًۭ ﴿٢٨﴾

अपने परवरदिगार की तरफ़ चल तू उससे ख़ुश वह तुझ से राज़ी

فَٱدْخُلِى فِى عِبَـٰدِى ﴿٢٩﴾

तो मेरे (ख़ास) बन्दों में शामिल हो जा

وَٱدْخُلِى جَنَّتِى ﴿٣٠﴾

और मेरे बेहिश्त में दाख़िल हो जा

لَآ أُقْسِمُ بِهَـٰذَا ٱلْبَلَدِ ﴿١﴾

मुझे इस शहर (मक्का) की कसम

وَأَنتَ حِلٌّۢ بِهَـٰذَا ٱلْبَلَدِ ﴿٢﴾

और तुम इसी शहर में तो रहते हो

وَوَالِدٍۢ وَمَا وَلَدَ ﴿٣﴾

और (तुम्हारे) बाप (आदम) और उसकी औलाद की क़सम

لَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ فِى كَبَدٍ ﴿٤﴾

हमने इन्सान को मशक्क़त में (रहने वाला) पैदा किया है

أَيَحْسَبُ أَن لَّن يَقْدِرَ عَلَيْهِ أَحَدٌۭ ﴿٥﴾

क्या वह ये समझता है कि उस पर कोई काबू न पा सकेगा

يَقُولُ أَهْلَكْتُ مَالًۭا لُّبَدًا ﴿٦﴾

वह कहता है कि मैने अलग़ारों माल उड़ा दिया

أَيَحْسَبُ أَن لَّمْ يَرَهُۥٓ أَحَدٌ ﴿٧﴾

क्या वह ये ख्याल रखता है कि उसको किसी ने देखा ही नहीं

أَلَمْ نَجْعَل لَّهُۥ عَيْنَيْنِ ﴿٨﴾

क्या हमने उसे दोनों ऑंखें और ज़बान

وَلِسَانًۭا وَشَفَتَيْنِ ﴿٩﴾

और दोनों लब नहीं दिए (ज़रूर दिए)

وَهَدَيْنَـٰهُ ٱلنَّجْدَيْنِ ﴿١٠﴾

और उसको (अच्छी बुरी) दोनों राहें भी दिखा दीं

فَلَا ٱقْتَحَمَ ٱلْعَقَبَةَ ﴿١١﴾

फिर वह घाटी पर से होकर (क्यों) नहीं गुज़रा

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْعَقَبَةُ ﴿١٢﴾

और तुमको क्या मालूम कि घाटी क्या है

فَكُّ رَقَبَةٍ ﴿١٣﴾

किसी (की) गर्दन का (गुलामी या कर्ज से) छुड़ाना

أَوْ إِطْعَـٰمٌۭ فِى يَوْمٍۢ ذِى مَسْغَبَةٍۢ ﴿١٤﴾

या भूख के दिन रिश्तेदार यतीम या ख़ाकसार

يَتِيمًۭا ذَا مَقْرَبَةٍ ﴿١٥﴾

मोहताज को

أَوْ مِسْكِينًۭا ذَا مَتْرَبَةٍۢ ﴿١٦﴾

खाना खिलाना

ثُمَّ كَانَ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْمَرْحَمَةِ ﴿١٧﴾

फिर तो उन लोगों में (शामिल) हो जाता जो ईमान लाए और सब्र की नसीहत और तरस खाने की वसीयत करते रहे

أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ ﴿١٨﴾

यही लोग ख़ुश नसीब हैं

وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا هُمْ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ ﴿١٩﴾

और जिन लोगों ने हमारी आयतों से इन्कार किया है यही लोग बदबख्त हैं

عَلَيْهِمْ نَارٌۭ مُّؤْصَدَةٌۢ ﴿٢٠﴾

कि उनको आग में डाल कर हर तरफ से बन्द कर दिया जाएगा

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