क़ुरआन का रुकू 514 पढ़ें

रुकू 514 सूरह Al-Insan (आयत 1 से 22) से है। इसमें 22 आयतें हैं और यह जुज़ 29 में है।

05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया

क़ुरआन में रुकू 514

22
आयतें
1
सूरह
29
जुज़
v.1 – v.22
आयतें

रुकू 514 में सूरह

الانسان · जुज़ 29
पृष्ठ 578
रुकू 514
سورة القيامة
जुज़ 29 81.2% (350/431)
हिज़्ब 58 64.0% (144/225)

هَلْ أَتَىٰ عَلَى ٱلْإِنسَـٰنِ حِينٌۭ مِّنَ ٱلدَّهْرِ لَمْ يَكُن شَيْـًۭٔا مَّذْكُورًا ﴿١﴾

बेशक इन्सान पर एक ऐसा वक्त अा चुका है कि वह कोई चीज़ क़ाबिले ज़िक्र न था

إِنَّا خَلَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ مِن نُّطْفَةٍ أَمْشَاجٍۢ نَّبْتَلِيهِ فَجَعَلْنَـٰهُ سَمِيعًۢا بَصِيرًا ﴿٢﴾

हमने इन्सान को मख़लूत नुत्फे से पैदा किया कि उसे आज़माये तो हमने उसे सुनता देखता बनाया

إِنَّا هَدَيْنَـٰهُ ٱلسَّبِيلَ إِمَّا شَاكِرًۭا وَإِمَّا كَفُورًا ﴿٣﴾

और उसको रास्ता भी दिखा दिया (अब वह) ख्वाह शुक्र गुज़ार हो ख्वाह नाशुक्रा

إِنَّآ أَعْتَدْنَا لِلْكَـٰفِرِينَ سَلَـٰسِلَا۟ وَأَغْلَـٰلًۭا وَسَعِيرًا ﴿٤﴾

हमने काफ़िरों के ज़ंजीरे, तौक और दहकती हुई आग तैयार कर रखी है

إِنَّ ٱلْأَبْرَارَ يَشْرَبُونَ مِن كَأْسٍۢ كَانَ مِزَاجُهَا كَافُورًا ﴿٥﴾

बेशक नेकोकार लोग शराब के वह सागर पियेंगे जिसमें काफूर की आमेज़िश होगी ये एक चश्मा है जिसमें से ख़ुदा के (ख़ास) बन्दे पियेंगे

عَيْنًۭا يَشْرَبُ بِهَا عِبَادُ ٱللَّهِ يُفَجِّرُونَهَا تَفْجِيرًۭا ﴿٦﴾

और जहाँ चाहेंगे बहा ले जाएँगे

يُوفُونَ بِٱلنَّذْرِ وَيَخَافُونَ يَوْمًۭا كَانَ شَرُّهُۥ مُسْتَطِيرًۭا ﴿٧﴾

ये वह लोग हैं जो नज़रें पूरी करते हैं और उस दिन से जिनकी सख्ती हर तरह फैली होगी डरते हैं

وَيُطْعِمُونَ ٱلطَّعَامَ عَلَىٰ حُبِّهِۦ مِسْكِينًۭا وَيَتِيمًۭا وَأَسِيرًا ﴿٨﴾

और उसकी मोहब्बत में मोहताज और यतीम और असीर को खाना खिलाते हैं

إِنَّمَا نُطْعِمُكُمْ لِوَجْهِ ٱللَّهِ لَا نُرِيدُ مِنكُمْ جَزَآءًۭ وَلَا شُكُورًا ﴿٩﴾

(और कहते हैं कि) हम तो तुमको बस ख़ालिस ख़ुदा के लिए खिलाते हैं हम न तुम से बदले के ख़ास्तगार हैं और न शुक्र गुज़ारी के

إِنَّا نَخَافُ مِن رَّبِّنَا يَوْمًا عَبُوسًۭا قَمْطَرِيرًۭا ﴿١٠﴾

हमको तो अपने परवरदिगार से उस दिन का डर है जिसमें मुँह बन जाएँगे (और) चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती होंगी

فَوَقَىٰهُمُ ٱللَّهُ شَرَّ ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمِ وَلَقَّىٰهُمْ نَضْرَةًۭ وَسُرُورًۭا ﴿١١﴾

तो ख़ुदा उन्हें उस दिन की तकलीफ़ से बचा लेगा और उनको ताज़गी और ख़ुशदिली अता फरमाएगा

وَجَزَىٰهُم بِمَا صَبَرُوا۟ جَنَّةًۭ وَحَرِيرًۭا ﴿١٢﴾

और उनके सब्र के बदले (बेहिश्त के) बाग़ और रेशम (की पोशाक) अता फ़रमाएगा

مُّتَّكِـِٔينَ فِيهَا عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ ۖ لَا يَرَوْنَ فِيهَا شَمْسًۭا وَلَا زَمْهَرِيرًۭا ﴿١٣﴾

वहाँ वह तख्तों पर तकिए लगाए (बैठे) होंगे न वहाँ (आफताब की) धूप देखेंगे और न शिद्दत की सर्दी

وَدَانِيَةً عَلَيْهِمْ ظِلَـٰلُهَا وَذُلِّلَتْ قُطُوفُهَا تَذْلِيلًۭا ﴿١٤﴾

और घने दरख्तों के साए उन पर झुके हुए होंगे और मेवों के गुच्छे उनके बहुत क़रीब हर तरह उनके एख्तेयार में

وَيُطَافُ عَلَيْهِم بِـَٔانِيَةٍۢ مِّن فِضَّةٍۢ وَأَكْوَابٍۢ كَانَتْ قَوَارِيرَا۠ ﴿١٥﴾

और उनके सामने चाँदी के साग़र और शीशे के निहायत शफ्फ़ाफ़ गिलास का दौर चल रहा होगा

قَوَارِيرَا۟ مِن فِضَّةٍۢ قَدَّرُوهَا تَقْدِيرًۭا ﴿١٦﴾

और शीशे भी (काँच के नहीं) चाँदी के जो ठीक अन्दाज़े के मुताबिक बनाए गए हैं

وَيُسْقَوْنَ فِيهَا كَأْسًۭا كَانَ مِزَاجُهَا زَنجَبِيلًا ﴿١٧﴾

और वहाँ उन्हें ऐसी शराब पिलाई जाएगी जिसमें जनजबील (के पानी) की आमेज़िश होगी

عَيْنًۭا فِيهَا تُسَمَّىٰ سَلْسَبِيلًۭا ﴿١٨﴾

ये बेहश्त में एक चश्मा है जिसका नाम सलसबील है

۞ وَيَطُوفُ عَلَيْهِمْ وِلْدَٰنٌۭ مُّخَلَّدُونَ إِذَا رَأَيْتَهُمْ حَسِبْتَهُمْ لُؤْلُؤًۭا مَّنثُورًۭا ﴿١٩﴾

और उनके सामने हमेशा एक हालत पर रहने वाले नौजवाल लड़के चक्कर लगाते होंगे कि जब तुम उनको देखो तो समझो कि बिखरे हुए मोती हैं

وَإِذَا رَأَيْتَ ثَمَّ رَأَيْتَ نَعِيمًۭا وَمُلْكًۭا كَبِيرًا ﴿٢٠﴾

और जब तुम वहाँ निगाह उठाओगे तो हर तरह की नेअमत और अज़ीमुश शान सल्तनत देखोगे

عَـٰلِيَهُمْ ثِيَابُ سُندُسٍ خُضْرٌۭ وَإِسْتَبْرَقٌۭ ۖ وَحُلُّوٓا۟ أَسَاوِرَ مِن فِضَّةٍۢ وَسَقَىٰهُمْ رَبُّهُمْ شَرَابًۭا طَهُورًا ﴿٢١﴾

उनके ऊपर सब्ज़ क्रेब और अतलस की पोशाक होगी और उन्हें चाँदी के कंगन पहनाए जाएँगे और उनका परवरदिगार उन्हें निहायत पाकीज़ा शराब पिलाएगा

إِنَّ هَـٰذَا كَانَ لَكُمْ جَزَآءًۭ وَكَانَ سَعْيُكُم مَّشْكُورًا ﴿٢٢﴾

ये यक़ीनी तुम्हारे लिए होगा और तुम्हारी (कारगुज़ारियों के) सिले में और तुम्हारी कोशिश क़ाबिले शुक्र गुज़ारी है

بسم الله الرحمن الرحيم मंगल 18 रबी अल-अव्वल
الثلاثاء 18 ربيع الأول
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