इस्लाम > Hi > हदीस > फकह तथ उसल ए फकह > मेरी माँ मर गई है और उसपर एक महीने का रोज़ा है, ऐसे में क्या मैं उसकी तरफ़ से रोज़ा रख लूँ…
सह़ीह़27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयعن عبد الله بن عباس رضي الله عنهما قال: «جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، إن أمي ماتت وعليها صوم شهر. أَفَأَقْضِيهِ عنها؟ فقال: لو كان على أمك دَيْنٌ أَكُنْتَ قَاضِيَهُ عنها؟ قال: نعم. قال: فَدَيْنُ اللهِ أَحَقُّ أن يُقْضَى ».
وفي رواية: «جاءت امرأة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله، إن أمي ماتت وعليها صوم نذر. أفأصوم عنها؟ فقال: أرأيت لو كان على أمك دَيْنٌ فَقَضَيْتِيهِ ، أكان ذلك يُؤَدِّي عنها؟ فقالت: نعم. قال: فَصُومِي عن أمك».
इस हदीस में दो रिवायतें हैं और हदीस के प्रसंग से लगता है कि दोनों एक नहीं, बल्कि अलग-अलग घटनाएँ हैं।
पहली रिवायत में है कि एक व्यक्ति नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्म- के पास आया और बताया कि उसकी माँ की मृत्यु हो गई है और उसके एक महीने के रोज़े बाक़ी हैं, तो क्या वह उसकी ओर से क़जा कर सकता है?
जबकि दूसरी रिवायत में है कि एक महिला आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आकर आपको बताती है कि उसकी माँ मर गई है और उसपर मन्नत का रोज़ा बाक़ी है, तो क्या वह उसकी ओर से रोज़ा रखेगी?
आपने दोनों को फ़तवा दिया कि उनकी माताओं पर जो रोज़े हैं, वह उनकी ओर से उन्हें अदा करें और फिर इस बात को समझाने तथा स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण दिया।
उनसे पूछा कि यदि उनके माता-पिता पर किसी व्यक्ति का क़र्ज़ होता, तो क्या वे उसे अदा करते? जब दोनों ने हाँ में जवाब दिया, तो बताया कि यह रोज़ा भी दरअसल उनके माता-पिता के ऊपर अल्लाह क़र्ज़ है। अतः जब इनसान का क़र्ज़ अदा किया जाएगा, तो अल्लाह का क़र्ज़ तो इस बात का अधिक हक़ रखता है कि उसे अदा किया जाए।
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