इस्लाम > Hi > हदीस > फकह तथ उसल ए फकह > अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हर उस वस्तु में शुफ़आ़ (साँझे की संपत्ति में ए…
सह़ीह़27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया
📖 1 मिनट पढ़ने का समयعن جابر بن عبد الله رضي الله عنهما قال: (جعل وفي لفظ: قضى) النبي صلى الله عليه وسلم بالشُّفْعة في كل ما لم يقسم، فإذا وقعت الحدود، وصُرِّفَتِ الطرق؛ فلا شفعة).
यह बुद्धिमत्तापूर्ण शरीयत आई ही इसलिए है कि सत्य और न्याय का बोलबाला हो तथा बुराई एवं अत्याचार का ख़ात्मा हो। यही कारण है कि चूँकि जायदादों में साझेदारी के कई नुक़सान सामने आते हैं तथा उसका झमेला लंबे समय तक बरक़रार रहता है और बँटवारा कर लेना भी कुछ आसान नहीं होता, इसलिए शरीयत ने साझेदार को शुफ़ा का हक़ दिया है।
यानी जब किसी साझे की संपत्ति का एक साझेदार अपना हिस्सा बेच दे, तो दूसरे साझेदार को उसे उसकी वही क़ीमत देकर ख़रीदार से लेने का अधिकार है, ताकि साझेदारी की संभावित क्षति से बचा जा सके।
लेकिन साझेदार को यह अधिकार उस समय तक प्राप्त होगा, जब तक साझे की संपत्ति का बटावारा न हो जाए, सीमाएँ न तय कर दी गई हों और रास्ते न निकाल दिए गए हों।
अगर सीमाएँ निर्धारित कर दी गई हों, दोनों भागों को अलग कर दिया गया हो और रास्ते निकाल दिए गए हों, तो शुफ़ा का अधिकार प्राप्त न हीं होगा। क्योंकि अब साझेदारी की उस संभावित क्षति का भय नहीं रहा, जिसके कारण बेची हुई संत्ति को ख़रीदने वाले से लेकर साझेदार को देने का हुक्म दिया गया है।
श्रेणियाँ : मामलात पर आधारित फ़िक़्ह · शुफ़ा का अधिकार · फ़िक़्ह तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह