वह ज़माना क़रीब है, जब मुसलमान का बेहतरीन माल बकरियाँ होंगी, जिनको लेकर वह पहाड़ों की चोटि…

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हदीस वर्णनकर्ता: इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

सह़ीह़

27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया

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हदीस का पाठ: वह ज़माना क़रीब है, जब मुसलमान का बेहतरीन माल बकरियाँ ह…

عن أبي سعيد الخدري رضي الله عنه قالَ: قالَ رسولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم : "يُوشَكُ أنْ يكونَ خيرَ مالِ المسلمِ غَنَمٌ يَتَّبعُ بها شَعَفَ الجبالِ، ومواقعَ القطرِ يَفِرُّ بدينِهِ من الفتنِ".

हदीस की व्याख्या: वह ज़माना क़रीब है, जब मुसलमान का बेहतरीन माल बकरियाँ ह…

इस हदीस में फ़ितने के दिनों में लोगों से अलग-थलग रहने की फ़ज़ीलत बयान की गई है। लेकिन यदि आदमी ऐसा हो कि उसके अंदर फ़ितने को ख़त्म करने की क्षमता हो, तो उसे आवश्यक रूप से उसे ख़त्म करने का प्रयास करना चाहिए। परिस्थिति एवं संभावना के अनुरूप यह कभी फ़र्ज़-ए-ऐन होता है और कभी फ़र्ज़-ए-किफ़ाया। जहाँ तक फ़ितनों के दिनों को छोड़ साधारण दिनों की बात है, तो उनमें अलग-थलग रहना अच्छा है या मिलजुलकर रहना, इस बात में उलेमा का मतभेद है। लेकिन सही बात यह है कि यदि गुनाह में पड़ने की प्रबल संभावना न हो, तो मिलजुलकर रहना ही उत्तम है।

"अपने धर्म को बचाने के लिए निकल जाएगा" यानी इस डर से भाग खड़ा होगा कि कहीं उसका धर्म फ़ितने का शिकार न हो जाए। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इन्सान को शिर्क के क्षेत्र से इस्लाम के क्षेत्र की ओर एवं गुनाह के क्षेत्र से धर्म के अनुपालन के क्षेत्र की ओर हिजरत करने का आदेश दिया गया है। बिल्कुल इसी तरह जब लोग और समय बदल जाए, तो अलग-थलग रहना ही उत्तम है।

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لا إله إلا الله अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

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