इस्लाम > Hi > हदीस > फकह तथ उसल ए फकह > हम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ जुमा की नमाज़ पढ़कर लौटते, तो दीवारों …
सह़ीह़27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया
📖 1 मिनट पढ़ने का समयعن سَلَمَةَ بْنِ الأَكْوَعِ رضي الله عنه وكان من أصحاب الشجرة قال: «كنا نُصَلِّي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم الْجُمُعَةَ، ثم نَنْصَرِفُ، وليس للحيطان ظِلٌّ نستظِلّ به».
وفي لفظ: «كنا نُجَمِّعُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا زالت الشمس، ثم نرجع فَنَتَتَبَّعُ الْفَيْءَ».
सलमा बिन अकवा -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि वह लोग अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ जुमा की नमाज़ में शरीक होते और इतनी जल्दी नमाज़ पढ़ लेते कि दोनों ख़ुतबों तथा जुमा की नमाज़ संपन्न करने के बाद जब घर लौटते, तो दीवारों की इतनी छाया नहीं होती कि उसके नीचे खुद को छुपा पाते।
दूसरी रिवायत में बताया गया है कि वे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ जुमा की नमाज़ सूरज ढलने के बाद पढ़कर घर लौटते थे।
उलेमा इस बात पर एकमत हैं कि जुमा का अंतिम समय वही है, जो ज़ोहर का अंतिम समय है। अल्बत्ता, बेहतर यह है कि उसे सूरज ढलने के बाद पढ़ लिया जाए, क्योंकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अकसर ऐसा ही किया करते थे और इस समय के बारे में उलेमा के बीच कोई मतभेद नहीं है। परन्तु यदि कोई आवश्यकता हो, जैसे तेज़ गरमी पड़ रही हो और छाया करने के लिए कुछ न हो या फिर सूरज ढलने से पहले युद्ध में निकलना हो, तो सूरज ढलने से कुछ देर पहले पढ़ लेने में कोई हर्ज नहीं है।
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