अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सदक़ा-ए-फ़ित्र मुसलमान ग़ुलाम और आज़ाद, मर्द …
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हदीस वर्णनकर्ता: इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
स़ह़ीह़
27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया
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हदीस का पाठ: अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सदक़ा-ए-फ़…
हदीस की व्याख्या: अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सदक़ा-ए-फ़…
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने रमज़ान के बाद ज़कात अल-फ़ित्र वाजिब की है, जो एक साअ् यानी चार मुद है। मुद दरअसल एक औसत क़द-काठी के इन्सान के लप भर को कहते हैं। ज़कात-ए-फ़ित्र हर ऐसे मुसलमान पर वाजिब है, जिसके पास एक दिन तथा एक रात के खाने से अधिक वस्तु मौजूद हो। ग़ुलाम हो कि आज़ाद, पुरुष हो कि महिला और छोटा हो कि बड़ा। इन्सान ज़कात-ए-फ़ित्र अपनी ओर से तथा ऐसे सभी लोगों की ओर से अदा करेगा, जिनका भरण-पोषण वह करता हो। साथ ही यह भी आदेश दिया कि फ़ितरा लोगों के ईद की नमाज़ के लिए निकलने से पहले-पहले अदा कर दिया जाए।
सीख: अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सदक़ा-ए-फ़…
- ज़कात-ए-फ़ित्र छोटे व बड़े और आज़ाद तथा ग़ुलाम हर मुसलमान की ओर से देना वाजिब है। देने का काम अभिभावक तथा मालिक करेगा। इन्सान ज़कात-ए-फ़ित्र अपनी ओर से, अपने बाल-बच्चों की ओर से और उन तमाम लोगों की ओेर से अदा करेगा, जिनका भरण-पोषण उसपर वाजिब है।
- माँ के पेट में पल रहे बच्चे की ओर से ज़कात-ए-फ़ित्र निकालना वाजिब नहीं, बल्कि मुसतहब है।
- इस बात का बयान कि ज़कात-ए-फ़ित्र में कौन-कौन सी चीज़ें निकालनी हैं। दरअसल ज़कात-ए-फ़ित्र में लोगों की सामान्य खाने की चीज़ें निकाली जाएँगी।
- ज़कात-ए-फ़ित्र ईद की नमाज़ से पहले-पहले निकाल देना वाजिब है। बेहतर यह है कि ईद के दिन सुबह निकाली जाए। एक-दो दिन पहले निकालना भी जायज़ है।
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मंगल 15 जुमादा अल-अव्वल
الثلاثاء 15 جمادى الأولى
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