“न हानि स्वीकार्य है, न किसी की हानि करना उचित है।”

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हदीस वर्णनकर्ता: इस ह़दीस़ को इब्ने माजह और दाराक़ुतनी आदि ने मुसनद रिवायत किया है

ह़सन

27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया

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हदीस का पाठ: “न हानि स्वीकार्य है, न किसी की हानि करना उचित है।”

عَنْ أَبِي سَعِيدٍ سَعْدِ بْنِ مَالِكِ بْنِ سِنَانٍ الخُدْرِيّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «لَا ضَرَرَ وَلَا ضِرَارَ».

हदीस की व्याख्या: “न हानि स्वीकार्य है, न किसी की हानि करना उचित है।”

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बता रहे हैं कि ख़ुद अपने वजूद और दूसरे लोगों की किसी भी प्रकार की हानि करने से बचना ज़रूरी है। किसी के लिए भी न तो खुद अपने आपको कष्ट देना जयाज़ है और न किसी दूसरे को कष्ट देना जायज़ है। दोनों बातें समान रूप से नाज़ायज़ हैं। और उसके लिए यह उचित नहीं है कि वह हानि का बदला हानि से दे, क्योंकि हानि को हानि से दूर नहीं किया जा सकता, सिवाय क़िसास (प्रतिशोध) के रूप में, वह भी बिना किसी अतिक्रमण के।

सीख: “न हानि स्वीकार्य है, न किसी की हानि करना उचित है।”

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لا حول ولا قوة إلا بالله अल्लाह के बिना कोई शक्ति और सामर्थ्य नहीं

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

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