हम अनसार में सबसे अधिक खेती वाले थे तथा हम ज़मीन इस शर्त पर किराए पर देते थे कि उसके इस भा…

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हदीस वर्णनकर्ता: इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।

सह़ीह़

27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया

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हदीस का पाठ: हम अनसार में सबसे अधिक खेती वाले थे तथा हम ज़मीन इस शर्…

عن رافع بن خديج رضي الله عنه قال: «كنا أكثر الأنصار حقلًا، وكنا نكري الأرض، على أن لنا هذه، ولهم هذه، فربما أخرجت هذه، ولم تخرج هذه فنهانا عن ذلك، فأما بالورق: فلم ينهنا».

हदीस की व्याख्या: हम अनसार में सबसे अधिक खेती वाले थे तथा हम ज़मीन इस शर्…

इस हदीस में इस बात का विवरण है कि ज़मीन को कैसे बटाई पर देना सही है और कैसे नहीं। राफ़े बिन ख़दीज (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि उनके घर वालों के पास मदीने में सबसे अधिक खेत और बाग़ थे और वे जाहिलियत के दौर में प्रचलित तरीक़े से खेत बटाई पर देते थे। वे यह तय करके खेत देते थे कि वे खेत के एक भाग की पैदावार लेंगे और किराये पर लेने वाला दूसरे भाग की। लेकिन कभी-कभी एक भाग की पैदावार ठीक-ठाक होती, परन्तु दूसरे भाग की नहीं।

अतः, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें इस तरह मामला तय करने से मना कर दिया। क्योंकि इसमें धोखा और अनिश्चितता है। जबकि एवज़ का ज्ञान होना ज़रूरी होने के साथ-साथ दोनों का लाभ तथा हानि में बराबर का भागीदार होना भी आवश्यक है। चुनांचे अगर एवज़ ज़मीन की पैदावार तो वह अरबी में 'मुज़ारअत' या 'मुसाक़ात' (बटाई) कहलाता है, जिसका आधार नफ़ा-नुक़सान में न्याय और बराबरी होना चाहिए। यानी दोनों में से हर एक को पैदावार का एक निश्चित भाग मिलना चाहिए, जैसे एक चौथाई या आधा आदि।

और अगर एवज़ नक़द हो, तो इसे अरबी में 'इजारा' (किराए पर देना अथवा ठेके पर देना) कहते हैं और इसमें एवज़ का निश्चित होना ज़रूरी है। शरीयत ने इसे जायज़ क़रार दिया है, चाहे सोने के बदले में हो या चाँदी के बदले में। इसी तरह 'मुज़ारअत' यानी बटाई को भी जायज़ क़रार दिया है। क्योंकि हदीस में हैः "أما شيء معلوم مضمون، فلا بأس به"

श्रेणियाँ : मामलात पर आधारित फ़िक़्ह · बाग अथवा खेत बटाई पर देना · फ़िक़्ह तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह

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أستغفر الله मैं अल्लाह से माफी माँगता हूँ

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

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