क़ुरआन का पृष्ठ 531 पढ़ें

मुसहफ़ का पृष्ठ 531 22 आयतों को समाहित करता है। यह जुज़ 27, हिज़्ब 53 में है।

05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया

क़ुरआन में पृष्ठ 531

22
आयतें
27
जुज़
53
हिज़्ब
2
सूरह

पृष्ठ 531 में सूरह

القمر · जुज़ 27
जुज़ 27
पृष्ठ 531
سورة القمر
जुज़ 27 47.6% (190/399)
हिज़्ब 53 96.9% (190/196)

وَمَآ أَمْرُنَآ إِلَّا وَٰحِدَةٌۭ كَلَمْحٍۭ بِٱلْبَصَرِ ﴿٥٠﴾

और हमारा हुक्म तो बस ऑंख के झपकने की तरह एक बात होती है

وَلَقَدْ أَهْلَكْنَآ أَشْيَاعَكُمْ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍۢ ﴿٥١﴾

और हम तुम्हारे हम मशरबो को हलाक कर चुके हैं तो कोई है जो नसीहत हासिल करे

وَكُلُّ شَىْءٍۢ فَعَلُوهُ فِى ٱلزُّبُرِ ﴿٥٢﴾

और अगर चे ये लोग जो कुछ कर चुके हैं (इनके) आमाल नामों में (दर्ज) है

وَكُلُّ صَغِيرٍۢ وَكَبِيرٍۢ مُّسْتَطَرٌ ﴿٥٣﴾

(यानि) हर छोटा और बड़ा काम लिख दिया गया है

إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّـٰتٍۢ وَنَهَرٍۢ ﴿٥٤﴾

बेशक परहेज़गार लोग (बेहिश्त के) बाग़ों और नहरों में

فِى مَقْعَدِ صِدْقٍ عِندَ مَلِيكٍۢ مُّقْتَدِرٍۭ ﴿٥٥﴾

(यानि) पसन्दीदा मक़ाम में हर तरह की कुदरत रखने वाले बादशाह की बारगाह में (मुक़र्रिब) होंगे

ٱلرَّحْمَـٰنُ ﴿١﴾

बड़ा मेहरबान (ख़ुदा)

عَلَّمَ ٱلْقُرْءَانَ ﴿٢﴾

उसी ने क़ुरान की तालीम फरमाई

خَلَقَ ٱلْإِنسَـٰنَ ﴿٣﴾

उसी ने इन्सान को पैदा किया

عَلَّمَهُ ٱلْبَيَانَ ﴿٤﴾

उसी ने उनको (अपना मतलब) बयान करना सिखाया

ٱلشَّمْسُ وَٱلْقَمَرُ بِحُسْبَانٍۢ ﴿٥﴾

सूरज और चाँद एक मुक़र्रर हिसाब से चल रहे हैं

وَٱلنَّجْمُ وَٱلشَّجَرُ يَسْجُدَانِ ﴿٦﴾

और बूटियाँ बेलें, और दरख्त (उसी को) सजदा करते हैं

وَٱلسَّمَآءَ رَفَعَهَا وَوَضَعَ ٱلْمِيزَانَ ﴿٧﴾

और उसी ने आसमान बुलन्द किया और तराजू (इन्साफ) को क़ायम किया

أَلَّا تَطْغَوْا۟ فِى ٱلْمِيزَانِ ﴿٨﴾

ताकि तुम लोग तराज़ू (से तौलने) में हद से तजाउज़ न करो

وَأَقِيمُوا۟ ٱلْوَزْنَ بِٱلْقِسْطِ وَلَا تُخْسِرُوا۟ ٱلْمِيزَانَ ﴿٩﴾

और ईन्साफ के साथ ठीक तौलो और तौल कम न करो

وَٱلْأَرْضَ وَضَعَهَا لِلْأَنَامِ ﴿١٠﴾

और उसी ने लोगों के नफे क़े लिए ज़मीन बनायी

فِيهَا فَـٰكِهَةٌۭ وَٱلنَّخْلُ ذَاتُ ٱلْأَكْمَامِ ﴿١١﴾

कि उसमें मेवे और खजूर के दरख्त हैं जिसके ख़ोशों में ग़िलाफ़ होते हैं

وَٱلْحَبُّ ذُو ٱلْعَصْفِ وَٱلرَّيْحَانُ ﴿١٢﴾

और अनाज जिसके साथ भुस होता है और ख़ुशबूदार फूल

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿١٣﴾

तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों को न मानोगे

خَلَقَ ٱلْإِنسَـٰنَ مِن صَلْصَـٰلٍۢ كَٱلْفَخَّارِ ﴿١٤﴾

उसी ने इन्सान को ठीकरे की तरह खन खनाती हुई मिटटी से पैदा किया

وَخَلَقَ ٱلْجَآنَّ مِن مَّارِجٍۢ مِّن نَّارٍۢ ﴿١٥﴾

और उसी ने जिन्नात को आग के शोले से पैदा किया

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿١٦﴾

तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स) तुम अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमतों से मुकरोगे

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