क़ुरआन का पृष्ठ 534 पढ़ें

मुसहफ़ का पृष्ठ 534 27 आयतों को समाहित करता है। यह जुज़ 27, हिज़्ब 54 में है।

05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया

क़ुरआन में पृष्ठ 534

27
आयतें
27
जुज़
54
हिज़्ब
2
सूरह
الرحمن · जुज़ 27
जुज़ 27
पृष्ठ 534
سورة الرحمن
जुज़ 27 65.9% (263/399)
हिज़्ब 54 33.0% (67/203)

فِيهِمَا فَـٰكِهَةٌۭ وَنَخْلٌۭ وَرُمَّانٌۭ ﴿٦٨﴾

उन दोनों में मेवें हैं खुरमें और अनार

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٦٩﴾

तो तुम दोनों अपने मालिक की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे

فِيهِنَّ خَيْرَٰتٌ حِسَانٌۭ ﴿٧٠﴾

उन बाग़ों में ख़ुश ख़ुल्क और ख़ूबसूरत औरतें होंगी

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٧١﴾

तो तुम दोनों अपने मालिक की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे

حُورٌۭ مَّقْصُورَٰتٌۭ فِى ٱلْخِيَامِ ﴿٧٢﴾

वह हूरें हैं जो ख़ेमों में छुपी बैठी हैं

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٧٣﴾

फिर तुम दोनों अपने परवरदिगार की कौन कौन सी नेअमत से इन्कार करोगे

لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌۭ قَبْلَهُمْ وَلَا جَآنٌّۭ ﴿٧٤﴾

उनसे पहले उनको किसी इन्सान ने उनको छुआ तक नहीं और न जिन ने

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٧٥﴾

फिर तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत से मुकरोगे

مُتَّكِـِٔينَ عَلَىٰ رَفْرَفٍ خُضْرٍۢ وَعَبْقَرِىٍّ حِسَانٍۢ ﴿٧٦﴾

ये लोग सब्ज़ कालीनों और नफीस व हसीन मसनदों पर तकिए लगाए (बैठे) होंगे

فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ﴿٧٧﴾

फिर तुम अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों से इन्कार करोगे

تَبَـٰرَكَ ٱسْمُ رَبِّكَ ذِى ٱلْجَلَـٰلِ وَٱلْإِكْرَامِ ﴿٧٨﴾

(ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार जो साहिबे जलाल व करामत है उसी का नाम बड़ा बाबरकत है

إِذَا وَقَعَتِ ٱلْوَاقِعَةُ ﴿١﴾

जब क़यामत बरपा होगी और उसके वाक़िया होने में ज़रा झूट नहीं

لَيْسَ لِوَقْعَتِهَا كَاذِبَةٌ ﴿٢﴾

(उस वक्त लोगों में फ़र्क ज़ाहिर होगा)

خَافِضَةٌۭ رَّافِعَةٌ ﴿٣﴾

कि किसी को पस्त करेगी किसी को बुलन्द

إِذَا رُجَّتِ ٱلْأَرْضُ رَجًّۭا ﴿٤﴾

जब ज़मीन बड़े ज़ोरों में हिलने लगेगी

وَبُسَّتِ ٱلْجِبَالُ بَسًّۭا ﴿٥﴾

और पहाड़ (टकरा कर) बिल्कुल चूर चूर हो जाएँगे

فَكَانَتْ هَبَآءًۭ مُّنۢبَثًّۭا ﴿٦﴾

फिर ज़र्रे बन कर उड़ने लगेंगे

وَكُنتُمْ أَزْوَٰجًۭا ثَلَـٰثَةًۭ ﴿٧﴾

और तुम लोग तीन किस्म हो जाओगे

فَأَصْحَـٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ ﴿٨﴾

तो दाहिने हाथ (में आमाल नामा लेने) वाले (वाह) दाहिने हाथ वाले क्या (चैन में) हैं

وَأَصْحَـٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ ﴿٩﴾

और बाएं हाथ (में आमाल नामा लेने) वाले (अफ़सोस) बाएं हाथ वाले क्या (मुसीबत में) हैं

وَٱلسَّـٰبِقُونَ ٱلسَّـٰبِقُونَ ﴿١٠﴾

और जो आगे बढ़ जाने वाले हैं (वाह क्या कहना) वह आगे ही बढ़ने वाले थे

أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلْمُقَرَّبُونَ ﴿١١﴾

यही लोग (ख़ुदा के) मुक़र्रिब हैं

فِى جَنَّـٰتِ ٱلنَّعِيمِ ﴿١٢﴾

आराम व आसाइश के बाग़ों में बहुत से

ثُلَّةٌۭ مِّنَ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿١٣﴾

तो अगले लोगों में से होंगे

وَقَلِيلٌۭ مِّنَ ٱلْـَٔاخِرِينَ ﴿١٤﴾

और कुछ थोडे से पिछले लोगों में से मोती

عَلَىٰ سُرُرٍۢ مَّوْضُونَةٍۢ ﴿١٥﴾

और याक़ूत से जड़े हुए सोने के तारों से बने हुए

مُّتَّكِـِٔينَ عَلَيْهَا مُتَقَـٰبِلِينَ ﴿١٦﴾

तख्ते पर एक दूसरे के सामने तकिए लगाए (बैठे) होंगे

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