सात प्रकार के लोग ऐसे हैं, जिनको अल्लाह उस दिन अपने अर्श के नीचे छाया देगा, जिस दिन उसकी छ…
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हदीस वर्णनकर्ता: इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है
स़ह़ीह़
27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया
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हदीस का पाठ: सात प्रकार के लोग ऐसे हैं, जिनको अल्लाह उस दिन अपने अर्…
हदीस की व्याख्या: सात प्रकार के लोग ऐसे हैं, जिनको अल्लाह उस दिन अपने अर्…
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सात प्रकार के मोमिनों को सुसमाचार सुनाया है कि उनको अल्लाह उस दिन अपने अर्श की छाया में जगह देगा, जिस दिन उसकी छाया के अतिरिक्त कोई छाया नहीं होगी : 1- एक ऐसा इमाम जो आज्ञाकारी हो, अवज्ञाकारी न हो, जनता के बीच न्याय करता हो, अत्याचार न करता हो। यहाँ इमाम से मुराद इस्लामी शासक है और यह फ़ज़ीलत हर उस व्यक्ति को प्राप्त होगी, जिसे मुसलमानों की कोई ज़िम्मेवारी सोंपी जाए और वह न्याय के साथ काम करे। 2- ऐसा युवक जो अल्लाह की इबादत में पला-बढ़ा और जिसने अपनी जवानी और गतिविधियों को अपने जीवन के अंत तक अल्लाह की इबादत पर ही केंद्रित रखा। 3- ऐसा व्यक्ति जिसका दिल मस्जिद पर अटका हुआ हो। मस्जिद से इतना लगाव एवं प्रेम हो कि वहाँ से निकलने के बाद दोबारा जाने के लिए परेशान रहे। कोई शारीरिक परेशानी आ जाए और मस्जिद से बाहर रहे, तब भी दिल वहीं अटका रहे। 4- दो ऐसे लोग जो अल्लाह के लिए एक-दूसरे से प्रेम करते हों और इसी दीनी प्रेम को पूरे मन से निभाते हों तथा किसी सांसारिक बाधा के कारण इसमें दराड़ पड़ने न दें। चाहे इस दुनिया में एक-दूसरे से मिल पाएँ या मिल न भी पाएँ और मृत्यु उनके बीच जुदाई डाल दे। 5- एक ऐसा व्यक्ति जिसे कोई खानदानी, सुंदर, प्रतिष्ठित परिवार की एवं धनवान् महिला कुकर्म की ओर बुलाए और वह यह कहकर ठुकरा दे कि मैं अल्लाह से डरता हूँ। 6- एक ऐसा व्यक्ति जिसने सदक़ा किया, सदक़ा चाहे छोटा हो या बड़ा, और दिखावा करने की बजाय इतना छुपाकर रखा कि बाएँ हाथ को भी पता न चल सका कि दाएँ हाथ ने क्या खर्च किया। 7- एक ऐसा व्यक्ति जिसने एकांत में दिल से या ज़बान से अल्लाह को याद किया और अल्लाह के भय और सम्मान में उसकी आँखों से आँसू बह पड़े।
सीख: सात प्रकार के लोग ऐसे हैं, जिनको अल्लाह उस दिन अपने अर्…
- इस हदीस में बयान किए गए लोगों की फ़ज़ीलत और उनके पद्चिह्नों पर चलने की प्रेरणा।
- इब्न-ए-हजर हदीस के शब्दों "उसकी छांव में होगा" के बारे में कहते हैं : यहाँ मुराद अर्श का साया है, जिसका प्रमाण सुनन सईद बिन मंसूर में हसन सनद से वर्णित सलमान की यह हदीस है : "सात लोगों को अल्लाह अपने अर्श के साए में जगह देगा।"
- इब्न-ए-हजर कहते हैं : इस हदीस में आए हुए शब्द 'आदिल' की जितनी भी व्याख्याएँ की गई हैं, उनमें सबसे बेहतर व्याख्या यह है कि इससे मुराद ऐसा व्यक्ति है, जो अल्लाह के आदेश का पालन करते हुए हर वस्तु को उसके असल स्थान पर रखता हो और अति एवं कोताही का शिकार न होता हो। फिर, उसका ज़िक्र सबसे पहले इसलिए फ़रमाया कि उससे लाभान्वित होने वालों की संख्या बड़ी व्यापक हुआ करती है।
- एक नमाज़ के बाद दूसरी नमाज़ की प्रतीक्षा करने की फ़ज़ीलत।
- नववी कहते हैं : इस हदीस में एक-दूसरे से अल्लाह के लिए मोहब्बत करने की प्रेरणा दी गई है और इसका महत्व बताया गया है।
- यहाँ विशेष रूप से प्रतिष्ठा एवं सुंदरता का ज़िक्र इसलिए किया गया है कि लोग इन दोनों की ओर आकर्षित हो जाते हैं और इन्हें प्राप्त करना कठिन होता है।
- बेहतर यह है कि सदक़ा छुपाकर किया जाए। इसमें दिखावा की संभावना कम रहती है। लेकिन, दिखाकर सदक़ा करना और ज़कात देना भी जायज़ है। शर्त यह है कि रियाकारी का अंदेशा न हो और उद्देश्य दूसरे लोगों को खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करना तथा इस्लामी प्रतीकों का इज़हार करना हो।
- इस हदीस में बयान किए गए सात लोगों को यह नेमत अल्लाह के प्रति उनकी निष्ठा तथा इच्छाओं एवं आकांक्षाओं के विपरीत काम करने के कारण प्राप्त होगी।
- हदीस के शब्दों "सात प्रकार के व्यक्ति जिन्हें अल्लाह छाया प्रदान करेगा" से मुराद अल्लाह के अर्श के नीचे जगह पाने वाले लोगों को उपर्युक्त संख्या में सीमित करना नहीं है, बल्कि हदीस में अन्य लोगों के भी अर्श के नीचे जगह पाने का ज़िक्र मिलता है।
- इब्न-ए-हजर कहते हैं : इस हदीस में पुरुषों के उल्लेख का अर्थ यह नहीं है कि महिलाएँ यह फ़ज़ीलत प्राप्त नहीं कर सकतीं। इस हदीस में बयान किए गए कार्यों में महिलाएँ भी पुरुषों के साथ शामिल होंगी। लेकिन अगर इमामत से मुराद सबसे बड़ी इमामत यानी शासन हो, तो उसमें महिलाएँ शामिल नहीं होंगी। अलबत्ता, अगर इमामत से मुराद शासन नहीं है, तो उसमें महिलाएँ दाख़िल हो सकती हैं। मसलन जब किसी महिला के बच्चे हों और वह बच्चों के बीच न्याय से काम ले, तो उसे यह फ़ज़ीलत हासिल होगी। अलबत्ता, मस्जिद से दिल अटके रहने वाली बात से महिला बाहर रहेगी। क्योंकि महिला का मस्जिद की तुलना मे घर में नमाज़ पढ़ना अधिक उत्तम है। बाक़ी बातों में महिलाएँ पुरुषों के साथ शामिल रहेंगी। यहाँ तक कि पुरुष को महिला की ओर से कुकर्म के लिए आमंत्रित किए जाने की बात महिला के बारे में भी सोची जा सकती है, जिसे कोई सुंदर व्यक्ति कुकर्म के लिए आमंत्रित करे और वह अपनी ज़रूरत के बावजूद अल्लाह के डर से इनकार कर दे।
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