इस्लाम > Hi > हदीस > फकह तथ उसल ए फकह > मुसलमान को उसके घोड़े और गुलाम की ज़कात नहीं देनी है।
सह़ीह़27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया
📖 1 मिनट पढ़ने का समयعن أبي هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «ليس على المُسلِم في عبدِهِ وَلاَ فَرَسهِ صَدَقَة».
وفي لفظ: «إلا زكاة الفِطر في الرقيق».
ज़कात की बुनियाद बराबरी और न्याय पर है। इसीलिए अल्लाह ने ज़कात धनवानों के ऐसे धन पर अनिवार्य की है, जो बढ़ने वाले हों और बढ़ने के लिए रखे गए हों, जैसे ज़मीन की पैदावार और व्यापार के सामान। जहाँ तक उन धनों का संबंध है, जिनके अंदर वृद्धि नहीं होती, यानी ऐसे धन जो अपने दख़ल में तथा व्यक्तिगत उपयोग के लिए हों, तो उनपर ज़कात नहीं है, क्योंकि यह स्वयं उसके प्रयोग के लिए होते हैं।
इसके उदाहरणस्वरूप हम किसी की सवारी, जैसे घोड़ा, ऊँट, गाड़ी आदी और उसकी सेवा करने वाले दास, बिस्तर और प्रयोग के लिए रखे गए बरतन आदि को ले सकते हैं।
लेकिन दास का फ़ितरा देना होगा, चाहे वह व्यापार का न भी हो, क्योंकि फ़ितरा का संबंध धन से नहीं, बल्कि शरीर से है।
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