इस्लाम > Hi > हदीस > फकह तथ उसल ए फकह > 'तमत्तो' (अर्थात हज के अवसर पर उमरा करके एहराम खोल देने और नए सिरे से एहराम बाँधकर हज करने…
सह़ीह़27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयعن عمران بن حصين رضي الله عنهما قال: «أُنْزِلَت آيَةُ المُتْعَةِ في كتاب اللَّه تعالى ، فَفَعَلْنَاهَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ، وَلَم يَنْزِلْ قُرْآنٌ يُحَرِّمُهَا، وَلَم يَنْهَ عَنهَا حَتَّى مات، قال رجل بِرَأْيِهِ مَا شَاءَ»، قال البخاري: «يقال إنه عمر».
وفي رواية: « نَزَلَت آيَةُ المُتْعَةِ -يَعْنِي مُتْعَةَ الحَجِّ- وَأَمَرَنا بِهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ، ثُمَّ لَم تَنْزِل آيَةٌ تَنْسَخُ آيَةَ مُتْعَةِ الْحَجِّ، وَلَمْ يَنْهَ عَنْهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى مَاتَ». ولهما بمعناه.
इमरान बिन हुसैन (रज़ियल्लाहु अंहुमा) ने उमरा के बाद एहराम खोल लेने और हज के लिए नए सिरे से एहराम बाँधने का ज़िक्र करते हुए कहाः यह अल्लाह की किताब और रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की हदीस दोनों से साबित है। अल्लाह की किताब में हैः {فمن تمتع بالعمرة إلى الحج فما استيسر من الهدي} (तो जो व्यक्ति उमरे से ले कर हज्ज तक तमत्तो करे, वह जो कुरबानी उपलब्ध हो, पेश करे।) रही बात सुन्नत की, तो खुद अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उसपर अमल किया और अपने साथियों के करने पर सहमति जताई। न कुरआन की किसी आयत में उससे मना किया गया है और न रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उससे मना किया है। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की मृत्यु के समय तक इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। ऐसे में, कोई अपने मत से उससे कैसे रोक सकता है? उनका इशारा उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अंहु) की ओर था, जिन्होंने अपने इजतिहाद की बुनियाद पर हज के महीनों में इससे मना किया था, ताकि साल भर काबा की ज़ियारत करने वालों की संख्या अधिक हो। क्योंकि जब लोग हज के मौसम ही में उमरा कर लेंगे, तो अन्य महीनों में दोबारा नहीं आएँगे। दरअसल, उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) की ओर से यह मनाही हराम ठहराने के तौर पर या किताब व सुन्नत पर अमल करने से रोकने के लिए नहीं थी, बल्कि साधारण हित के तहत यह एक सामयिक निषेध था।
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