इस्लाम > Hi > हदीस > दआओ तथ अजकर पर आधरत फकह > तुममें से कोई व्यक्ति यह न कहे : ऐ अल्लाह! यदि तू चाहे तो मुझे क्षमा प्रदान कर, ऐ अल्लाह! …
स़ह़ीह़27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी चीज़ से, यहाँ तक कि अल्लाह की इच्छा से भी, जोड़कर दुआ करने से मना किया है। क्योंकि यह एक ज्ञात बात है कि अल्लाह क्षमा उसी समय करेगा, जब क्षमा करना चाहेगा। इच्छा की शर्त रखना इसलिए भी अर्थहीन है कि इच्छा की शर्त उसके बारे में रखी जाती है, जिससे बिना इच्छा के भी कोई हो सकता हो। जैसे ज़ोर-ज़बरदस्ती कोई काम करवा लिया जाना। लेकिन अल्लाह के साथ ऐसी कोई बात नहीं है। ख़ुद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भी इस हदीस के अंत में इस बिंदु को स्पष्ट करते हुए कह दिया है कि अल्लाह को कोई मजबूर नहीं कर सकता। कोई भी चीज़ देना उसके लिए कठिन नहीं है और कुछ भी उसके वश से बाहर नहीं है। दूसरी बात यह है कि इच्छा की शर्त लगाकर क्षमा याचना करना दरअसल यह बताना है कि मुझे अल्लाह की क्षमा की ज़रूरत नहीं है। इसलिए 'अगर तू देना चाहे तो दे' कहना दरअसल यह बताना है कि उसे या तो लेने की ज़रूरत नहीं है या फिर जिससे माँग रहा है वह बेबस है। जहाँ सामने वाला सक्षम हो और माँगने वाला ज़रूरतमंद, वहाँ विश्वास के साथ माँगा जाता है। इसलिए अल्लाह से ऐसे माँगना चाहिए, जैसे एक निर्धन व ज़रूरतमंद एक दाता व ज़रूरत पूरी करने वाले से माँग रहा हो। क्योंकि अल्लाह धनवान्, निस्पृह और क्षमतावान् है।
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