इस्लाम > Hi > हदीस > फजलत तथ आदब > अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) यह दुआ पढ़ा करते थे: ऐ अल्लाह! मैं सफ़ेद दाग़, पा…
सह़ीह़27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयعن أنس بن مالك رضي الله عنه قال: كَانَ رَسُولُ اللهِ -صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ- يَقُولُ: «اللهم إني أعوذ بك من البَرَصِ، والجُنُونِ، والجُذَامِ، وَسَيِّئِ الأسْقَامِ».
इस हदीस में है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- कुछ विशेष रोगों से अल्लाह की शरण माँगते थे, जो उनके खतरे एवं बड़े कुप्रभाव को प्रदर्शित करता है। उसके बाद सामान्य रूप से सभी बुरे रोगों से अल्लाह से सुरक्षा एवं सलामती माँगी। दरअसल इस दुआ में विभेदीकरण एवं संक्षेपण दोनों बातें पाई जाती हैं। पहले तो कहा : "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण में आता हूँ सफ़ेद दाग से" यानी ऐसी सफ़ेदी से जो इन्सान के शरीर में प्रकट होती है और उसके नतीजे में लोग इस व्यक्ति से नफ़रत करने लगते हैं और ऐसे में वह लोगों से अलग-थलग रहने लगता है, जो कभी-कभी निराशा का कारण बन जाता है। हम इन चीज़ों से अल्लाह की शरण में आते हैं।
"तथा पागलपन से" यानी अक़्ल से वंचित हो जाने से। दरअसल अक़्ल ही के कारण इन्सान पर शरई अहकाम की पाबंदी लाज़िम होती है, उसी के सहारे वह अपने पाक प्रभु की इबादत करता है तथा उसी से वह अल्लाह की सृष्टियों और उसकी वाणी पर चिंतनशील रहता है। अतः अक़्ल के चले जाना इन्सान ही का चले जाना है।
"तथा कोढ़ से" यह एक ऐसी बीमारी है, जिससे शरीर के अंग सड़-गलकर गिरने लगते हैं। हम इससे अल्लाह की शरण में आते हैं।
"तथा सभी बुरी बीमारियों से।" इससे मुराद वह शारीरिक अपंगताएँ हैं, जिनके कारण इन्सान लोगों की नज़र में तुच्छ एवं समाज में घृणा का पात्र बन जाता है, जैसे लक़वा, दृष्टिहीनता और केंसर आदि। क्योंकि यह ऐसी जटिल बीमारियाँ हैं, जिनका इलाज खर्चीला होता है और इन्सान के धैर्य की परीक्षा लेता है, जिसमें खरा केवल वही व्यक्ति उतर पाता है, जिसे अल्लाह ने सब्र दिया हो और उसके दिल को मज़बूती दी हो। इन बातों से इस्लाम की महानता स्पष्ट होती है, जो इन्सान के शरीर एवं धर्म दोनों का ख़्याल रखता है।
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