नास्तिक और अज्ञेयवादी में क्या अंतर है ?

होम > धर्म और मान्यताएँ > इस्लाम की नज़र में अज्ञेयवाद > नास्तिक और अज्ञेयवादी में क्या अंतर है ?

नास्तिक बयान करता है कि अल्लाह मौजूद नहीं, अज्ञेयवादी कहता है कि मालूम नहीं हो सकता : दो अलग मक़ाम, और क़ुरआन का हर एक पर जवाब।

नास्तिक बयान करता है कि अल्लाह मौजूद नहीं : वह वुजूद का सवाल तय कर देता है। अज्ञेयवादी बयान करता है कि मालूम नहीं हो सकता : वह इल्म का सवाल तय कर देता है।

दोनों मक़ाम मुतज़ाद हैं : ईमान रखने वाले अज्ञेयवादी भी हैं और ऐसे नास्तिक भी जो अपनी बेयक़ीनी को मोतबर समझते हैं। इस्लाम दोनों का जवाब देता है : अल्लाह का इल्म फ़ितरा और निशानियों से मुतवज्जेह है (क़ुरआन 3:190-191), और मख़्लूस तलाश वाला शक गुनाह नहीं, वह एक मरहला है जिसे क़ुरआन सही सवाल पूछकर संजीदगी से लेता है : "या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए हैं, या वे (स्वयं) पैदा करने वाले हैं?" (क़ुरआन 52:35)।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

📖 3 मिनट पढ़ने का समय

नास्तिक, अज्ञेयवादी : 2 अलग सवाल

नास्तिकता सवाल क्या अल्लाह मौजूद हैं? का जवाब नहीं देती। अज्ञेयवाद सवाल क्या उसे जाना जा सकता है? का भी जवाब नहीं देता। दोनों जवाब आपस में मिलते हैं बिना इक होने के : नास्तिक वुजूद का फ़ैसला करता है, अज्ञेयवादी इल्म तक पहुँच का।

इसी से 4 मंतक़ी ख़ाने बनते हैं : वह नास्तिक जो जानता है, वह अज्ञेयवादी जो तालीब-ए-मुआत्तल है, वह मोतयक़्क़िन ईमान वाला, और वह ईमान रखने वाला अज्ञेयवादी जो साबित करने का दावा किए बग़ैर इक़रार करता है। यह फ़ेहरिस्त, जिसे फ़लासफ़ी 1869 से थॉमस हक्सले के बाद इस्तेमाल करते हैं, उस आम मुक़दमे से बचाती है जो अलग-अलग मक़ामों को एक थैली में डालता है। यही यह समझाती है कि इस्लाम दोनों से एक तरह क्यों नहीं सलूक करता : नास्तिक उस चीज़ को नक़ारता है जो वह देख सकता था, अज्ञेयवादी उस चीज़ पर शक करता है जो उस तक अभी नहीं पहुँची।

क़ुरआन अज्ञेयवादी से क्या कहता है

क़ुरआन दलील की दरख़्वास्त को ठुकराता नहीं : वह उसे निशानियों की तरफ़ मोड़ता है। "आसमानों और ज़मीन की रचना तथा रात और दिन के आने-जाने में, बुद्धिमानों के लिए निशानियाँ हैं।" (क़ुरआन 3:190)।

निशानी मजबूर करने वाली दलील नहीं : वह वह मअलूमात है जिसे इमानदार ग़ौर-ओ-फ़िक्र का तक़ाज़ा है। और किताब सवाल पूछने वाले पर ही सवाल लौटाती है : "या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए हैं, या वे (स्वयं) पैदा करने वाले हैं?" (क़ुरआन 52:35)। काइनात की उत्पत्ति हुई या नहीं : दिलम्मे की दोनों शाख़ें इक पहले उसूल पर ले जाती हैं, और यहीं ग़ौर-ओ-फ़िक्र को दाख़िल होना चाहिए।

इस्लाम में शक

इस्लाम तलाश करने वाले शक और जमा होने वाले इनकार में फ़र्क़ करता है। पहले को इज़्ज़त मिलती है : इबराहीम ख़ुद तारे, चाँद और सूरज के सामने इस्तिस्ना करके अपने दिल को रचयिता पर ठहराते हैं (क़ुरआन 6:76-79), और यह गुज़रना तलाश के नमूने के तौर पर मरवा किया जाता है।

पैग़ंबर (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) सहाबा के सबसे अंदरूनी सवालों को, उनके शकों के बारे में, मुतवज्जेह करते थे, और उसमें उस ईमान की पाकी देखते थे जो आधे पर ख़ुश नहीं होती। तलाश करने वाला शक इस तरह ईमान का मरहला है, उसका दुश्मन नहीं : जिस चीज़ को इस्लाम ठुकराता है, वह फ़ैसले में बदला हुआ शक है, देखना बंद करने का इरादा।

अल्लाह की निशानियों के सामने अज्ञेयवाद

अज्ञेयवाद कहता है : जानना मोतनाही है। इस्लाम जवाब देता है : अल्लाह का इल्म बाक़ी नादिर हक़ीक़तों (दूसरे का ज़ेहन, माज़ी) के इल्म की ही क़िस्म है, उसके असरात से मुतवज्जेह। फ़ितरा, पहली फ़ितरत जिस पर हर मख़्लूक़ जन्मता है, उसमें अपने रचयिता की पहचान शामिल है (बुख़ारी 1358 से मरवा, फ़ितरा की हदीस) : यह इब्तिदाई इल्म है, जिसे तरबियत ढाँप देती है या जगा देती है।

निशानियाँ ज़ाहिरी बयानत जोड़ती हैं : काइनात की उत्पत्ति, ज़िंदगी का निज़ाम, मौत जो हर वुजूद पर मंडराती है। जिस चीज़ को अज्ञेयवाद हमेशा की बेयक़ीनी कहता है, इस्लाम उसे मौजूद बयानत के सामने मुज़ाहमत कहता है : फ़र्क़ ज़ेहनी नहीं, इरादे का है। क्या अज्ञेयवादी अल्लाह पर ईमान ला सकता है ? का पृष्ठ इस राह को ईमान तक आगे ले जाता है।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न नास्तिक और अज्ञेयवादी में अंतर

क्या अज्ञेयवादी लाज़मी बेतरफ़ होता है ?

नज़रिये में नहीं, अमल में अक्सर : इक़रार के बग़ैर बेहतर अज्ञेयवादी ऐसे जीते हैं जैसे अल्लाह मौजूद नहीं, जो अमली नास्तिकता है। इस्लाम याद दिलाता है कि ज़िंदगी ख़ुद फ़ैसला करती है : हर इंतिख़ाब, हर इम्तिहान, हर तलाश करने वाला दिल दोनों राहों में से एक पर बढ़ता है, और महदूद वुजूद में पूरी बेतरफ़ी मौजूद नहीं।

क्या अल्लाह पर शक के साथ दुआ की जा सकती है ?

तलाश करने वाला शक कुछ नहीं तोड़ता : सहाबा ख़ुद पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) से उन ख़यालात के बारे में पूछते थे जो उन्हें डराते थे, और उन्होंने उसमें ईमान की मोतसिलत देखी। तलाश के साथ दुआ करना जवाब की तरफ़ बढ़ना ही है : इस्लाम हाथ उठाने के लिए रियाज़ी यक़ीन नहीं माँगता।

अज्ञेयवादी का लफ़्ज़ किसने गढ़ा ?

थॉमस हक्सले, अंग्रेज़ बायोलॉजिस्ट, 1869 में, ईमान की बजाए इल्म-ए-हासिल के तौर पर : जो साबित न हो, वह बयान न करना। लफ़्ज़ 150 साल का है ; वह सवाल जो वह लेकर आता है, वही वही जितना पुराना है, और क़ुरआन 14 सदियों से उसका जवाब देता है।

स्रोत: क़ुरआन 3:190-191 (समझदारों के लिए निशानियाँ) · क़ुरआन 52:35 (बिना किसी चीज़ के पैदा ?) · क़ुरआन 6:76-79 (इबराहीम का तरीक़ा) · बुख़ारी 1358 (फ़ितरा)

के बारे में अन्य प्रश्न नास्तिक और अज्ञेयवादी में अंतर

आगे पढ़ें नास्तिक और अज्ञेयवादी में अंतर

بسم الله الرحمن الرحيم बुध 9 जुमादा अल-अव्वल
الأربعاء 9 جمادى الأولى
أحدب متزايد बढ़ता हुआ कूबड़ दिन 10.1 / 29.5
रोशनी 77%
5 दिनों में पूर्णिमा
حسبنا الله ونعم الوكيل अल्लाह हमारे लिए काफी है, कितना अच्छा रक्षक है

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद