होम > धर्म और मान्यताएँ > नास्तिकता : इस्लाम की नज़र में
नास्तिक हुज्जतें, इमानदारी से पेश (दलील का न मिलना, बुराई का मसला, अल्लाह को किसने बनाया), और क़ुरआन और अक़्ल का जवाब : तख़लीक़, कायनात का निज़ाम, फ़ितरत।
नास्तिकता वह मुक़ाम है जिसके मुताबिक़ अल्लाह का वजूद नहीं है ; अज्ञेयवादी सवाल को मुतहय्यिर समझता है। इस्लाम इन्हें नफ़ी वाले ऐतक़ादात समझता है जो ख़ुद भी ग़ैर-तस्दीक़-क़ाबिल मफ़रूज़ों पर टिके हैं, और अक़्ल व क़ुरआन से जवाब देता है : तख़लीक़ बेसबब नहीं (क़ुरआन 52:35), कायनात का निज़ाम अक़्ल-मंदों के लिए निशानी है (क़ुरआन 3:190-191), और फ़ितरत, इंसान की तबीअती रज्जाहत, अपने ख़ालिक़ को पहचानती है (क़ुरआन 30:30)।
यहाँ नास्तिकता की हर मशहूर हुज्जत को मावद-मंद जवाब मिलता है, बिना ग़लत तस्वीर के।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 5 मिनट पढ़ने का समयमॉडर्न नास्तिकता इक दीन नहीं, इक सवाल पर मुक़ाम है : क्या अल्लाह मौजूद है ? नास्तिक जवाब देते हैं नहीं, और बुनियादी तौर पर तीन हुज्जतों पर टिकते हैं, जिन्हें यह दस्तावेज़ जवाब देने से पहले इमानदारी से पेश करता है। पहली : अल्लाह के वजूद की सीधी तजरुबाती दलील का न मिलना।
दूसरी : बुराई का मसला, जिसे ख़ास तौर पर फ़ालसफ़ी डेविड ह्यूम ने नैसर्गिक दीन पर मुक़ालमों में तरतीब दिया : हर चीज़ पर क़ादिर और भला अल्लाह तकलीफ़ के वजूद से हमख़याल नहीं लगता।
तीसरी : सबब की बेइंतहा सिलसिला, जिसे "अल्लाह को किसने बनाया ?" के सवाल ने मशहूर किया : अगर सब को वजह चाहिए तो अल्लाह को भी। अज्ञेयवादी, वह, फ़ैसला रोक लेता है। यह सवाल संजीदा हैं और उनसे किसी तरफ़ हीनता से बेहतर सलूक क़ाबिल है।
क़ुरआन मंबे का सवाल ग़ौर-तलब बारीकी से उठाता है : "या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए हैं, या वे (स्वयं) पैदा करने वाले हैं? या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया है? बल्कि वे विश्वास ही नहीं करते।" (क़ुरआन 52:35-36)।
हुज्जत इक लकीर में है : इंसान और कायनात ख़ुद अपनी तख़लीक़ नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें मौजूद होने से पहले मौजूद होना पड़ता।
और जो चीज़ इब्तिदा रखती है उसे अपने सिवा एक बाहरी वजह चाहिए। मॉडर्न इल्म तस्दीक़ करता है कि इब्तिदा हुई (कायनात की तारीख़ है), जो सवाल को उसके मंबे की तरफ़ लौटाता है : उस इब्तिदा की वजह क्या थी ? इब्तिदा की वजह उसके अंदर नहीं हो सकती : वजह ज़रूर बाहरी, साबिक़ और मुस्तक़िल है।
इतराज़ यह मफ़रूज़ा करता है कि सब की वजह ज़रूरी है। हालाँकि मुमतनी की हुज्जत ने कभी यह नहीं कहा : वह कहती है कि जो चीज़ शुरू होती है उसकी वजह होती है। अल्लाह, मअर्रफ़ के मुताबिक़, शुरू नहीं हुए : "वही सबसे पहले है और सबसे आख़िर है और ज़ाहिर (दृश्यमान) है और पोशीदा (अदृश्य) है" (क़ुरआन 57:3), "न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।" (क़ुरआन 112)।
"ज़ात-ए-आबदी के ख़ालिक़ को पूछना" वैसा है जैसा "जिसकी तख़लीक़ ज़रूरी नहीं उसके ख़ालिक़ को पूछना" : सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ाली हो जाता है।
उलट, नास्तिक बदल (बिना वजह के नेहायत से निकली कायनात, या वजहों का बेइंतहा सिलसिला) उस उसूल-ए-हिक्मत के मुख़ालिफ़ है जिसे वह दूसरी जगह तक़ाज़ा करता है : बिना वजह इब्तिदा, या पहले से पूरी हो चुकी बेइंतहा सिलसिला, वह मुमतनअ हैं जिन्हें अक़्ल कहीं और क़बूल नहीं करती।
क़ुरआन अंधी ईमान की माँग नहीं करता : वह बार-बार मुशाहदे की तरफ़ लौटाता है।
"आसमानों और ज़मीन की रचना तथा रात और दिन के आने-जाने में, बुद्धिमानों के लिए निशानियाँ हैं। जो खड़े और बैठे और अपनी करवटों पर लेटे हुए अल्लाह को याद करते हैं तथा आसमानों और ज़मीन की रचना में सोच-विचार करते हैं। (वे कहते हैं :) ऐ हमारे पालनहार! तूने यह सब कुछ बेकार नहीं रचा है।" (क़ुरआन 3:190-191)।
तरतीब की हुज्जत मुअादले की जगह लेने का दावा नहीं करती : वह कहती है कि निज़ाम, फ़िज़िक़ी आँकड़ों की बारीकी, ज़िंदा चीज़ की पेचीदगी और शुऊर के उभरने से मर्रा से ज़्यादा इरादे से हमख़याल हैं।
जो किताब देखता है वह यह नहीं सोचता कि स्याही ख़ुद इंतिज़ाम में आ गई।
कायनात किसी किताब से ज़्यादा मुनज़्ज़म है। यह तरीक़ा रियाज़ी दलील नहीं : यह अक़्ली क़यास है, वही जो हम हर दूसरी जगह इस्तेमाल करते हैं।
ह्यूम का इतराज़ यह मफ़रूज़ा करता है कि अगर अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर और भला है तो तकलीफ़ न होनी चाहिए। इस्लामी जवाब तीन नुक़्तों में है।
एक : ज़िंदगी नेमतों की मंज़िल नहीं बल्कि आज़माइश है : "जिसने मृत्यु तथा जीवन को पैदा किया, ताकि तुम्हारा परीक्षण करे कि तुम में किसका कर्म अधिक अच्छा है?" (क़ुरआन 67:2) ;
बिना मुश्किल की आज़माइश कुछ आज़माती नहीं।
दो : इंसानी बुराई इरादे की आज़ादी से निकलती है, जिसके बग़ैर कोई अच्छाई अपनी क़ीमत नहीं रखती ; इंसान अपने इंतिख़ाब का जवाबदेह है, और मज़लूम भूले नहीं जाते : "अल्लाह को उससे हरगिज़ असावधान न समझो, जो अत्याचारी लोग कर रहे हैं!" (क़ुरआन 14:42) ; हर ज़ुल्म हिसाब के दिन अदा होगा, कोई सिलवट नहीं रहती।
तीन : ज़ाहिरी बुराई (तरबियत करने वाली आज़माइश, बड़ी तबाही रोकने वाली बुराई) उस पूरी हिकमत में है जिसे हमारी जुज़वी नज़र नहीं घेरती : जिस पजल की सिर्फ़ एक कड़ी दिखे उससे तस्वीर पर हुक्म नहीं चलता।
नास्तिकता, उलट, आख़िरकार बुराई को "मर्रे का आँकड़ा" कहने पर आती है, जिससे ज़ुल्म की वही मफ़हूम मिट जाती है जिसे वह क़बूल करती थी : अगर सब मर्रा है तो कुछ भी सचमुच नाइंसाफ़ी नहीं।
क़ुरआन इंसान की तबीअती रज्जाहत को फ़ितरत कहता है : "आप एकाग्र होकर अपने चेहरे को इस धर्म की ओर स्थापित करें। उस फ़ितरत पर जमे रहें, जिसपर अल्लाह ने लोगों को पैदा किया है" (क़ुरआन 30:30)। मौत के सामने, आसमान की वसीहत में, किसी अज़ीज़ के जुदा होने पर, बेआदा ज़ुल्म पर, इंसान बे-इख़्तियार किसी सुनने वाले को पुकारता है : यह हर माशरे में ग़ौर-तलब इंसानशनासी हक़ीक़त है, जिसे सरकारी तौर पर नास्तिक माशरे भी नहीं मिटा सके। इस्लाम तबीअत के मुख़ालिफ़ ईमान की माँग नहीं करता, बल्कि उसी की तरफ़ लौटने को कहता है।
और वह ऐसी रहमत पेश करता है जो असली सवालों का जवाब देती है : "अल्लाह की दया से निराश न हो" (क़ुरआन 39:53)।
आरज़ी शक ईमान से नफ़्ज़ात नहीं करता : दिल की सच्ची यक़ीनी इस्लाम में दाख़िले के लिए काफ़ी है, और सवाल बाद में, एक-एक करके हल होते हैं। मुसलमान कैसे बनें का सिलसिला अमली सवालों का जवाब देता है, शहादे से पहली नमाज़ तक, और किसी बंद रह जाने वाले सवाल पर आप साइट के राबेता फ़ॉर्म से लिख सकते हैं।
सवाल ख़ुद-अपने-आप-का-ख़िलाफ़ है : तख़लीक़ इब्तिदा माँगती है, और अल्लाह की मअर्रफ़ के मुताबिक़ बेइब्तिदा है, "वही सबसे पहले है और सबसे आख़िर है" (क़ुरआन 57:3)। ज़ात-ए-आबदी के ख़ालिक़ पूछना यह पूछना है कि जिसकी तख़लीक़ ज़रूरी नहीं उसे किसने बनाया। जो चीज़ शुरू हुई उसकी वजह है ; अल्लाह शुरू नहीं हुए।
नहीं : इल्म बयान करता है कि कायनात कैसे चलती है, ईमान जवाब देता है कि वह क्यों मौजूद है और उसका मअनी क्या है। दोनों अलग-अलग ज़मीन पर खड़े हैं। क़ुरआन बार-बार तख़लीक़ के मुशाहदे की दावत देता है (क़ुरआन 3:190-191) : इल्मी तहक़ीक़ उसके मुख़ालिफ़ नहीं, उसका हमसफ़र है।
ज़िंदगी इक आज़माइश है : "जिसने मृत्यु तथा जीवन को पैदा किया, ताकि तुम्हारा परीक्षण करे कि तुम में किसका कर्म अधिक अच्छा है?" (क़ुरआन 67:2)। इंसानी बुराई इरादे की आज़ादी से निकलती है, ज़ाहिरी बुराई उस हिकमत में है जिसका हम अंदाज़ा नहीं लगाते, और हर ज़ुल्म हिसाब के दिन अदा होगा : कुछ बेतरतीब नहीं छोड़ा गया।