अल्लाह का वजूद

होम > धर्म और मान्यताएँ > नास्तिकता : इस्लाम की नज़र में > अल्लाह का वजूद

इब्तिदा की हुज्जत, दुनिया का निज़ाम, फ़ितरत और तजरुबाती दलील की तक़ाज़ा का जवाब : अल्लाह के वजूद की दलीलें, क़ुरआन और क्लासिकी मुतकल्लिमीन के साथ पेश।

इस्लाम अल्लाह के वजूद के लिए तीन ख़ानदानों की हुज्जतें पेश करता है : कायनात का इब्तिदा (जो चीज़ शुरू होती है उसकी वजह उसके सिवा होती है), दुनिया का निज़ाम (इरादे की निशानियाँ, क़ुरआन 3:190-191) और फ़ितरत, इंसान में अमारत-शुदा तबीअती इल्म (क़ुरआन 30:30)। इनमें से कोई मुअादला बनने का दावा नहीं करता : यह अक़्ली क़यास हैं, वही तरीक़ा जो हम हर दूसरी जगह इस्तेमाल करते हैं।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

📖 2 मिनट पढ़ने का समय

अल्लाह का वजूद : कायनात का इब्तिदा

पहली हुज्जत इक हक़ीक़त से शुरू होती है जिसकी मौजूदा इल्म तस्दीक़ करती है : कायनात का इब्तिदा हुआ। और जो चीज़ शुरू होती है उसे अपने सिवा वजह चाहिए : कुछ ख़ुद को पैदा नहीं करता, क्योंकि इसके लिए मौजूद होने से पहले मौजूद होना पड़ता। माद्दी और ज़मानी इब्तिदे की वजह न माद्दा हो सकती है न वक़्त : वह ग़ैर-माद्दी, बेइब्तिदा और फ़ैसले की हक़्क़दार है।

मुसलमानों के क्लासिकी मुतकल्लिमीन, अल-ग़ज़ाली से इब्न तैमिया तक, ने यह हुज्जत उस इल्म-उल-हयअत से सदियों पहले तरतीब दी जिसने कायनात का इब्तिदा तस्दीक़ किया।

क़ुरआन उसे इक सवाल में रखता है : "या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए हैं, या वे (स्वयं) पैदा करने वाले हैं?" (क़ुरआन 52:35)।

दुनिया के निज़ाम में अल्लाह की निशानियाँ

दूसरी हुज्जत वह देखती है जो पहले से मौजूद है : दहशत जन्मेह बारीकी से बराबर ठहराए गए फ़िज़िक़ी आँकड़े, ज़िंदा चीज़ की पेचीदगी, ऐसे शुऊर का उभरना जो पूरे को देख सकता है। क़ुरआन इन चीज़ों को "निशानियाँ" कहता है और पढ़ने की दावत देता है : "आसमानों और ज़मीन की रचना तथा रात और दिन के आने-जाने में, बुद्धिमानों के लिए निशानियाँ हैं" (क़ुरआन 3:190)। जो तरतीब से सजी लाइब्रेरी ढूँढता है वह यह नहीं समझता कि हरूफ़ ख़ुद इंतिज़ाम में आ गए।

मर्रा वाक़िए समझाता है, मुनज़्ज़म और मअनी-देहिंदा निज़ाम नहीं : सबसे तबीअती क़यास यही है कि इस निज़ाम से पहले इक अक़्ल थी।

फ़ितरत : अमारत-शुदा इल्म

तीसरी हुज्जत अंदरूनी है : फ़ितरत, वह तबीअती रज्जाहत जिससे इंसान, वसीहत, मौत या ज़ुल्म के सामने, बे-इख़्तियार किसी सुनने वाले को पुकारता है। "आप एकाग्र होकर अपने चेहरे को इस धर्म की ओर स्थापित करें। उस फ़ितरत पर जमे रहें, जिसपर अल्लाह ने लोगों को पैदा किया है" (क़ुरआन 30:30)। यह पनाह हर माशरे में ग़ौर-तलब इंसानशनासी हक़ीक़त है, और सरकारी तौर पर नास्तिक माशरे भी उसे मिटा न सके।

इस्लाम तबीअत के मुख़ालिफ़ ईमान की माँग नहीं करता, बल्कि उसी की तरफ़ लौटने को कहता है।

अल्लाह का वजूद : क़ाबिल-ए-क़बूल दलील क्या है ?

बचा तजरुबाती, नापने वाली और दोबारा अंजाम-देहिंदा दलील का मॉडर्न तक़ाज़ा। पूछने वाला सवाल : यह तरीक़ा किस हक़ीक़त के लिए बना था ? माद्दा को नापने के लिए।

रूह, इरादा, मअनी वज़न में नहीं आते : कोई लैब तुम्हारी वालिदा की मोहब्बत कभी नाप नहीं सकेगा, और कोई इस वजह से उसका इनकार नहीं करेगा।

अल्लाह से माइक्रोस्कोप में आने की गुज़ारिश, सवाल से पहले जवाब को मअर्रफ़ की हद तक नफ़्ज़ात करती है। क़ुरआन की पेश-शुदा दलीलें सब से पक्की ज़मीन पर हैं : इब्तिदा, निज़ाम, और देखने वाले की गहरी तबीअत। नास्तिकता : इस्लाम की नज़र में का पृष्ठ उलट इतराज़ों का जवाब देता है, और अल्लाह को किसने बनाया ? का पृष्ठ सबसे आम इतराज़ संभालता है।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न अल्लाह का वजूद

क्या अल्लाह का वजूद मुअादले की तरह साबित किया जा सकता है ?

नहीं, और यह दोनों तरफ़ से है : अल्लाह का वजूद लैब में साबित नहीं होता, मगर उसका न मिलना भी वहाँ साबित नहीं होता। पेश-शुदा दलीलें अक़्ली क़यास हैं : हक़ाइक़ के हिसाब से सबसे मंतक़ी, किसी फ़ॉर्मूले का हिसाब नहीं।

ईमान के लिए दलीलें चाहिए या ईमान ही काफ़ी है ?

क़ुरआन कभी हक़ीक़त के मुख़ालिफ़ ईमान की माँग नहीं करता : वह हुज्जत करता है, सवाल उठाता है, मुशाहदे की दावत देता है (क़ुरआन 3:190-191)। ईमान तब आता है जब दिल की यक़ीनी अक़्ल के पीछे चलती है, और फिर अमल से बड़ी होती है।

स्रोत: क़ुरआन 52:35 · क़ुरआन 3:190-191 · क़ुरआन 30:30 · अल-ग़ज़ाली और इब्न तैमिया (क्लासिकी मुतकल्लिमीन)

के बारे में अन्य प्रश्न अल्लाह का वजूद

आगे पढ़ें अल्लाह का वजूद

بسم الله الرحمن الرحيم बुध 9 जुमादा अल-अव्वल
الأربعاء 9 جمادى الأولى
أحدب متزايد बढ़ता हुआ कूबड़ दिन 10.1 / 29.5
रोशनी 77%
5 दिनों में पूर्णिमा
لا إله إلا الله अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद