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सिख गुरु ग्रंथ साहिब के मुताबिक़ क्या मानते हैं : अकेला माबूद (इक ओअंकार), बुतों और ज़ातों का इनकार, दस गुरु। इस्लाम के साथ असली क़रीबत और इख़्तिलाफ़।
पंजाब में 15वीं सदी में गुरु नानक के साथ जन्मा सिख धर्म बेशक्ल अकेले माबूद (इक ओअंकार), बुतों, ज़ातों और ख़ाली रस्मों के इनकार, इमानदार मेहनत और बाँटने की तालीम देता है। अक़ीदी तौर पर यह इस्लामी तौहीद के सबसे क़रीब भारतीय रिवायत है, और नानक के साथियों में मुसलमान भी थे। इख़्तिलाफ़ : गुरुओं की वह क़तार जो नुस (गुरु ग्रंथ साहिब) पर ख़त्म होकर ज़िंदा मोतबर बन गई, और आत्माओं का पुनर्जन्म जिसे क़ुरआन अकेले दोबारा जी उठने से बदल देता है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयसिख धर्म 15वीं सदी में पंजाब में गुरु नानक (1469-1539) के साथ जन्मा, ऐसी भारतीय दुनिया में जो हिन्दू रस्मों और इस्लामी रिवाज़ों के दरमियान खिंचती थी। नानक ने अकेले माबूद की दावत दी, बिना शक्ल और बिना तस्वीर, रचयिता और रहमत-मंद, यह कि दुआ मेक़ानी हज़ से बेहतर है, यह कि इमानदार मेहनत और अपने खाने में हिस्सा देना हर रस्म से बाला है, और यह कि माबूद के सामने ज़ातें बेमानी हैं।
नौ गुरु उनके बाद आए ;
दसवें, गोबिंद सिंह ने क़तार को इस तरह ख़त्म किया कि पवित्र नुस, गुरु ग्रंथ साहिब, क़ौम का "हमेशा का गुरु" बन गया।
यह नुस, सलामतें और नज़्में, इब्तिदा में ही इलाही वहदत (इक ओअंकार) बयान करता है और अलग-अलग आवाज़ें जमा करता है, जिनमें मुसलमान और मख़्लूस हिन्दू मुअल्लिफ़ों की रचनाएँ भी हैं : किसी बुनियादी नुस में बीन-मज़हबी खुलेपन का तक़रीबन यक़ीनी मिसाल (देनिस मात्रेंग, सिख धर्म के मुतख़स्सिस, इस मुशतरका विरासत के हिस्से को रोशन करते हैं)।
भारत में जन्मी रिवायतों में सिख धर्म इस्लामी तौहीद के सबसे क़रीब है : बिना तस्वीर अकेला माबूद, बुतपरस्ती की मना, ज़ातों की बेमानी, इलाही नाम के ज़िक्र (सिमरन, ज़िक्र के क़रीब) की अहमियत, ख़ैर और बाँटा हुआ दस्तरख़्वान (लंगर, सबके लिए खुला क़ौमी खाना, बिना ज़ात और बिना मज़हब की तफ़रीक़)।
गुरु नानक एक मुसलमान साथी, भाई मरदाना के साथ सफ़र करते थे, और उनका पैग़ाम इस्लामी माहौल में अदा हुआ : पंजाब में दोनों रिवायतों की तारीख़ हमसायगी, मुक़ालमों और मुशतरका इम्तिहानों की तारीख़ है। इस्लाम हर ग़ैर-मुहारिब के साथ इस ठीक हमसायगी की दावत देता है (क़ुरआन 60:8) और धर्म में ज़बरदस्ती से मना करता है (क़ुरआन 2:256)।
तीन इख़्तिलाफ़ बने रहते हैं। पहला : वही।
सिख धर्म दस गुरुओं के तजुर्बे और तालीम पर टिका है, जो ज़िंदा नुस पर ख़त्म होता है ;
इस्लाम उस पैग़ंबरी क़तार पर कायम है जो मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) पर मुहर-बंद हुई, रिवायत-हुई किताब के साथ, गढ़ी हुई नहीं।
दूसरा : माबूद का अक़ीदा। वाहेगुरु अकेले माबूद के क़रीब है, मगर इस्लामी तौहीद वह बयान करता है जो सिख धर्म नहीं करता : अल्लाह बोलता है, रसूल भेजता है, फ़ैसला करता है, और अपनी मख़्लूक़ात से जुदा है ; क़ुरआन ख़ुलासा करता है : "(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है।" (क़ुरआन 112)।
तीसरा : आत्माओं का पुनर्जन्म, हिन्दू माहौल की विरासत, जिसे क़ुरआन अकेली ज़िंदगी, अकेली मौत और अकेले दोबारा जी उठने से बदल देता है, शख़्सी फ़ैसले के साथ।
इन बातों पर मुक़ालमा उसी तरीक़े से जारी है : सिख धर्म उसके मानने वालों की ज़िंदगी जैसा वह जीते हैं, पेश करना, और इस्लामी जवाब अपनी सरचश्मों के साथ रखना।
हाँ : गुरु ग्रंथ साहिब की इब्तिदाई इबारत (इक ओअंकार) बेशक्ल अकेली हक़ीक़त बयान करती है, जिसे सिख धर्म वाहेगुरु कहता है। यही मख़्लूस तौहीद सिख धर्म को भारत में जन्मी रिवायतों में इस्लाम से सबसे ज़्यादा क़रीब लाता है, हालाँकि उसमें माबूद का अक़ीदा तौहीद से अलग है।
पगड़ी (दस्तार) और न काटे हुए बाल (केश) दसवें गुरु द्वारा ठहराई गई 5 ज़ाहिरी निशानियों में से हैं जो सिख पहचान को दर्शाती हैं। ये क़ौमी और रूहानी निशानियाँ हैं, इस्लामी दीन में इनका कोई दीनी हमनाम नहीं।