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अगर आप सच्चे दिल से ईमान लाते हैं, तो शहादा अभी, जहाँ भी हैं, अदा कर सकते हैं। इबारत, मअनी, फिर पहले घंटे और पहले दिन।
अगर आप सच्चे दिल से ईमान लाते हैं कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं और मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) उसके रसूल हैं, तो शहादा अभी, जहाँ भी हैं, अदा कर सकते हैं : न कोई मस्जिद, न कोई गवाह, न कोई रस्म ज़रूरी है, और इस्लाम अपने से पहले के सब कुछ को मिटा देता है (सहीह मुस्लिम 121)। पहले इसका मअनी पढ़ें, यक़ीन के साथ अदा करें, फिर पहले क़दम अपनाएँ : दुआ, मंसून ग़ुस्ल, और नमाज़ की तालीम।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयबस इतना जाँच लें कि आपका दिल ये बातें मानता है : अल्लाह अकेला पैदा करने वाला है, बेशरीक, इबादत के लायक़ अकेला ; मुहम्मद (उन पर सलाम हो) उसके रसूल और आख़िरी पैग़ंबर हैं (क़ुरआन 47:19) ; क़ुरआन अल्लाह का कलाम है।
आपको सब कुछ जानने या समझने की ज़रूरत नहीं : इन बुनियादों का सच्चा यक़ीन काफ़ी है, और बाक़ी सीखा जाता है।
अगर यह आपकी सूरत है, तो आप अभी तैयार हैं।
सुकून का लम्हा चुनें। बुलंद या धीमी आवाज़ में अदा करें :
أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَٰهَ إِلَّا اللهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللهِ
Phonétique : Ash-hadou an la ilaha illa-Llah, wa ash-hadou anna Mouhammadan rassoulou-Llah.
मअनी : "मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।"
अगर आपने इसे इख़लास के साथ अदा किया है : मुबारक हो, आप मुसलमान हैं, और इस्लाम से पहले के आपके सारे गुनाह मिटा दिए गए हैं (सहीह मुस्लिम 121)। इस मिनट आपसे इसके सिवा कुछ नहीं माँगा जाता।
करोड़ों लोग आप से पहले इस दरवाज़े से गुज़रे, और नए मुसलमानों की राहबरी के लिए पूरी जमाअतें मौजूद हैं : मस्जिदें, इदारे, तजुर्बा-मंद मुहतदी। जब चाहें, मुकम्ल सफ़र पढ़ें, और अगर कोई सवाल राह रोक रहा हो तो हमें साइट के संपर्क फ़ॉर्म से लिखें : हम जवाब देते हैं, और आपके क़रीब भरोसेमंद लोगों की तरफ़ राह दिखाते हैं।
हाँ। गवाही ज़रीए (साधन) पर मोतबर नहीं : यहीं मअनी पढ़ें, फिर अपने मुँह से इख़लास के साथ अदा करें, यही पूरी तरह काफ़ी है।
अगर आपका दिल गवाही के दोनों हिस्सों को मानता है (अकेला अल्लाह, मुहम्मद (उन पर सलाम हो) आख़िरी रसूल), तो बाक़ी सवाल आम हैं : सीखते हुए वाज़िह हो जाएँगे। वे इस्लाम में दाख़िले में रुकावट नहीं।
कोई नहीं, अगर आप नहीं चाहें। बग़ैर किसी ऐलान के इस्लाम में आना जायज़ है, और आप बाद में तय करेंगे कि किसे, कब और कैसे बताना है।