मुसहफ़ का पृष्ठ 535 34 आयतों को समाहित करता है। यह जुज़ 27, हिज़्ब 54 में है।
05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया
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يَطُوفُ عَلَيْهِمْ وِلْدَٰنٌۭ مُّخَلَّدُونَ ﴿17﴾
नौजवान लड़के जो (बेहिश्त में) हमेशा (लड़के ही बने) रहेंगे
بِأَكْوَابٍۢ وَأَبَارِيقَ وَكَأْسٍۢ مِّن مَّعِينٍۢ ﴿18﴾
(शरबत वग़ैरह के) सागर और चमकदार टोंटीदार कंटर और शफ्फ़ाफ़ शराब के जाम लिए हुए उनके पास चक्कर लगाते होंगे
لَّا يُصَدَّعُونَ عَنْهَا وَلَا يُنزِفُونَ ﴿19﴾
जिसके (पीने) से न तो उनको (ख़ुमार से) दर्दसर होगा और न वह बदहवास मदहोश होंगे
وَفَـٰكِهَةٍۢ مِّمَّا يَتَخَيَّرُونَ ﴿20﴾
और जिस क़िस्म के मेवे पसन्द करें
وَلَحْمِ طَيْرٍۢ مِّمَّا يَشْتَهُونَ ﴿21﴾
और जिस क़िस्म के परिन्दे का गोश्त उनका जी चाहे (सब मौजूद है)
وَحُورٌ عِينٌۭ ﴿22﴾
और बड़ी बड़ी ऑंखों वाली हूरें
كَأَمْثَـٰلِ ٱللُّؤْلُؤِ ٱلْمَكْنُونِ ﴿23﴾
जैसे एहतेयात से रखे हुए मोती
جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ﴿24﴾
ये बदला है उनके (नेक) आमाल का
لَا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًۭا وَلَا تَأْثِيمًا ﴿25﴾
वहाँ न तो बेहूदा बात सुनेंगे और न गुनाह की बात
إِلَّا قِيلًۭا سَلَـٰمًۭا سَلَـٰمًۭا ﴿26﴾
(फहश) बस उनका कलाम सलाम ही सलाम होगा
وَأَصْحَـٰبُ ٱلْيَمِينِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلْيَمِينِ ﴿27﴾
और दाहिने हाथ वाले (वाह) दाहिने हाथ वालों का क्या कहना है
فِى سِدْرٍۢ مَّخْضُودٍۢ ﴿28﴾
बे काँटे की बेरो और लदे गुथे हुए
وَطَلْحٍۢ مَّنضُودٍۢ ﴿29﴾
केलों और लम्बी लम्बी छाँव
وَظِلٍّۢ مَّمْدُودٍۢ ﴿30﴾
और झरनो के पानी
وَمَآءٍۢ مَّسْكُوبٍۢ ﴿31﴾
और अनारों
وَفَـٰكِهَةٍۢ كَثِيرَةٍۢ ﴿32﴾
मेवो में होंगें
لَّا مَقْطُوعَةٍۢ وَلَا مَمْنُوعَةٍۢ ﴿33﴾
जो न कभी खत्म होंगे और न उनकी कोई रोक टोक
وَفُرُشٍۢ مَّرْفُوعَةٍ ﴿34﴾
और ऊँचे ऊँचे (नरम गद्दो के) फ़र्शों में (मज़े करते) होंगे
إِنَّآ أَنشَأْنَـٰهُنَّ إِنشَآءًۭ ﴿35﴾
(उनको) वह हूरें मिलेंगी जिसको हमने नित नया पैदा किया है
فَجَعَلْنَـٰهُنَّ أَبْكَارًا ﴿36﴾
तो हमने उन्हें कुँवारियाँ प्यारी प्यारी हमजोलियाँ बनाया
عُرُبًا أَتْرَابًۭا ﴿37﴾
(ये सब सामान)
لِّأَصْحَـٰبِ ٱلْيَمِينِ ﴿38﴾
दाहिने हाथ (में नामए आमाल लेने) वालों के वास्ते है
ثُلَّةٌۭ مِّنَ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿39﴾
(इनमें) बहुत से तो अगले लोगों में से
وَثُلَّةٌۭ مِّنَ ٱلْـَٔاخِرِينَ ﴿40﴾
और बहुत से पिछले लोगों में से
وَأَصْحَـٰبُ ٱلشِّمَالِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلشِّمَالِ ﴿41﴾
और बाएं हाथ (में नामए आमाल लेने) वाले (अफसोस) बाएं हाथ वाले क्या (मुसीबत में) हैं
فِى سَمُومٍۢ وَحَمِيمٍۢ ﴿42﴾
(दोज़ख़ की) लौ और खौलते हुए पानी
وَظِلٍّۢ مِّن يَحْمُومٍۢ ﴿43﴾
और काले सियाह धुएँ के साये में होंगे
لَّا بَارِدٍۢ وَلَا كَرِيمٍ ﴿44﴾
जो न ठन्डा और न ख़ुश आइन्द
إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَبْلَ ذَٰلِكَ مُتْرَفِينَ ﴿45﴾
ये लोग इससे पहले (दुनिया में) ख़ूब ऐश उड़ा चुके थे
وَكَانُوا۟ يُصِرُّونَ عَلَى ٱلْحِنثِ ٱلْعَظِيمِ ﴿46﴾
और बड़े गुनाह (शिर्क) पर अड़े रहते थे
وَكَانُوا۟ يَقُولُونَ أَئِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًۭا وَعِظَـٰمًا أَءِنَّا لَمَبْعُوثُونَ ﴿47﴾
और कहा करते थे कि भला जब हम मर जाएँगे और (सड़ गल कर) मिटटी और हडिडयाँ (ही हडिडयाँ) रह जाएँगे
أَوَءَابَآؤُنَا ٱلْأَوَّلُونَ ﴿48﴾
तो क्या हमें या हमारे अगले बाप दादाओं को फिर उठना है
قُلْ إِنَّ ٱلْأَوَّلِينَ وَٱلْـَٔاخِرِينَ ﴿49﴾
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि अगले और पिछले
لَمَجْمُوعُونَ إِلَىٰ مِيقَـٰتِ يَوْمٍۢ مَّعْلُومٍۢ ﴿50﴾
सब के सब रोजे मुअय्यन की मियाद पर ज़रूर इकट्ठे किए जाएँगे