रुकू 326 सूरह Ash-Shuara (आयत 192 से 227) से है। इसमें 36 आयतें हैं और यह जुज़ 19 में है।
05 अगस्त 2026 को 16h34 बजे अपडेट किया गया
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وَإِنَّهُۥ لَتَنزِيلُ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ ﴿192﴾
और (ऐ रसूल) बेशक ये (क़ुरान) सारी ख़ुदायी के पालने वाले (ख़ुदा) का उतारा हुआ है
نَزَلَ بِهِ ٱلرُّوحُ ٱلْأَمِينُ ﴿193﴾
जिसे रुहुल अमीन (जिबरील) साफ़ अरबी ज़बान में लेकर तुम्हारे दिल पर नाज़िल हुए है
عَلَىٰ قَلْبِكَ لِتَكُونَ مِنَ ٱلْمُنذِرِينَ ﴿194﴾
ताकि तुम भी और पैग़म्बरों की तरह
بِلِسَانٍ عَرَبِىٍّۢ مُّبِينٍۢ ﴿195﴾
लोगों को अज़ाबे ख़ुदा से डराओ
وَإِنَّهُۥ لَفِى زُبُرِ ٱلْأَوَّلِينَ ﴿196﴾
और बेशक इसकी ख़बर अगले पैग़म्बरों की किताबों मे (भी मौजूद) है
أَوَلَمْ يَكُن لَّهُمْ ءَايَةً أَن يَعْلَمَهُۥ عُلَمَـٰٓؤُا۟ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ﴿197﴾
क्या उनके लिए ये कोई (काफ़ी) निशानी नहीं है कि इसको उलेमा बनी इसराइल जानते हैं
وَلَوْ نَزَّلْنَـٰهُ عَلَىٰ بَعْضِ ٱلْأَعْجَمِينَ ﴿198﴾
और अगर हम इस क़ुरान को किसी दूसरी ज़बान वाले पर नाज़िल करते
فَقَرَأَهُۥ عَلَيْهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ مُؤْمِنِينَ ﴿199﴾
और वह उन अरबो के सामने उसको पढ़ता तो भी ये लोग उस पर ईमान लाने वाले न थे
كَذَٰلِكَ سَلَكْنَـٰهُ فِى قُلُوبِ ٱلْمُجْرِمِينَ ﴿200﴾
इसी तरह हमने (गोया ख़ुद) इस इन्कार को गुनाहगारों के दिलों में राह दी
لَا يُؤْمِنُونَ بِهِۦ حَتَّىٰ يَرَوُا۟ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَلِيمَ ﴿201﴾
ये लोग जब तक दर्दनाक अज़ाब को न देख लेगें उस पर ईमान न लाएँगे
فَيَأْتِيَهُم بَغْتَةًۭ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ ﴿202﴾
कि वह यकायक इस हालत में उन पर आ पडेग़ा कि उन्हें ख़बर भी न होगी
فَيَقُولُوا۟ هَلْ نَحْنُ مُنظَرُونَ ﴿203﴾
(मगर जब अज़ाब नाज़िल होगा) तो वह लोग कहेंगे कि क्या हमें (इस वक्त क़ुछ) मोहलत मिल सकती है
أَفَبِعَذَابِنَا يَسْتَعْجِلُونَ ﴿204﴾
तो क्या ये लोग हमारे अज़ाब की जल्दी कर रहे हैं
أَفَرَءَيْتَ إِن مَّتَّعْنَـٰهُمْ سِنِينَ ﴿205﴾
तो क्या तुमने ग़ौर किया कि अगर हम उनको सालो साल चैन करने दे
ثُمَّ جَآءَهُم مَّا كَانُوا۟ يُوعَدُونَ ﴿206﴾
उसके बाद जिस (अज़ाब) का उनसे वायदा किया जाता है उनके पास आ पहुँचे
مَآ أَغْنَىٰ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يُمَتَّعُونَ ﴿207﴾
तो जिन चीज़ों से ये लोग चैन किया करते थे कुछ भी काम न आएँगी
وَمَآ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ إِلَّا لَهَا مُنذِرُونَ ﴿208﴾
और हमने किसी बस्ती को बग़ैर उसके हलाक़ नहीं किया कि उसके समझाने को (पहले से) डराने वाले (पैग़म्बर भेज दिए) थे
ذِكْرَىٰ وَمَا كُنَّا ظَـٰلِمِينَ ﴿209﴾
और हम ज़ालिम नहीं है
وَمَا تَنَزَّلَتْ بِهِ ٱلشَّيَـٰطِينُ ﴿210﴾
और इस क़ुरान को शयातीन लेकर नाज़िल नही हुए
وَمَا يَنۢبَغِى لَهُمْ وَمَا يَسْتَطِيعُونَ ﴿211﴾
और ये काम न तो उनके लिए मुनासिब था और न वह कर सकते थे
إِنَّهُمْ عَنِ ٱلسَّمْعِ لَمَعْزُولُونَ ﴿212﴾
बल्कि वह तो (वही के) सुनने से महरुम हैं
فَلَا تَدْعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ فَتَكُونَ مِنَ ٱلْمُعَذَّبِينَ ﴿213﴾
(ऐ रसूल) तुम ख़ुदा के साथ किसी दूसरे माबूद की इबादत न करो वरना तुम भी मुबतिलाए अज़ाब किए जाओगे
وَأَنذِرْ عَشِيرَتَكَ ٱلْأَقْرَبِينَ ﴿214﴾
और (ऐ रसूल) तुम अपने क़रीबी रिश्तेदारों को (अज़ाबे ख़ुदा से) डराओ
وَٱخْفِضْ جَنَاحَكَ لِمَنِ ٱتَّبَعَكَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ ﴿215﴾
और जो मोमिनीन तुम्हारे पैरो हो गए हैं उनके सामने अपना बाजू झुकाओ
فَإِنْ عَصَوْكَ فَقُلْ إِنِّى بَرِىٓءٌۭ مِّمَّا تَعْمَلُونَ ﴿216﴾
(तो वाज़ेए करो) पस अगर लोग तुम्हारी नाफ़रमानी करें तो तुम (साफ साफ) कह दो कि मैं तुम्हारे करतूतों से बरी उज़ ज़िम्मा हूँ
وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱلْعَزِيزِ ٱلرَّحِيمِ ﴿217﴾
और तुम उस (ख़ुदा) पर जो सबसे (ग़ालिब और) मेहरबान है
ٱلَّذِى يَرَىٰكَ حِينَ تَقُومُ ﴿218﴾
भरोसा रखो कि जब तुम (नमाजे तहज्जुद में) खड़े होते हो
وَتَقَلُّبَكَ فِى ٱلسَّـٰجِدِينَ ﴿219﴾
और सजदा
إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ ﴿220﴾
करने वालों (की जमाअत) में तुम्हारा फिरना (उठना बैठना सजदा रुकूउ वगैरह सब) देखता है
هَلْ أُنَبِّئُكُمْ عَلَىٰ مَن تَنَزَّلُ ٱلشَّيَـٰطِينُ ﴿221﴾
बेशक वह बड़ा सुनने वाला वाक़िफ़कार है क्या मै तुम्हें बता दूँ कि शयातीन किन लोगों पर नाज़िल हुआ करते हैं
تَنَزَّلُ عَلَىٰ كُلِّ أَفَّاكٍ أَثِيمٍۢ ﴿222﴾
(लो सुनो) ये लोग झूठे बद किरदार पर नाज़िल हुआ करते हैं
يُلْقُونَ ٱلسَّمْعَ وَأَكْثَرُهُمْ كَـٰذِبُونَ ﴿223﴾
जो (फ़रिश्तों की बातों पर कान लगाए रहते हैं) कि कुछ सुन पाएँ
وَٱلشُّعَرَآءُ يَتَّبِعُهُمُ ٱلْغَاوُۥنَ ﴿224﴾
हालाँकि उनमें के अक्सर तो (बिल्कुल) झूठे हैं और शायरों की पैरवी तो गुमराह लोग किया करते हैं
أَلَمْ تَرَ أَنَّهُمْ فِى كُلِّ وَادٍۢ يَهِيمُونَ ﴿225﴾
क्या तुम नहीं देखते कि ये लोग जंगल जंगल सरगिरदॉ मारे मारे फिरते हैं
وَأَنَّهُمْ يَقُولُونَ مَا لَا يَفْعَلُونَ ﴿226﴾
और ये लोग ऐसी बाते कहते हैं जो कभी करते नहीं
إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَذَكَرُوا۟ ٱللَّهَ كَثِيرًۭا وَٱنتَصَرُوا۟ مِنۢ بَعْدِ مَا ظُلِمُوا۟ ۗ وَسَيَعْلَمُ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ أَىَّ مُنقَلَبٍۢ يَنقَلِبُونَ ﴿227﴾
मगर (हाँ) जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए और क़सरत से ख़ुदा का ज़िक्र किया करते हैं और जब उन पर ज़ुल्म किया जा चुका उसके बाद उन्होंनें बदला लिया और जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है उन्हें अनक़रीब ही मालूम हो जाएगा कि वह किस जगह लौटाए जाएँगें