होम > मुसलमान कैसे बनें > शहादा के तुरंत बाद क्या करें ?
कोई फ़ौरी फ़र्ज़ नहीं, मगर मंसून मंज़िलें हैं : ग़ुस्ल, दुआ, फिर सही तरतीब में सीखना। जिन चीज़ों से बचना ज़रूरी है।
इस्लाम में आने के तुरंत बाद आपसे कुछ भी फ़ौरी तौर पर माँगा नहीं जाता। उलमा पाकी की निशानी के तौर पर ग़ुस्ल करने, अल्लाह से दुआ करने, फिर तरतीब से सीखने की सिफ़ारिश करते हैं : वजू, नमाज़, फिर मुसलमानी ज़िंदगी की बुनियादें। पहले के गुनाह मिटा दिए जाते हैं (सहीह मुस्लिम 121) : आप साफ़ सफ़हे से शुरू करते हैं, और सीखना दरजा-ब-दरजा होता है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयपैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने फ़रमाया : "इस्लाम अपने से पहले के सब कुछ को मिटा देता है" (सहीह मुस्लिम 121)। इस्लाम से पहले के सारे गुनाह, चाहे कितने भी बड़े हों, मिटा दिए जाते हैं और उनकी आपसे पूछताछ नहीं होगी। बस एक मुअल्ले पर सख़्ती चाहिए : लोगों के हक़ूक़।
क़र्ज़, लिया हुआ या उधार ली गई चीज़, बाक़ी मज़दूरी : दूसरे इंसानों के साथ ये ज़िम्मेदारियाँ, जितना मुमकिन हो, सुधारनी होती हैं।
क्या इस्लाम से पहले के गुनाह माफ़ हो जाते हैं ? का पृष्ठ यह मुअल्ला तफ़्सील से बयान करता है।
मुहम्मद इब्न अब्दुल वहाब की क्लासिकी किताब अल-उसूल अस-सलासा (तीन बुनियादी उसूल) मुसलमान पर सीखने के चार फ़राइज़ ठहराती है : सीखना, जो सीखे उस पर अमल करना, अपने आसपास पहुँचाना और आज़माइशों पर सब्र करना। नया मुसलमान इन्हें अपने दरजे पर पाता है : बुनियादें सीखना, उन पर अमल करना, माहौल जब इजाज़त दे बात करना, और ख़ुद पर सब्र रखना।
निम्न तरतीब वही है जिसकी सिफ़ारिश उलमा नए मुसलमानों को करते हैं :
नमाज़ कैसे सीखें ? का पृष्ठ आपको मंज़िला-ब-मंज़िला राह दिखाता है।
नहीं। इस्लाम में आने से पहले के दीनी फ़राइज़ गुनाहों के साथ मिटा दिए जाते हैं : इस्लाम में आने वाले के लिए यही उलमा का मोक़ूफ़ है।
जैसे ही सकें, मगर मंज़िलें न लाँघें : पहले वजू, फिर फ़ातिहा, फिर क़दम-ब-क़दम नमाज़। अधूरी मगर सच्ची नमाज़ न होने से बेहतर है।
नहीं, यह फ़र्ज़ नहीं। अगर आपका माहौल सरहनीय है तो बताना अच्छा क़दम है ; अगर कोई गंभीर नुक़सान का ख़तरा हो तो छुपाना जायज़ है।