इबादतों पर आधारित फ़िक़्ह पर हदीसें

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«इबादतों पर आधारित फ़िक़्ह» पर 746 समझाई गई नबवी हदीसें: अरबी पाठ, अनुवाद, व्याख्या और सीख, प्रामाणिकता की डिग्री और स्रोतों के साथ।

27 अक्टूबर 2026 को 14h02 बजे अपडेट किया गया

इबादतों पर आधारित फ़िक़्ह पर हदीसों की सूची

सह़ीह़ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) (कभी-कभी) सारी स्त्रियों के पास जाने के पश्चात एक ही दफा अंत में ग़ुस्ल (स्नान) करते थे। स़ह़ीह़ एक दीनार जो तुमने अल्लाह के रास्ते में खर्च किया, एक दीनार जो तुमने किसी दास को मुक्त करने के लिए खर्च किया, एक दीनार जो तुमने किसी निर्धन को दान किया स़ह़ीह़ तीन प्रकार के लोगों से क़लम उठा ली गई है; सोए हुए व्यक्ति से, जब तक जाग न जाए; बच्चे से, जब तक वयस्क न हो जाए और पागल से, जब तक उसकी चेतना एवं विवेक ल सह़ीह़ मैं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ नमाज़ पढ़ा करता था, तो आपकी नमाज़ भी संतुलित हुआ करती थी और आपका ख़ुतबा भी। सह़ीह़ सर्वोत्तम सदका वह है जो अपनी आवश्यकता के बराबर धन बचाकर रखने के बाद किया जाए, ऊपर वाला हाथ नीचे वाले हाथ से उत्तम है और तुममें से हर व्यक्ति को चाहिए सह़ीह़ उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अन्हु- ने सेनाओं के सेनापतियों के नाम उन लोगों के विषय में पत्र लिखकर आदेश जारी किया, जो अपनी पत्नियों से दूर रहते थे कि सह़ीह़ मोमिनों का रक्त समान है तथा वह अपने शत्रुओं के विरुद्ध एक हाथ के समान हैं। उनके दिए गए सुरक्षा-वचन का पालन सबको करना पड़ेगा। सुन लो, किसी मोमिन को किस सह़ीह़ जो अपने धन की रक्षा करते हुए मारा जाए वह शहीद है, जो अपने घर वालों की रक्षा करते हुए मारा जाए वह शहीद है, जो अपनी जान की रक्षा करते हुए मारा जाए वह भी सह़ीह़ ख़र्च करो और गिन-गिनकर न रखो, वरना अल्लाह भी तुझपर गिनकर रखेगा तथा तिजोरी बंद करके न रखो, वरना अल्लाह भी तेरे साथ यही करेगा। सह़ीह़ जब तक चुस्ती बाक़ी रहे, नमाज़ पढ़ो और चुस्ती खत्म हो जाए, तो सो जाओ। सह़ीह़ कंजूस और खर्च करने वाले का उदाहरण उन दो व्यक्तियों की तरह है, जिनपर छाती से लेकर हँसली तक लोहे के दो कवच हों। सह़ीह़ जब इमाम आमीन कहे, तो तुम आमीन कहो। क्योंकि जिसका आमीन कहना फ़रिश्तों के आमीन के साथ होगा, उसके पिछले सारे पाप क्षमा कर दिए जाएँगे। सह़ीह़ ठहरो! तुम उतना ही अमल करो, जितने की क्षमता रखते हो। अल्लाह की सौगंध, अल्लाह नहीं उकताएगा, यहाँ तक कि तुम ही उकता जाओगे। तथा आपकी नज़र में वही अमल सबसे सह़ीह़ जो व्यक्ति हलाल की कमाई से खजूर के बराबर भी कोई वस्तु सदक़ा करता है और वैसे भी अल्लाह केवल हलाल वस्तु ही को स्वीकार करता है, तो अल्लाह उसे अपने दाहिने स़ह़ीह़ तुममें से जो शादी की शक्ति रखता है, वह शादी कर ले। क्योंकि शादी निगाहों को नीचा रखने तथा शर्मगाह की सुरक्षा का एक प्रमुख कारण है। और जो शादी न कर सके, सह़ीह़ जब तुममें से कोई लोगों को नमाज़ पढ़ाए, तो हल्की पढ़ाए। क्योंकि उनके अंदर दुर्बल, रोगी तथा ज़रूरतमंद भी होते हैं। हाँ, जब अकेला नमाज़ पढ़े, तो जितनी चा सह़ीह़ हम लोग किसी सफ़र में नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ थे कि इसी बीच एक व्यक्ति सवार होकर आया। सह़ीह़ सोमवार तथा बृहस्पतिवार को सारे आमाल पेश किए जाते हैं। अतः मैं पसंद करता हूँ कि मेरे कार्य इस दशा में पेश हों कि मैं रोज़े से रहूँ। सह़ीह़ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब किसी व्यक्ति को किसी सेना अथवा उसकी छोटी टुकड़ी का नेतृत्व प्रदान करते तो उसे अल्लाह के भय तथा मुसलमान सा सह़ीह़ अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फ़ज्र की अंतिम रकात में, रुकू से सिर उठाने और 'سَمِعَ الله لمن حَمِدَه رَبَّنا ولك الحَمْدُ' कहने के बाद कहते सह़ीह़ जब हम किसी मंज़िल पर उतरते तो पालान उतारने से पहले नफ़्ल नमाज़ नही पढ़ते थे। सह़ीह़ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दो सहाबी ऐसे हैं जो नेकी के काम में कोताही नहीं करते। सह़ीह़ ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं पाक है तथा फ़रिश्तों एवं जिबरील का रब है। स़ह़ीह़ जिसने हमेशा रोज़ा रखा, उसने दरअसल रोज़ा रखा ही नहीं। महीने के तीन रोज़े साल भर रोज़ा रखने की तरह हैं। सह़ीह़ इमाम इस लिये बनाया गया है, ताकि उसका अनुसरण किया जाए। उस से मतभेद न करो। जब वह तकबीर कहे तो तुम लोग तकबीर कहो और जब रुकू करे तो तुम लोग रुकू करो और जब सह़ीह़ भय की नमाज़ का तरीक़ा, जैसा कि जाबिर (रज़ियल्लाहु अंहु) से वर्णित है। सह़ीह़ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बीमारी की अवस्था में घर में नमाज़ पढ़ी। स़ह़ीह़ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब 'سمع الله لمن حمده' (समिअल्लाहु लिमन ह़मिदहु) कहते तो हममें से कोई अपनी पीठ नहीं झुकाता, यहाँ तक कि नबी सल् सह़ीह़ हमारे और अह्ले किताब के रोज़ों में अंतर, सहरी खाना है। स़ह़ीह़ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सब लोगों से ज़्यादा दानी थे। खासकर रमज़ान में जब जिबरील अलैहिस्सलाम से आपकी मुलाक़ात होती तो और अधिक दानी हो ज सह़ीह़ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का प्रयास रहता था कि सोमवार और बृहस्पतिवार को रोज़ा रखा जाए। ह़सन अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नमाज़ से पहले कुछ ताज़ा खुज़ूर खाकर इफ़तार करते थे। स़ह़ीह़ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम प्रत्येक नमाज़ के बाद इन्हीं शब्दों के द्वारा तहलील (अल्लाह का गुणगान) करते थे। सह़ीह़ अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) किसी महीने में शाबान से अधिक रोज़ा (उपवास) नहीं रखते थे स़ह़ीह़ वह व्यक्ति जहन्नम में प्रवेश नहीं करेगा, जिसने सूरज निकलने और सूरज डूबने से पहले नमाज़ पढ़ी। सह़ीह़ यदि अगले साल तक जीवित रहा, तो मुहर्रम महीने की नौवीं तारीख़ को रोज़ा रखूँगा स़ह़ीह़ जब किसी मुसलमान के सामने फ़र्ज़ नमाज़ का समय आता है और वह अच्छी तरह वज़ू करके, पूरी विनयशीलता के साथ और अच्छे अंदाज़ में रुकू करके नमाज़ पढ़ता है, तो स़ह़ीह़ ऐसे कोई दिन नहीं हैं, जिनमें नेकी के काम करना अल्लाह के निकट इन (दस) दिनों में नेकी के काम करने से अधिक प्रिय हों।" आपकी मुराद ज़ुल-हिज्जा महीने के शु स़ह़ीह़ प्रत्येक फ़र्ज नमाज़ के पश्चात कही जाने वाली तसबीहों को कहने वाले -या उनका पालन करने वाले- नाकाम नहीं होंगे। अर्थात 33 बार सुबहानल्लाह, 33 बार अल-हम्द स़ह़ीह़ जिसने अस्र की नमाज़ छोड़ दी, उसके सभी कर्म व्यर्थ हो गए। स़ह़ीह़ जो अच्छी तरह वज़ू करता है, उसके जिस्म से पाप निकल जाते हैं, यहाँ तक कि नाख़ून के नीचे से भी निकल जाते हैं। सह़ीह़ जिस ने इस प्रकार वज़ू किया, उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं सह़ीह़ सबसे बेहतर जीवन उस व्यक्ति का है, जो अल्लाह के रास्ते में घोड़े की लगाम पकड़े रहता है सह़ीह़ जो सुब्ह की नमाज़ पढ़ता है, वह अल्लाह की सुरक्षा में रहता है सह़ीह़ जो किसी रोज़ेदार को इफ़तार करवाता है, उसे भी रोज़ा रखने वाले के समान पुण्य मिलता है स़ह़ीह़ जो मुअज़्ज़िन को अज़ान देते हुए सुनकर कहता है : أشهد أن لا إله إلا الله وحده لا شريك له وأنَّ محمداً عبده ورسولُه، رضيتُ بالله رباً وبمحمدٍ رسولاً وبا सह़ीह़ मैं अपने पिता के साथ अबू बरज़ा असलमी के पास गया। मेरे पिता ने उनसे पूछा कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फ़र्ज़ नमाज़ कैसे पढ़ते थे? सह़ीह़ तुममें से जो भी (जिहाद में) जाने वाले के घर वालों तथा उसके माल की अच्छी तरह ज़िम्मेवारी निभाएगा, उसे (जिहाद में) निकलने वाले के बराबर नेकी मिलेगी। सह़ीह़ मदीना ईर से लेकर स़ौर तक हरम है। इसमें जो व्यक्ति धर्म के नाम पर कोई नया काम करेगा या इस तरह का काम करने वाले किसी व्यक्ति को शरण देगा, उसपर अल्लाह, फ सह़ीह़ युद्ध से वापसी भी युद्ध के समान है। सह़ीह़ जो सेना जिहाद करते हुए माले-ग़नीमत प्राप्त करती है और मौत से सुरक्षित रहती है, उसे दो तिहाई प्रतिफल मिल जाता है और जो सेना माले-ग़नीमत से वंचित रहती ह ह़सन जिसने अल्लाह के मार्ग में एक दिन रोज़ा रखा, अल्लाह उसके तथा जहन्नम की आग के बीच एक खाई बना देता है, जिसका फ़ासला आकाश और धरती के बीच की दूरी के बराबर सह़ीह़ जिसने तीर अंदाज़ी सीखी, फिर उसे छोड़ दिया, वह हममें से नहीं है या उसने नाफ़रमानी की। सह़ीह़ जो किसी मृतक को ग़ुसल दे और उसके ऐबों को छुपाए, अल्लाह उसे चालिस बार क्षमा करता है। ह़सन जिसने जिहाद नहीं किया अथवा किसी मुजाहिद को तैयार नहीं किया अथवा किसी मुजाहिद के पश्चात उसके घर वालों की देख-रेख नहीं की, अल्लाह उसे क़यामत से पहले ही सह़ीह़ जो जिहाद किए बिना अथवा जिहाद के इरादे के बिना ही मर गया, वह मुनाफ़िक़ ही अवस्था में मरा। स़ह़ीह़ मुश्रिकों से अपनी जान, माल एवं ज़बान द्वारा जिहाद करो। सह़ीह़ मुसलमानों की माता आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) का यह कहना कि उन्होंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से जिहाद में निकलने की अनुमति माँगी, तो आपने फ़रमायाः सह़ीह़ अकसर ऐसा होता कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) किसी युद्ध में निकलने का इरादा करते, तो किसी और दिशा में निकलने का संकेत देते। परन्तु तबूक सह़ीह़ तुम वापस जाओ, मैं किसी मुश्रिक की मदद हरिगज़ नहीं लूँगा।
بسم الله الرحمن الرحيم गुरु 17 जुमादा अल-अव्वल
الخميس 17 جمادى الأولى
أحدب متناقص घटता हुआ कूबड़ दिन 17.7 / 29.5
रोशनी 91%
12 दिनों में अमावस्या
الحمد لله अल्लाह की सारी प्रशंसा है

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद