होम > धर्म और मान्यताएँ > ईसाई धर्म : इस्लाम की नज़र में > इस्लाम और ईसाई धर्म के बीच अंतर
दोनों धर्मों की मुवाज़नती जड़वल : अल्लाह, ईसा, ख़लासे, किताबें, मरियम, असली इत्तेफ़ाक़ के नुक़्ते, और यह कि हर इख़्तिलाफ़ ईमानदार की ज़िंदगी में क्या बदलता है।
इस्लाम और ईसाई धर्म इबराहीम का अल्लाह, ईसा और मरियम की इज़्ज़त और बहुत-सी क़दरें मुश्तरका रखते हैं। बुनियादी इख़्तिलाफ़ : अल्लाह की ज़ात (बज़बत वहदानीयत बनाम त्रित्व), ईसा की हैसियत (पैग़ंबर बनाम जिस्म में आया अल्लाह), ख़लासे (तौबा और सीधी मग़फ़िरत बनाम सलीब की फ़िदा), किताबें (क़ुरआन आख़िरी पैग़ाम बनाम तन्हा बाइबिल), और मूल पाप (इस्लाम के मुताबिक़ नफ़्ज़ात, क़ुरआन 6:164)। नीचे जड़वल में ख़ुलासा, फिर हर इख़्तिलाफ़ की तफ़सील।
विषय-सूची:
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समय| मुद्दा | इस्लाम क्या सिखाता है | ईसाई धर्म क्या सिखाता है |
|---|---|---|
| अल्लाह | बेहद अकेला ख़ालिक़, बग़ैर व्यक्ति या शरीक (क़ुरआन 112) | तीन व्यक्तियों में इक अल्लाह : बाप, इब्न, रूहुल-क़ुद्स (त्रित्व) |
| ईसा | पैग़ंबर और रसूल, मसीह, मरियम की औलाद, अल्लाह के बंदे (क़ुरआन 5:75) | सच्चा अल्लाह और सच्चा इंसान, इकलौती औलाद, जिस्म में आया अल्लाह (सीईसी, जुज़ 464) |
| आदम का गुनाह | विरासती गुनाह के तौर पर नफ़्ज़ात : हर कोई अपने अमाल का जवाबदेह (क़ुरआन 6:164) | मूल पाप पूरी इंसानियत में विरासत में आया, सलीब से फ़िदा |
| ख़लासे | ईमान, तौबा और अल्लाह की सीधी मग़फ़िरत (क़ुरआन 39:53) | मसीह की मौत और जी-उठने से फ़िदा |
| किताबें | तौरात और इंजील इलाही मंबे से ; क़ुरआन आख़िरी पैग़ाम और हिफ़ाज़त करने वाला (क़ुरआन 5:48) | बाइबिल तन्हा मुकम्ल इल्हामी कलाम (चर्चों के मुताबिक़ रिवायत के साथ) |
| मरियम | परहेज़गार, अल्लाह ने चुना, ईसा की वालिदा, इंसानी मख़लूक़ (क़ुरआन 3:42) | पवित्रा, जिस्म के मुताबिक़ अल्लाह की वालिदा, अक्सर मुअज़्ज़म और माँगी जाने वाली |
| सूली | नफ़्ज़ात : ईसा ज़िंदा उठा लिए गए (क़ुरआन 4:157-158) | ख़लासे का बुनियादी तारीख़ी वाक़िया |
| आख़िरी ज़माना | ईसा की आमद, हिसाब, जन्नत और जहन्नम | मसीह की आमद, हिसाब, आसमान और जहन्नम |
इख़्तिलाफ़ों को असली क़रीबत छुपाने नहीं देना चाहिए। दोनों धर्म इबराहीम के उसी ख़ालिक़ पर, मौत के बाद ज़िंदगी पर, हिसाब और जन्नत पर ईमान रखते हैं। क़ुरआन ईसा और मरियम की इज़्ज़त करता है, ईसा की पैदाइश को मुअज़िज़ा ठहराता है, और ईसाइयों व मुसलमानों को इक मुश्तरका बुनियाद की दावत देता है : सिर्फ़ अल्लाह की इबादत (क़ुरआन 3:64)।
वह ईसाइयों को एहले-किताब में ईमान वालों के सबसे क़रीब मोहब्बत में तक़रीबन बयान करता है (क़ुरआन 5:82)।
अख़लाक़ पर : पाबंदी से दुआ, रोज़ा, ख़ैरात, वालिदैन की इज़्ज़त, परहेज़गारी, इंसाफ़, मज़लूम पर रहम, दोनों रिवायतें बुनियादी बातें इक साथ सिखाती हैं।
यह इख़्तिलाफ़ असली हैं, हुज्जतों वाले हैं, और दोनों तरफ़ बिना ग़लत तस्वीर के जानने के क़ाबिल हैं। इस्लाम दीन में ज़बरदस्ती से मना करता है (क़ुरआन 2:256), "केवल ऐसे तरीक़े से वाद-विवाद करो, जो सबसे उत्तम हो" बहस की दावत देता है (क़ुरआन 29:46), और हर आदमी को अपने फ़ैसले का अल्लाह के सामने ज़िम्मेदार ठहराता है। अगर आपका रास्ता ईमान के सवाल तक पहुँचता है, तो मुसलमान कैसे बनें का सिलसिला अमली सवालों का जवाब देता है, गवाही से पहली नमाज़ तक।
नहीं : दोनों मज़हबें अल्लाह और ईसा की ज़ात पर अक़ीदी इलान करती हैं और उनके जवाब इक-दूसरे को नफ़्ज़ात करते हैं। मगर इससे न इज़्ज़त जाती है, न इज़्ज़त-मंद मुश्तरका ख़ानदान, न मुक़ालमा : इस्लाम ज़बरदस्ती से मना करता है (क़ुरआन 2:256) और ईसाइयों की इज़्ज़त करता है (क़ुरआन 5:82)।
अल्लाह की ज़ात। अगर अल्लाह बग़ैर व्यक्ति के अकेला है (इस्लाम) या तीन व्यक्तियों में इक (ईसाई धर्म), तो बाक़ी सब पीछे-पीछे आता है : ईसा की हैसियत, सलीब, ख़लासे, किताबों की सल्तनत। इसी वजह से क़ुरआन इख़्तिलाफ़ को इसी नुक़्ते पर मरकज़ में रखता है (क़ुरआन 4:171)।
अमली अख़लाक़ में बहुत क़रीबत : पाबंदी से दुआ, रोज़ा, ख़ैरात, वालिदैन की इज़्ज़त, परहेज़गारी, रहम। क़ुरआन की सूरह मरियम और इंजील के मरियम के क़िस्सों में उनके लिए ग़ौर-तलब इबादती मोहब्बत मुश्तरका है।