होम > धर्म और मान्यताएँ > ईसाई धर्म : इस्लाम की नज़र में > इस्लाम त्रित्व को क्यों अस्वीकार करता है ?
त्रित्व की अक़ीदा बज़बत क्या बयान करती है, तौहीद क्या सिखाता है, क़ुरआन का साफ़ हुक्म, और "ईसा अल्लाह हैं" वाली बाइबिली दलीलों का इस्लामी जवाब।
इस्लाम त्रित्व को इस वजह से ठुकराता है कि वह बेहद अकेले अल्लाह की तालीम देता है, बग़ैर किसी व्यक्ति या शरीक के (क़ुरआन 112), और तीन व्यक्तियों में इक अल्लाह की अक़ीदा (नीकिया 325 और कॉन्स्टेंटिनोपल 381 की मजालिस में तरतीब-शुदा, सीईसी जुज़ 253) इसी वहदानीयत के ख़िलाफ़ है। क़ुरआन एहले-किताब से कहता है : "अपने धर्म में हद से आगे न बढ़ो और अल्लाह के बारे में सत्य के सिवा कुछ न कहो" (क़ुरआन 4:171)।
यह इनकार अक़ीदे का है, कभी शख़्सों का नहीं।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 5 मिनट पढ़ने का समयत्रित्व अल्लाह के बारे में ईसाई अक़ीदा है : इक अल्लाह, तीन मुतमायिज़ व्यक्तियों में, बाप, इब्न और रूहुल-क़ुद्स, और इक ही इलाही ज़ात।
नीकिया-कॉन्स्टेंटिनोपल की क़बूल-शुदा इमानीयत (बड़े चर्चों की आम शक्ल) कहती है : "हम इक अकेले अल्लाह में (...) और इक अकेले मौला मसीह में, अल्लाह की इकलौती औलाद, जो सब दौरों से पहले बाप से पैदा हुआ, अल्लाह की ओर से अल्लाह" ईमान रखते हैं। कैथोलिक चर्च का कैटेकिज़्म लिखता है : "त्रित्व एक है। हम तीन माबूदों को नहीं, बल्कि तीन व्यक्तियों में इक अल्लाह को मुतअर्रिफ़ होते हैं" (सीईसी, जुज़ 253), और क़बूल करता है कि यह राज़ इंसानी अक़्ल से बाला है।
असल में नीकिया (325) और कॉन्स्टेंटिनोपल (381) की मजालिस में तरतीब-शुदा, यह ईसाई इ'तिक़ाद का मियार बन गई।
तारीख़ ख़ुद इस्लामी पढ़ाई को मदद देती है, और मुदर्रिस व मुहक्किक 'उमर अल-अशक़र इसे यूँ बयान करते हैं : नीकिया की मजलिस (325) से पहले ईसाई जमाअतें गहरी मुख़ालफ़त में थीं ;
मजलिस में जमा होने वाले पादरी एक ही मज़हब के नहीं थे, और त्रित्व की अक़ीदा चौथी सदी के आख़िर में ही अपनी पूरी शक्ल ले सकी, यानी प्लॉटिन (270 में इंतक़ाल) और नव-प्लेटोवाद के फैलने के बाद, जिसकी छाप इस पर मौजूद है। यानी त्रित्ववाद, एक मुतअय्यन निज़ाम के तौर पर, उस यूनानी फ़लसफ़े के बाद की चीज़ है जिसने उसे परवरिश दी ('उमर अल-अशक़र, मुहादरात फ़ि-न-नसरानिया, त्रित्व और यूनानी फ़लसफ़े वाला बाब)।
इस्लाम का मरकज़ तौहीद है : अल्लाह बेहद अकेला है, बग़ैर शरीक, बग़ैर इब्न, बग़ैर वालिदा, और उसकी कोई मिसाल नहीं : "(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है। अल्लाह बेनियाज़ है। न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है। और न कोई उसका समकक्ष है।" (क़ुरआन 112)।
"तुम्हारा पूज्य (मा'बूद) एक ही पूज्य (मा'बूद) है, उसके सिवा कोई पूज्य (मा'बूद) नहीं" (क़ुरआन 2:163)। इस्लाम के मुताबिक़ ख़ालिक़ की इबादत मुशारकत नहीं हो सकती, और हर वह अक़ीदा जो उसकी ज़ात में तअद्दुद ले आए, कितनी ही बारीक क्यों न हो, इसी वहदानीयत के ख़िलाफ़ है।
क़ुरआन इस मुद्दे पर ईसाइयों से बज़बत मुख़ाताब होता है : "ऐ किताब वालो! अपने धर्म में हद से आगे न बढ़ो और अल्लाह के बारे में सत्य के सिवा कुछ न कहो। मरयम का पुत्र ईसा मसीह केवल अल्लाह का रसूल और उसका 'शब्द' है, जिसे (अल्लाह ने) मरयम की ओर भेजा तथा उसकी ओर से एक आत्मा है। अतः अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाओ और यह न कहो कि (पूज्य) तीन हैं। बाज़ आ जाओ! तुम्हारे लिए बेहतर होगा। अल्लाह केवल एक ही पूज्य है। वह इससे पवित्र है कि उसकी कोई संतान हो। उसी का है जो कुछ आकाशों में हैं और जो कुछ धरती में है और अल्लाह कार्यसाधक के रूप में काफ़ी है।" (क़ुरआन 4:171)। यह आयत ईसा (अलैहिस्सलाम) की इज़्ज़त करती है (रसूल, अल्लाह का कलिमा, उसकी तरफ़ से रूह) और साथ ही त्रित्व का इनकार करती है।
ईसाई ईसा की इलाहीयत की दलील नए अहदनामे की आयतों से देते हैं। इस्लामी पढ़ाई, जो इन नुस्ख़ों की इज़्ज़त करती है मगर उन्हें तौहीद की रोशनी में पढ़ती है, नुक़्ता-ब-नुक़्ता जवाब देती है :
इसके उलट, जो आयतें ईसा को अल्लाह से अलग दिखाती हैं वह बहुत और साफ़ हैं : "बाप मुझ से बड़ा है" (यूहन्ना 14:28), "उस दिन या उस घड़ी की ख़बर किसी को नहीं, न आसमान के फ़रिश्तों को, न इब्न को, सिवा बाप के" (मरकुस 13:32), "कि वे तुझे, इक अकेले सच्चे अल्लाह को, और जिसे तूने भेजा, यानी मसीह ईसा को जानें" (यूहन्ना 17:3), और गेथसेमानी की दुआ : "मेरी मरज़ी नहीं, तेरी मरज़ी" (मत्ती 26:39)।
जो अल्लाह दुआ करता है, एक चीज़ से वाक़िफ़ नहीं और फ़रमान-बरदारी करता है, इस्लाम के लिए वह इक बुज़ुर्ग बंदे की तस्वीर है, ख़ालिक़ की नहीं।
किसी मुसलमान के लिए त्रित्व का इनकार वहदानीयत की पाकीज़गी की हिफ़ाज़त है : यही वह तालीम है जो क़ुरआन के मुताबिक़ ईसा ख़ुद ने दी और जिसकी तरफ़ उन्हें कहलवाया गया : "निःसंदेह अल्लाह ही मेरा पालनहार और तुम्हारा पालनहार है। अतः उसी की इबादत करो। यही सीधा मार्ग है।" इसमें किसी हीनता का एहसास नहीं : क़ुरआन ईसाइयों की इज़्ज़त करता है (क़ुरआन 5:82), दीन में ज़बरदस्ती से मना करता है (क़ुरआन 2:256), और इक मुश्तरका कलिमा पेश करता है : "आओ एक ऐसी बात की ओर जो हमारे बीच और तुम्हारे बीच समान (बराबर) है; यह कि हम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करें और उसके साथ किसी चीज़ को साझी न बनाएँ" (क़ुरआन 3:64)।
नहीं। क़ुरआन उस अक़ीदे को वैसे ही बयान करता है जैसे वह मुतअर्रिफ़ की गई है : तीन व्यक्तियों में इक अल्लाह। बज़बत यही तरतीब इस्लामी वहदानीयत क़बूल नहीं कर सकती, हालाँकि ईसाई इरादा इक अकेले अल्लाह का एलान करने का ही है।
नहीं। यह लफ़्ज़ बाइबिल में कहीं नहीं आता : यह अक़ीदा चौथी सदी की मजालिस में मुख़्तलिफ़ आयतों को आपस में जोड़ने के लिए तरतीब-शुदा हुई। दूसरी आयतें, जैसे यूहन्ना 17:3 या मरकुस 13:32, ईसा और अल्लाह के बीच साफ़ फ़र्क़ क़ायम रखती हैं।
नहीं। क़ुरआन ईसाइयों की इज़्ज़त करता है (क़ुरआन 5:82) और उनसे "केवल ऐसे तरीक़े से वाद-विवाद करो, जो सबसे उत्तम हो" मुक़ाबले की दावत देता है (क़ुरआन 29:46)। जो ठुकराया जाता है वह अल्लाह की ज़ात पर इक अक़ीदा है, शख़्स नहीं।