क्या ईसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह हैं ?

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यही सवाल इस्लाम और ईसाई धर्म को जुदा करता है, दोनों रिवायतों के नुस्ख़ों के साथ पढ़ा गया : ईसाई मुक़ाम, इस्लामी मुक़ाम, और दोनों तरफ़ की आयतें।

इस्लाम के मुताबिक़ नहीं : ईसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के पैग़ंबर और रसूल हैं, मरियम से मुज़ज़ब तौर पर पैदा हुए, मुअज़्ज़म, अल्लाह की तरफ़ उठा लिए गए, मगर इक इंसान जो खाना खाते हैं, दुआ करते हैं और फ़रमान-बरदारी करते हैं (क़ुरआन 5:75, 43:59)। इंजीलें भी उन्हें अल्लाह से मुतमायिज़ पेश करती हैं : "बाप मुझ से बड़ा है" (यूहन्ना 14:28), "मेरी मरज़ी नहीं, तेरी मरज़ी" (मत्ती 26:39)।

ईसा की इलाहीयत ही दोनों धर्मों के बीच बुनियादी इख़्तिलाफ़ है ;

यही यहाँ दोनों के नुस्ख़ों के साथ पढ़ा गया है।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

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ईसाई मुक़ाम, उसकी सरचश्मों के मुताबिक़

ईसाई ईमान रखते हैं कि ईसा जिस्म में आया हुआ अल्लाह है : कल्केदोनिया की मजलिस की मुतअर्रिफ़-शुदा तअरीफ़ के मुताबिक़ "सच्चा अल्लाह और सच्चा इंसान" (सीईसी, जुज़ 464)। अल्लाह ने इंसान बनकर, अपनी मौत और जी-उठने से लोगों को उनके गुनाहों से नजात देने की ख़ातिर दुनिया में क़दम रखा। यह अक़ीदा देर की इजाद नहीं बल्कि किताबों का पूरा मअनी पेश करती है, जिसे चौथी और पाँचवीं सदी की मजालिस में तरतीब दी गई।

यह मुक़ाम यहाँ इमानदारी से दोहराया गया है : यह पुआल का आदमी नहीं।

इत्तिहाद (एकता) की अक़ीदा ईसाई रिवायत में बड़ी बारीकी से तरतीब-शुदा हुई, और इब्नुल क़य्यिम ने अल-इ'लाम में (इत्तिहाद और तनस्सुक वाला बाब) उसकी बहस की है : बज़ ईसाई पढ़ाइयों में तीन अक़ानीम इक ही ज़ात के अफ़ाल के नाम ठहराए जाते हैं, तख़लीक़ बाप (क़ुव्वत) से, तालीम इब्न (कलिमा) से और ज़िंदगी रूहुल-क़ुद्स (इरादा) से मनसूब की जाती है, और सिर्फ़ कलिमा का मसीह के जिस्म से इत्तिहाद हुआ, इंजील की इबारत के मुताबिक़ : "वचन जिस्म बन गया और हम में रहने लगा" (यूहन्ना 1:14)।

उनका जवाब इक मंतक़ी सवाल है : अगर तीनों इक ही ग़ैर-मुनक़्क़सिम ज़ात हैं, तो इत्तिहाद सिर्फ़ इब्न पर क्यों हुआ, बाप और रूह पर क्यों नहीं ? ग़ैर-मुनक़्क़सिम चीज़ का कुछ हिस्से में, सब में नहीं, इत्तिहाद ख़ुद अक़ीदे के मुख़ालिफ़ है (इब्नुल क़य्यिम, अल-इ'लाम, इत्तिहाद और तनस्सुक वाला बाब)।

क्या ईसा अल्लाह हैं ? इस्लामी मुक़ाम

क़ुरआन सिखाता है कि ईसा अल्लाह के बंदे और रसूल हैं : "तो केवल एक बंदा है, जिसपर हमने उपकार किया तथा हमने उसे बनी इसराईल के लिए एक उदाहरण बना दिया" (क़ुरआन 43:59)।

वह मसीह को माबूद बनाने का इनकार करता है (क़ुरआन 5:72) और इंसानियत की इक सादा क़ाइदा देता है : "मरयम का बेटा मसीह एक रसूल के सिवा कुछ नहीं। निश्चय उससे पहले बहुत-से रसूल गुज़र चुके और उसकी माँ सिद्दीक़ा (अत्यंत सच्ची) है। दोनों खाना खाया करते थे।" (क़ुरआन 5:75) : जो खाना खाता है वह मुहताज है, और ख़ालिक़ किसी चीज़ का मुहताज नहीं। इस्लाम के लिए ईसा का अपना ईमान वही तौहीद है : वह सिर्फ़ अल्लाह की इबादत की दावत देते हैं (क़ुरआन 3:51), और उन्हें बंदा व रसूल मानना ईमान-ए-मुसलमानी का रुक्न है (बुख़ारी 3435)।

इब्न तैमिया ने अपनी बड़ी मुवाज़नती किताब अल-जवाब अस-सहीह लिमन बद्दल दीन अल-मसीह इसी बहस को समर्पित की, और उनका आयत 4:171 पर जवाब क़ाबिल-ए-इक़तिबास है : ईसाई दावा करते हैं कि आयत मसीह में इलाहीयत और इंसानियत के इत्तिहाद की तस्दीक़ करती है ; वे जवाब देते हैं कि आयत उलट बात कहती है, "हम जैसा इक इंसान", जिसमें अल्लाह का कलिमा और उसकी तरफ़ से रूह अमानत है, "हालाँकि अल्लाह का कलिमा, जो तख़लीक़ करता है, हम जैसी मख़लूक़ात से मिलता ही नहीं" (इब्न तैमिया, अल-जवाब अस-सहीह, कलिमा और रूह वाला बाब)।

इलाहीयत के लिए क़बूल की गई आयतें, और इस्लामी जवाब

  • "वचन अल्लाह था" (यूहन्ना 1:1) : क़ुरआन भी ईसा (अलैहिस्सलाम) को "जिसे (अल्लाह ने) मरयम की ओर भेजा" (क़ुरआन 4:171) कहता है बग़ैर उन्हें अल्लाह ठहराए। अल्लाह के कलिमे से तख़लीक़ होना मख़लूक़ को माबूद नहीं बनाता ; और यूहन्ना 1:14 साफ़ करता है कि "वचन जिस्म बन गया", यानी इक इंसान बना जो पैदा होता, बड़ा होता और मरता है।
  • "इबराहीम से पहले मैं था" (यूहन्ना 8:58) : इस्लामी पढ़ाई इसमें रसूल की साबिक़ पेशक़दमी को देखती है, जिसे अल्लाह ने उनकी आमद से पहले तक़दीर और जान लिया था (क़ुरआन 3:45), न कि बेपैदाइश होना। ईसाई मुफ़स्सिरीन इस आयत को दूसरे तौर पर पढ़ते हैं : इख़्तिलाफ़ यहीं है, और दोनों तरफ़ से क़बूल-शुदा है।
  • "मैं और बाप एक हैं" (यूहन्ना 10:30) : यही एकता शागिर्दों के लिए भी माँगी गई ("वे भी हम में एक हों", यूहन्ना 17:21-22) : यह मक़सद की एकता है, इलाही शख़्स की नहीं।

जो आयतें ईसा को अल्लाह से अलग दिखाती हैं

यह बहुत हैं और उसी नए अहदनामे से निकलती हैं : "बाप मुझ से बड़ा है" (यूहन्ना 14:28) ; "उसकी ख़बर किसी को नहीं, न आसमान के फ़रिश्तों को, न इब्न को, सिवा बाप के" (मरकुस 13:32) ; "तुम मुझे अच्छा क्यों कहते हो ? इक ही अच्छा है, अल्लाह" (मत्ती 19:17)।

"मैं अपने बाप और तुम्हारे बाप के पास, अपने अल्लाह और तुम्हारे अल्लाह के पास जाता हूँ" (यूहन्ना 20:17) ; "कि वे तुझे, इक अकेले सच्चे अल्लाह को, और जिसे तूने भेजा, यानी मसीह ईसा को जानें" (यूहन्ना 17:3) ; "मेरी मरज़ी नहीं, तेरी मरज़ी" (मत्ती 26:39)।

यूनस भी लिखता है : "अल्लाह और इंसानों के दरमियान इक मुतवस्सित, इंसान मसीह ईसा" (1 तीमुथियुस 2:5), और पतरस ईसा को "अल्लाह का मंज़ूर-ए-शुदा इंसान, जो मुअज़िज़ों से तुम्हारे दरमियान दस्तावेज़ी है" पेश करता है (प्रेरितों के काम 2:22)।

इस्लाम के लिए नुस्ख़ों की यह रेखा तौहीद से हमख़याल है : ईसा अपने मौला की इबादत करते थे, और कभी अपनी शख़्स की इबादत की दावत नहीं देते थे।

क्या ईसा अल्लाह हैं : यह सवाल मरकज़ी क्यों है ?

क्योंकि बाक़ी सब इसी से निकलता है : अगर ईसा रसूल हैं तो उनका पैग़ाम तौहीद है और किसी को इलाही मुतवस्सित की ज़रूरत नहीं ; अगर उन्हें अल्लाह ठहरा दिया जाए तो त्रित्व, सलीब और उनकी शख़्स की इबादत पीछे-पीछे आती है। इस्लाम क़ुरआन से फ़ैसला करता है, जिसे मुसलमान अल्लाह का कलाम समझते हैं जो पिछले पैग़ामों की तस्दीक़ और हिफ़ाज़त करता है (क़ुरआन 5:48) : क़ुरआनी फ़ैसला यह है कि जिसे बज़ लोगों ने माबूद बनाया वह "सिवा इक बंदे के कुछ नहीं", और हिदायत सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ है।

ईसाई फ़ैसला अपने चर्चों की पढ़ाई से करते हैं।

फ़र्क़ अक़ीदी और असली है ; इज़्ज़त का मसला नहीं (क़ुरआन 5:82, 29:46)।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न क्या ईसा अल्लाह हैं : इस्लाम और ईसाई धर्म

क्या मुसलमान ईसा से मोहब्बत करते हैं ?

हाँ, और यह ईमान की फ़र्ज़ है : बग़ैर इस गवाही के कि ईसा अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं, कोई मुसलमान नहीं बन सकता (बुख़ारी 3435)। क़ुरआन उन्हें मसीह, अल्लाह का कलिमा कहता है, दुनिया और आख़िरत में मुअज़्ज़म (क़ुरआन 3:45)।

मगर क़ुरआन ईसा को "उनका शब्द जो उसने मरियम की तरफ़ भेजा" कहता है, क्या यह इलाही नहीं ?

नहीं। "जिसे (अल्लाह ने) मरयम की ओर भेजा" (क़ुरआन 4:171) उनकी मुज़ज़ब तख़लीक़ की तरफ़ इशारा है : अल्लाह ने उन्हें अपने कलिमे से, बग़ैर बाप के, पैदा किया। बादशाह का कलिमा उसे बादशाह नहीं बना देता : क़ुरआन यही लक़ब देते हुए भी बयान करता है कि ईसा खाना खाते थे और बंदे थे (क़ुरआन 5:75)।

क्या ईसा ने कभी कहा "मैं अल्लाह हूँ, मेरी इबादत करो" ?

इंजीलों में इस क़िस्म की कोई इबारत नहीं। क़ुरआन ईसा (अलैहिस्सलाम) से कहलवाता है : "निःसंदेह अल्लाह ही मेरा पालनहार और तुम्हारा पालनहार है। अतः उसी की इबादत करो। यही सीधा मार्ग है।" (क़ुरआन 3:51), और इंजीलें उन्हें दुआ करते और अल्लाह के आगे झुकते दिखाती हैं (मत्ती 26:39)।

स्रोत: क़ुरआन 4:171 · क़ुरआन 5:72-75 · क़ुरआन 43:59 · क़ुरआन 3:51 · बाइबिल : यूहन्ना 14:28 ; मत्ती 26:39 ; मरकुस 13:32 ; यूहन्ना 17:3 ; मत्ती 19:17 ; यूहन्ना 20:17 ; 1 तीमुथियुस 2:5 ; प्रेरितों के काम 2:22 · बुख़ारी 3435 · इब्न तैमिया, अल-जवाब अस-सहीह लिमन बद्दल दीन अल-मसीह · इब्नुल क़य्यिम, अल-इ'लाम (इत्तिहाद और तनस्सुक)

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निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद