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दोनों धर्मों की मुवाज़नत कर रहे हैं ? मियार जिन्हें एक-एक करके पढ़ा जाए : अल्लाह की ज़ात, नुस्ख़े की हिफ़ाज़त, मग़फ़िरत, अमल की सादगी, दोनों तरफ़ के नुस्ख़ों के साथ।
इस्लाम और ईसाई धर्म में फ़ैसला ठोस मियारों की पढ़ाई माँगता है : अल्लाह कौन है (सादा वहदानीयत या त्रित्व), कौन-सा नुस्ख़ा महफ़ूज़ है और कैसे, मग़फ़िरत कैसे मिलती है (सीधे, या सलीब के ज़रिए), और धर्म कौन-सा अमल माँगता है। इस्लाम पेश करता है : इक अल्लाह बिना अक़ाईदी राज़ के, इक नुस्ख़ा वादे से महफ़ूज़ (क़ुरआन 15:9), तौबे से सीधी मग़फ़िरत (क़ुरआन 39:53) और रोज़ाना पाँच नमाज़ों का अमल। यह दस्तावेज़ हर मियार की जाँच दोनों रिवायतों के नुस्ख़ों से करता है।
विषय-सूची:
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयसब यहीं से शुरू होता है। ईसाई धर्म तीन व्यक्तियों में इक अल्लाह का इलान करता है, वह राज़ जिसे उसका अपना कैटेकिज़्म अक़्ल से बाला क़बूल करता है ; इस्लाम इक अकेले ख़ालिक़ का इलान करता है, बग़ैर व्यक्ति, बग़ैर शरीक, जिसे क़ुरआन इक पूरे बाब में बयान करता है : "(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है। अल्लाह बेनियाज़ है। न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है। और न कोई उसका समकक्ष है।" (क़ुरआन 112), और एहले-किताब को दिया गया हुक्म नहीं बदलता : "यह न कहो कि (पूज्य) तीन हैं। बाज़ आ जाओ! तुम्हारे लिए बेहतर होगा। अल्लाह केवल एक ही पूज्य है" (क़ुरआन 4:171)।
परखने वाला मियार : दोनों में से कौन-सी तस्वीर उस इबराहीमी तौहीद से हमख़याल है जिसे दोनों धर्म अपनाते हैं, और नुस्ख़ों से ख़ुद ("बाप मुझ से बड़ा है", यूहन्ना 14:28) ?
इस्लाम त्रित्व को क्यों अस्वीकार करता है ? का पृष्ठ दस्तावेज़ की तफ़सील देता है।
इस्लाम सिखाता है कि क़ुरआन इलाही वादे से महफ़ूज़ है : "निःसंदेह हमने ही यह ज़िक्र (क़ुरआन) उतारी है और निःसंदेह हम ही इसकी अवश्य रक्षा करने वाले हैं।" (क़ुरआन 15:9) : इक अरबी नुस्ख़ा, दकार से जकारता तक एक जैसा, पीढ़ी-ब-पीढ़ी लाखों लोगों से ज़बानी।
बाइबिल, उसके बल्कि, देर की नुस्ख़ों से आती है, उन मुख़्तलिफ़ात के साथ जिन्हें इल्मी इदारे ख़ुद बयान करते हैं, और क़ुरआन नुस्ख़ों की तारीख़ी तब्दीलियाँ बयान करता है (क़ुरआन 2:79)। मियार : हिफ़ाज़त की ज़ंजीर की मुवाज़नत, अंक हाथ में, और यह फ़ैसला करना कि कौन-सा कलाम आख़िरी हाकिम बन सकता है।
ईसाई धर्म ख़लासे की बुनियाद मसीह की फ़िदा-भरी मौत पर रखता है ; इस्लाम सीधी मग़फ़िरत सिखाता है : "तुम अल्लाह की दया से निराश न हो। निःसंदेह अल्लाह सब पापों को क्षमा कर देता है" (क़ुरआन 39:53), बिना वसीता या क़ुरबानी के, सच्ची तौबे से। मियार : इंसाफ़।
क्या सीधे माफ़ करने वाला अल्लाह इक ऐसे निज़ाम से ज़्यादा इंसाफ़-मंद है जहाँ इक मासूम मुजरिमों की अदायगी करता है ?
क़ुरआन फ़ैसला करता है : "कोई किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा" (क़ुरआन 6:164), और यही इंसाफ़ अमल में भी दिखता है : हर कोई अपने अमाल का जवाबदेह, कोई मुजरिम पैदा नहीं।
इस्लाम इक सादा और मुकम्ल अमल पेश करता है : रोज़ाना पाँच नमाज़ें जो दिन को ढाँचा देती हैं, सालाना रोज़ा, ख़ैरात, क़ूवत होने पर हज, और इक आशना अख़लाक़। कोई दरमियानी पादरी वर्ग नहीं, कोई ज़रूरी सकरामेंट नहीं : बंदे और अल्लाह के दरमियान ताल्लुक़ सीधा है।
ईसाई उसमें सख़्ती देखेगा ;
नई अमद करने वाला उसमें एक ऐसा ढाँचा ढूँढता है जो ज़िंदगी सीधी रखता है।
यह दस्तावेज़ बाक़ी सब की मुवाज़नत तफ़सील से करता है : इस्लाम और ईसाई धर्म के बीच अंतर का पृष्ठ इक जड़वल में समेटता है। और अगर तलाश इस्लाम तक पहुँचे, तो मुसलमान कैसे बनें का सिलसिला आपका हाथ थाम लेता है : इस्लाम इक सच्ची गवाही है, फ़ौरी, बिना रस्म-ओ-रिवाज के।
नहीं : वे अल्लाह और ईसा की ज़ात पर ऐसे जवाब देते हैं जो इक-दूसरे को नफ़्ज़ात करते हैं (त्रित्व के मुक़ाबिले क़ुरआन 4:171)। दूसरी रिवायत की इज़्ज़त की जा सकती है, उसके नुस्ख़े पढ़े जा सकते हैं, उसे रखने वाले लोगों से मोहब्बत की जा सकती है ; दोनों अक़ाईद इक साथ नहीं थमी जा सकतीं।
हर रिवायत की सरचश्मों के साथ मियारों को एक-एक करके पढ़कर, जिस ख़ालिक़ को आप ढूँढ रहे हैं उसी से हिदायत माँगकर, और कभी ज़बरदस्ती के दबाव में फ़ैसला न करके : क़ुरआन ज़बरदस्ती से मना करता है (क़ुरआन 2:256) और दिल की सच्ची यक़ीनी माँगता है।