होम > धर्म और मान्यताएँ > ईसाई धर्म : इस्लाम की नज़र में > क्या मुसलमान मरियम पर ईमान रखते हैं ?
मरियम क़ुरआन की सबसे मुअज़्ज़म ख़ातून हैं : एक सूरह उनके नाम पर है, अल्लाह ने उन्हें चुना और पाक किया, ईसा की बेबाप वालिदा। इस्लाम ईसाइयों से क्या मुश्तरका रखता है और क्या ठुकराता है।
हाँ। मरियम क़ुरआन की सबसे मुअज़्ज़म ख़ातून हैं : इक पूरी सूरह उनके नाम पर है, अल्लाह ने उन्हें दुनिया की ख़ातूनों से ऊँचा चुना और पाक किया (क़ुरआन 3:42), परहेज़गार ख़ातूनों का नमूना ठहराया (क़ुरआन 66:12), और वह ईसा की बेबाप वालिदा हैं (क़ुरआन 3:47)। इस्लाम यह इज़्ज़त ईसाइयों से मुश्तरका रखता है, मगर मरियम की इबादत या माँग को ठुकराता है : मुसलमान के लिए वह इक पाकीज़ ख़ातून हैं, कभी वसीता नहीं।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयक़ुरआन उनकी ज़िंदगी की तफ़सील सुनाता है : वालिदा द्वारा नज़्र की गई बच्ची, अल्लाह की हिफ़ाज़त में परवरिश, उनके लिए फ़रिश्ते की तरफ़ से रिज़्क़ (सूरह 19 उनके नाम पर है)। अल्लाह ने उन्हें चुना, पाक किया और उन्हें "सर्व संसार की स्त्रियों पर तुम्हें चुन लिया है" (क़ुरआन 3:42), और फ़रिश्ते ने बेबाप इब्न की ख़ुशख़बरी दी : "जब वह किसी काम का निर्णय कर लेता है, तो उससे यही कहता है : "हो जा", तो वह हो जाता है।" (क़ुरआन 3:47)।
क़ुरआन उन्हें "ईमान वालों के लिए नमूना" ठहराता है और परहेज़गार ख़ातूनों को उनका आदर्श देता है : "इमरान की बेटी मरयम का (उदाहरण प्रस्तुत किया है), जिसने अपने सतीत्व की रक्षा की, तो हमने उसमें अपनी एक रूह़ फूँक दी तथा उसने अपने पालनहार की बातों और उसकी पुस्तकों की पुष्टि की" (क़ुरआन 66:12)।
और बेबाप पैदाइश पर ख़ुद यह फ़रमान : "उस महिला (को याद करो) जिसने अपने सतीत्व की रक्षा की, तो हमने उसमें अपनी रूह से फूँका तथा उसे और उसके पुत्र को संसार वालों के लिए एक बड़ी निशानी बना दिया" (क़ुरआन 21:91)।
मुश्तरका मैदान ग़ौर-तलब है : मरियम की पवित्रा होना, मुअज़िज़ हमल, उनकी बेमिसाल परहेज़गारी, उनकी शख़्सियत को दी जाने वाली बेहद इज़्ज़त। इक ईसाई जो सूरह मरियम पढ़ता है वह अपनी वही हस्ती वहाँ पाता है, और इक मुसलमान जो इंजीलें पढ़ता है वहाँ वही आजिज़ और ईमानदार ख़ातून पाता है। यह दोनों धर्मों के बीच सबसे बड़े इत्तेफ़ाक़ में से इक है, जो अक्सर दोनों तरफ़ अनजाना रहता है।
जहाँ बज़ ईसाई रिवायतें मरियम से माँग, दुआ और सिफ़ारिश करती हैं, वहाँ इस्लाम इक पक्की लकीर खींचता है : हर इबादत, हर माँग, हर मदद की दरख़्वास्त सिर्फ़ अल्लाह का हक़ है। मरियम ख़ुद, क़ुरआन के मुताबिक़, अल्लाह की इबादत करती हैं और उसी की इबादत का हुक्म देती हैं ; उनकी इबादत उनके अपने ईमान और उनके अपने इब्न के मुख़ालिफ़ होगी, जो हिसाब के दिन बयान करेंगे कि उन्होंने कभी अल्लाह के सिवा किसी की इबादत का हुक्म नहीं दिया (क़ुरआन 5:116-117)।
मरियम की इज़्ज़त यह है कि उनसे वैसी मोहब्बत की जाए जैसी क़ुरआन करता है : अल्लाह की एक बेमिसाल ख़ादिमा, जिनकी पाकीज़गी और ईमान हर मुसलमाना और हर मुसलमान के लिए ज़िंदा नमूना है।
नहीं। इस्लाम में कोई मख़लूक़, सबसे मुअज़्ज़म ख़ातून भी, माँग या इबादत की हक़दार नहीं : माँग सिर्फ़ अल्लाह से होती है। मरियम की इज़्ज़त उनके क़िस्से की मोहब्बत में ज़ाहिर होती है, किसी इबादत में नहीं।
उनका नाम बार-बार आता है और इक पूरी सूरह उनके नाम पर है : ऐसी इज़्ज़त क़ुरआन किसी और ख़ातून को नहीं देता, जो अक्सर उन ईसाइयों को हैरान करती है जो इस्लामी नुस्ख़ा पढ़ते हैं।