होम > पैग़ंबर पर दुरूद > पैग़ंबर पर दुरूद का मतलब
“किसी पर दुरूद पढ़ना” एक ही मतलब नहीं रखता जब करने वाला अल्लाह हो, कोई फ़रिश्ता हो या कोई ईमान वाला। बुनियादी आयत तीनों को इकट्ठा करती है : “बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर दुरूद पढ़ते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम भी उन पर दुरूद पढ़ो और ख़ूब सलाम भेजो।” (सूरह अल-अहज़ाब, 56)। उलमा ने इसका मतलब बड़ी तफ़सील से बयान किया है।
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05 अक्टूबर 2026 को 13h13 बजे अपडेट किया गया
📖 4 मिनट पढ़ने का समयसुफ़यान अस-सौरी और दूसरे अहले इल्म तशरीह करते थे, जैसा अत-तिर्मिज़ी ने अपने बाब में नक़ल किया : “रब की सलात रहमत है, और फ़रिश्तों की सलात मग़फ़िरत की दुआ है” (अत-तिर्मिज़ी, 485)। जब अल्लाह अपने नबी पर “दुरूद पढ़ता” है, तो उसे रहमत से ढक लेता है और अपने फ़रिश्तों के सामने उसकी प्रशंसा करता है ; और व्यापक मतलब में उलमा इसमें अल्लाह की तारीफ़, उसका इक़रार-ए-क़बूलियत और वह सवाब भी शामिल करते हैं जो वह नबी को अता करता है। अल्लाह को हमारी हरगिज़ ज़रूरत नहीं : इज़्ज़त देने वाला वही है।
फ़रिश्ते नबी पर “दुरूद पढ़ते” हैं इस तरह कि उनके लिए मग़फ़िरत माँगते हैं और उनके हक़ में दुआ करते हैं, वे जो उनकी तारीफ़ से बाज़ नहीं आते। ईमान वाले उन पर एक बँधी हुई दुआ से “दुरूद पढ़ते” हैं : “ऐ अल्लाह! मुहम्मद पर दुरूद पढ़...”। एक ही लफ़्ज़, तीन हक़ाइक़ : अल्लाह की तरफ़ से रहमत, फ़रिश्तों की तरफ़ से मग़फ़िरत की दुआ, बंदों की तरफ़ से दुआ। इसीलिए इंसान की दुआ “सल्लल्लाहुम्म” (ऐ अल्लाह) से शुरू होती है : हम अल्लाह से माँगते हैं कि वह नबी पर दुरूद पढ़े, हम ख़ुद अपने इख़्तियार से उस पर “दुरूद” नहीं पढ़ते।
इब्ने मसऊद रवायत करते हैं : “हम नमाज़ में कहते थे : अल्लाह को सलाम, फ़लाने को सलाम। एक दिन पैग़ंबर ने फ़रमाया : अल्लाह ही सलाम है (अस-सलाम)। जब तुममें से कोई नमाज़ में बैठे तो कहे : सारी इबादतें, सारी नमाज़ें और सारी पाक़ चीज़ें अल्लाह ही के लिए हैं। ऐ नबी, अल्लाह की रहमत और उसकी बरक़तों के साथ तुझे सलाम हो। हमें सलाम हो और अल्लाह के नेक बंदों को सलाम हो। जब तुम यह कहते हो तो यह आसमान और ज़मीन के हर नेक बंदे तक पहुँच जाता है।”
मुस्लिम की सहीह में (402)
इस हदीस ने इबादत का व्याकरण मुक़र्रर कर दिया : तहिय्यात (इबादतें) और सलावात (नमाज़ें) पहले अल्लाह ही के लिए हैं ; सलाम पैग़ंबर और अल्लाह के नेक बंदों के लिए कहा जाता है। पैग़ंबर पर दुरूद पढ़ने का मतलब है अल्लाह से माँगना कि वह उन्हें इज़्ज़त दे, जो इबादत की वहदानियत को क़ायम रखती है और साथ ही नबी को उनका सबसे ऊँचा मुक़ाम देती है।
आयत का हुक़्म (“उन पर दुरूद पढ़ो और उन्हें सलाम भेजो”) नबी को इज़्ज़त देता है और उनके ईमान वालों को बुलंद करता है : जो उन पर एक बार दुरूद पढ़े, उसे अल्लाह की दस दुरूद मिलती है (मुस्लिम, 408), वह फ़रिश्तों की क़तार में शामिल हो जाता है जो नबी की तारीफ़ से बाज़ नहीं आते, और पूरे आसमानी जहान के तरीक़े पर चलता है। नबी पर सलात इस तरह एक साथ मोहब्बत का फ़र्ज़, आसान ज़िक्र और सबसे जल्दी सवाब देने वाले अमलों में से है : देखें पैग़ंबर पर दुरूद के फ़ज़ाइल।
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अल्लाह की तरफ़ से दुरूद का मतलब रहमत, तारीफ़ और इज़्ज़त है : अल्लाह अपने फ़रिश्तों के सामने अपने नबी की प्रशंसा करता है और उसे अपनी नेअमत से ढक लेता है, जैसी तशरीह सुफ़यान अस-सौरी और उलमा ने की (अत-तिर्मिज़ी से मरवी, 485)।
क्योंकि ईमान वाले की दुरूद एक दुआ है : वह अल्लाह से माँगता है कि वह नबी पर दुरूद पढ़े (“सल्लल्लाहुम्म सल्लि अला मुहम्मद”) ; फ़रिश्तों की तरफ़ से वह मग़फ़िरत है, अल्लाह की तरफ़ से रहमत।
अस-सलाम सलामती और भलाई है : हम माँगते हैं कि अल्लाह पैग़ंबर को हर बुराई से महफ़ूज़ रखे और उन्हें सलामती दे, जैसा तशह्हुद दिखाता है (मुस्लिम, 402)।
सूरह अल-अहज़ाब (इत्तेहादी लश्कर), आयत 56 : “बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर दुरूद पढ़ते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम भी उन पर दुरूद पढ़ो और ख़ूब सलाम भेजो।”