होम > पैग़ंबर पर दुरूद > सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम
“सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम” वह दुआ है जो मुस्लिम हर बार पैग़ंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का नाम आने पर कहता है : “अल्लाह उन पर दुरूद पढ़े और उन्हें सलाम भेजे।” इसे देवनागरी में, अरबी में या संक्षिप्त रूप में अनगिनत तरीक़ों से लिखा मिलता है : यह पेज इसका मतलब, उच्चारण, मक़बूल लिखावटें और बचने वाले तरीक़े मुक़र्रर करता है।
इस पेज पर
05 अक्टूबर 2026 को 13h13 बजे अपडेट किया गया
📖 4 मिनट पढ़ने का समयअरबी दुआ صلى الله عليه وسلم इस तरह खुलती है : सल्ला (उसने दुरूद पढ़ी), अल्लाहु (अल्लाह), अलैहि (उन पर), व (और), सल्लम (उन्हें सलाम भेजा)। सबसे सही अनुवाद है : “अल्लाह उन पर दुरूद पढ़े और उन्हें सलाम भेजे।” मोमिन की ज़बान से यह दुआ है : वह अल्लाह से माँगता है कि अल्लाह अपने फ़रिश्तों के सामने अपने नबी की प्रशंसा करे और उसे अपनी सलामती से ढक ले।
इसे हिंदी में “अल्लाह की सलामती और बरक़तें उन पर हों” या मुख़्तसर “उन पर सलाम हो” से भी बयान किया जाता है। अल्लाह, फ़रिश्तों और इंसानों पर लागू होने वाले लफ़्ज़ “सलात” का सही मतलब हमारे पेज पैग़ंबर पर दुरूद का मतलब में बयान किया गया है : अल्लाह की तरफ़ से रहमत, फ़रिश्तों की तरफ़ से मग़फ़िरत की दुआ और ईमान वालों की तरफ़ से बँधी हुई दुआ।
देवनागरी में लिखी जाने पर इस दुआ की एक ही लिखावट नहीं है। सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली लिखावटें, जो सब मक़बूल हैं :
ये सभी लिखावटें उसी एक अरबी दुआ को बयान करती हैं ; फ़र्क़ सिर्फ़ मात्राओं और “ल” की दोहराई को लिखने के तरीक़े में है। अरबी में इसे इस तरह लिखते हैं : صلى الله عليه وسلم।
आपने अक़्सर दुआ को “SAW”, “sws”, “SAWS” या सिर्फ़ अरबी अक्षर “ص” के मुख़्तसर रूप में देखा होगा। अहले हदीस के उलमा ने इस तरीक़े को मक़रूह कहा : इब्ने सलाह ने अपनी हदीस के उलूम की मुक़द्दमा में, अन-नववी ने अत-तिब्यान में और फिर अस-सख़ावी ने अल-क़ौल अल-बदीअ (पैग़ंबर पर दुरूद के इसी मौजूआ पर लिखी पूरी किताब) में सिखाया कि दुआ पूरी लिखो, क्योंकि क़ुरआन और सुन्नत का हुक़्म नबी पर दुरूद पढ़ने और सलाम भेजने का है, और संक्षिप्त रूप यह हुक़्म पूरा नहीं करता : यह उस शख़्स के साथ ख़िलाफ़-ए-अदब है जिसे हम इज़्ज़त देना चाहते हैं।
सोशल मीडिया पर बहुत फैली हुई निशानी ﷺ भी उसी राय में है : यह उसी क़िस्म का मुख़्तसर रूप है, उसी एतराज़ के साथ। बिना एतराज़ के लिखा जा सकता है : पूरी दुआ अरबी में (صلى الله عليه وسلم), देवनागरी में पूरी लिखावट (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), या अनुवाद (“उन पर सलामती और बरक़तें हों”)। जुड़वाँ दुआएँ भी इसी अदब के मुह़्ताज हैं : अल्लाह के नाम के बाद “अज़्ज़ व जल्ल” और किसी सहाबी के नाम के बाद “रज़ियल्लाहु अन्हु” भी पूरी लिखी जाती हैं, अलग-अलग अक्षरों में नहीं।
सादा क़ायदा : हर बार जब पैग़ंबर का नाम ज़बान पर आए या लिखा जाए। हदीसें जान-बूझकर छोड़ने को कंजूसी की निशानी बताती हैं (“कंजूस वह है जिसके पास मेरा नाम लिया जाए और वह मुझ पर दुरूद न पढ़े”, मुस्लिम और अत-तिर्मिज़ी से मरवी) और कहने वाले के लिए बहुत बड़ा सवाब बताती हैं (एक के बदले अल्लाह की दस दुरूद, मुस्लिम के मुताबिक़)। ख़ास समय (अज़ान के बाद, जुमे को, दुआ में, तशह्हुद में) हमारे पेज पैग़ंबर पर दुरूद कब पढ़ें में तफ़सील से बयान हैं।
पैग़ंबर ने फ़रमाया : “जो शख़्स मेरे लिए एक बार दुरूद पढ़े, अल्लाह उस पर दस बार दुरूद पढ़ता है।”
मुस्लिम की सहीह में (408) ; अत-तिर्मिज़ी (485) जिसने इसे “हसन सहीह” कहा
इसे भी पढ़ें
यह दुआ صلى الله عليه وسلم (सल्ला अल्लाहु अलैहि व सल्लम) लिखी जाती है। इसे ص या ﷺ में सिमटाने के बजाय पूरी लिखना बेहतर है।
सभी लिखावटें मक़बूल हैं : सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, सल्लल्लाहु अलैहि वस्सलाम, sallallahu alayhi wa sallam। असल बात दुआ को पूरा कहना या पूरी लिखना है।
SAW (या sws) अंग्रेज़ी “Sallallahu alayhi wa sallam” का मुख़्तसर रूप है। अहले हदीस के उलमा (इब्ने सलाह, अन-नववी, अस-सख़ावी) ने मुख़्तसर रूप को मक़रूह कहा : दुआ पूरी लिखो।
यह उसी दुआ की एक और सूरत है : अलैहिस्सलातु वस्सलाम, “उन पर दुरूद और सलाम हो।” यह बराबर है और पैग़ंबर के नाम के बाद इस्तेमाल होती है।