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पैग़ंबर पर दुरूद हर लम्हे का ज़िक्र है : उनका नाम हर बार आने पर इसकी माँग होती है। कुछ समयों की साफ़ नुसूसी बुनियाद भी है ; यह रहे वे, हदीस-दर-हदीस।
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05 अक्टूबर 2026 को 13h13 बजे अपडेट किया गया
📖 4 मिनट पढ़ने का समययही बुनियादी क़ायदा है : पैग़ंबर का नाम आए तो जवाब में “सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम” कहा जाए। सहीह नुसूस इसे उदार दिल की निशानी बताते हैं : “कंजूस वह है जिसके पास मेरा नाम लिया जाए और वह मुझ पर दुरूद न पढ़े” (अत-तिर्मिज़ी, हसन सहीह ; मुस्लिम वही मतलब नक़ल करते हैं)। उलटे, रवायत बताती है कि अल्लाह पैग़ंबर को रूह लौटा देता है ताकि वे हर शख़्स के सलाम का जवाब दें : “कोई शख़्स सलाम नहीं भेजता मगर अल्लाह मेरी रूह लौटा देता है ताकि मैं उसे सलाम का जवाब दूँ” (अबू दाऊद, सहीह इस्नाद)।
एक और पहलू से पैग़ंबर ने फ़रमाया : “जो शख़्स ऐसी जगह पर बैठे जहाँ अल्लाह का ज़िक्र न हो, उसे अल्लाह की तरफ़ से पछतावा होगा, और जो ऐसे बिस्तर पर लेटे जहाँ उसका ज़िक्र न हो, उसे भी अल्लाह की तरफ़ से पछतावा होगा” (अबू दाऊद, 4856) : जिन महफ़िलों में अल्लाह और उनके नबी का ज़िक्र होता है, वे पछतावे से महफ़ूज़ हैं, और पैग़ंबर पर दुरूद उसका बेहतरीन अंजाम है।
“जब तुम अज़ान सुनो तो वैसे ही कहो जैसा मुअज़्ज़िन कहता है, फिर मुझ पर दुरूद पढ़ो : जो शख़्स मेरे लिए एक बार दुरूद पढ़े, अल्लाह उस पर दस बार दुरूद पढ़ता है। फिर अल्लाह से वसीला माँगो (जन्नत का सबसे ऊँचा मुक़ाम) : वह एक मुक़ाम है जो अल्लाह के बस एक बंदे को मिलेगा, और मुझे उम्मीद है कि वह मैं हूँ। जो मेरे लिए वसीला माँगेगा, उसे मेरी सिफ़ारत मिलेगी।”
मुस्लिम की सहीह में (384) ; वही नुस्ख़ा अबू दाऊद (523) और रियादुस सालिहीन (1037) में
फ़ुक़हा इत्तेफ़ाक़ करते हैं : अज़ान के बाद पैग़ंबर पर दुरूद मशरूअ (मुस्तहब) है, किताबों में कोई इख़्तेलाफ़ नक़ल नहीं हुआ ; उलटे तसवीब (“नमाज़ सोने से बेहतर है”) सिर्फ़ फ़ज्र की अज़ान की ख़ासियत है।
पैग़ंबर पर दुरूद की तशह्हुद में मुक़र्रर जगह है, आख़िरी सलाम से पहले। सब उलमा इसकी जाइज़ होने पर इत्तेफ़ाक़ करते हैं ; रुतबे के बारे में, अश-शाफ़ेई इसे आख़िरी बैठक में वाजिब कहते हैं, जबकि हनफ़ी और मालकी उलमा तथा इमाम अहमद की एक रवायत इसे सुन्नत कहती है। सिखाई गई दुआ दुरूद-ए-इब्राहीमी है : देखें पैग़ंबर पर दुरूद कैसे पढ़ें।
“जुमे के दिन और जुमे की रात मुझ पर दुरूद की कसरत करो ; जो शख़्स मेरे लिए एक बार दुरूद पढ़े, अल्लाह उस पर दस बार दुरूद पढ़ता है।”
अल-बैहक़ी अस-सुनन अल-कुबरा (5994) में
जुमा वह दिन है जिस दिन “उम्मत की दुरूद पैग़ंबर के सामने पेश की जाती है” (अबू दाऊद, 1047, इस्नाद को अन-नववी ने सहीह क़रार दिया) : उस दिन जिसने उन पर सबसे ज़्यादा दुरूद पढ़ी होगी, वह मुक़ाम में उनसे सबसे क़रीब होगा (अल-बैहक़ी में भी वही मतलब, 5995)। अत-तिर्मिज़ी (488) यह भी याद दिलाते हैं कि वह “उस बेहतरीन दिन है जिस पर सूरज निकला”।
“दुआ आसमान और ज़मीन के दरमियान रुकी रहती है, और उसमें से कुछ भी ऊपर नहीं उठता जब तक तू अपने नबी पर दुरूद न पढ़े।”
अत-तिर्मिज़ी (486), उमर बिन ख़त्ताब से
और पैग़ंबर ने फ़ुज़ाला इब्ने उबैद को सिखाया : “जब तुममें से कोई दुआ करे तो पहले अपने रब की हम्द करे, फिर पैग़ंबर पर दुरूद पढ़े, फिर जैसे चाहे दुआ करे” (अबू दाऊद और अत-तिर्मिज़ी, “हसन सहीह”)। पहले हम्द, फिर पैग़ंबर पर दुरूद, आख़िर में माँग : यही तरतीब है जो दुआ को ऊपर उठाती है।
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हाँ, यही नुसूस से साबित बुनियादी क़ायदा है ; हदीसें इसे छोड़ने को दिल की कंजूसी की निशानी बताती हैं और एक दुरूद के बदले अल्लाह की दस दुरूद का वादा देती हैं।
अज़ान के जुमले दोहराए जाते हैं, फिर पैग़ंबर पर दुरूद पढ़ी जाती है, फिर वसीला माँगी जाती है : जो पैग़ंबर के लिए वसीला माँगेगा, उसे उनकी सिफ़ारत मिलेगी (मुस्लिम, 384)।
उस दिन यह बहुत ज़्यादा मुस्तहब है (दिन और रात), शरअ का फ़र्ज़ नहीं ; हदीसों ने कसरत का हुक़्म दिया है और उस दिन उम्मत की दुरूद पैग़ंबर के सामने पेश की जाती है (अबू दाऊद, 1047)।
नहीं : “तुम जहाँ भी हो, तुम्हारी दुरूद मुझ तक पहुँचती है” (अबू दाऊद, सहीह इस्नाद) ; पैग़ंबर ने अपनी क़ब्र को ईद बनाने से भी मना फ़रमाया।