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पैग़ंबर ने ख़ुद अपनी उम्मत को दुरूद की दुआ सिखाई। जब सहाबा ने अर्ज़ की : “हमें आपको सलाम भेजने का तरीक़ा मालूम है ; लेकिन आप पर दुरूद कैसे पढ़ें?”, तो उन्होंने वह दुआ बताई जो तब से दुरूद-ए-इब्राहीमी के नाम से मशहूर है, क्योंकि इसमें अल्लाह से दुआ की जाती है कि वह पैग़ंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर वैसे ही दुरूद पढ़े और बरक़तें नाज़िल फ़रमाए जैसा उसने इब्राहीम के लिए किया।
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05 अक्टूबर 2026 को 13h13 बजे अपडेट किया गया
📖 5 मिनट पढ़ने का समयसामान्य हुक़्म को पूरा करने वाली कम-से-कम सूरत यह है :
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ
सल्लल्लाहुम्म सल्लि अला मुहम्मद : “ऐ अल्लाह! मुहम्मद पर दुरूद पढ़।” अक़्सर इसे व सल्लिम (“और उन्हें सलाम भेज”) से पूरा करते हैं। दस दुरूद का सवाब भी इसी छोटी सूरत पर बताया गया है (मुस्लिम, 408)।
क़ाब इब्ने उजरा रवायत करते हैं : पैग़ंबर उनके पास तशरीफ़ लाए और उन्होंने अर्ज़ की : “हमें आपको सलाम भेजने का (सलाम का) तरीक़ा मालूम हो गया ; आप पर दुरूद कैसे पढ़ें?” आप ने फ़रमाया :
कहो : “ऐ अल्लाह! मुहम्मद पर और मुहम्मद की औलाद पर दुरूद पढ़, जैसा तूने इब्राहीम की औलाद पर दुरूद पढ़ी ; और मुहम्मद पर और मुहम्मद की औलाद पर बरक़तें नाज़िल फ़रमा, जैसा तूने इब्राहीम की औलाद पर बरक़तें नाज़िल कीं। बेशक तू हमीद (तारीफ़ के लायक़) और मजीद (बड़ी शान वाला) है।”
मुस्लिम की सहीह में (406) ; अबू हुमैद साइदी के ज़रिए अल-बुख़ारी और मुस्लिम में वही मतलब (405)
पूरी दुआ का अरबी नुस्ख़ा :
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ. اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ
देवनागरी में उच्चारण : सल्लल्लाहुम्म सल्लि अला मुहम्मदिन व अला आले मुहम्मद, कमा सल्लैत अला आले इब्राहीम, इन्नक हमीदुम मजीद। सल्लल्लाहुम्म बारिक अला मुहम्मदिन व अला आले मुहम्मद, कमा बारिक्त अला आले इब्राहीम, इन्नक हमीदुम मजीद।
मुस्लिम (405) की एक रवायत आख़िर में यह जोड़ती है : वस-सलामु कमा क़द अलिमतुम (“और सलाम : तुम जानते ही हो कि वह कैसे कहा जाता है”), क्योंकि पैग़ंबर तशह्हुद का सलाम पहले ही सिखा चुके थे। यह अल-बुख़ारी और मुस्लिम के ज़रिए रियादुस सालिहीन (1405, 1406) में मरवी है।
सहाबा ने इस दुआ को हल्के फ़र्क़ के साथ मरवी की है, जो सब सहीह हैं :
ये रवायतें यह दिखाती हैं कि असल बात अल्लाह से दुआ है कि वह मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर और उनकी औलाद पर दुरूद पढ़े, जैसा उसने इब्राहीम और उनकी औलाद के लिए किया ; तफ़सील वाली सारी सूरतें मक़बूल हैं।
इस दुरूद की मुक़र्रर जगह तशह्हुद है। उलमा इसकी तशह्हुद में जाइज़ होने पर इत्तेफ़ाक़ करते हैं ; उनका इख़्तेलाफ़ इसके रुतबे पर है : अश-शाफ़ेई इसे आख़िरी बैठक में वाजिब कहते हैं, जबकि हनफ़ी और मालकी उलमा तथा इमाम अहमद की एक रवायत इसे नमाज़ की सुन्नत कहती है, फ़र्ज़ नहीं ; उनका दलील यह है कि तशह्हुद की तालीम वाली हदीस कहती है “फिर तुमने अपनी नमाज़ पूरी कर ली” और दुरूद-ए-इब्राहीमी को क़बूलियत की शर्त नहीं बनाती (अबू दाऊद, 968, और अहमद, 4006 से मरवी)। दोनों हालत में इसे तशह्हुद की दूसरी जुमले के बाद, आख़िरी सलाम से पहले पढ़ा जाता है।
तशह्हुद के इलावा यह दुआ अज़ान के बाद (वसीला की दुआ के साथ), जुमे के दिन कसरत से, और हर दुआ की शुरुआत और आख़िर में कही जाती है। पैग़ंबर ने फ़ुज़ाला इब्ने उबैद को सिखाया :
जब तुममें से कोई दुआ करे तो पहले अपने रब की हम्द करे और उसकी तारीफ़ें बयान करे, फिर पैग़ंबर पर दुरूद पढ़े, फिर जैसे चाहे दुआ करे।
अबू दाऊद (1481) और अत-तिर्मिज़ी, जिसने इसे “हसन सहीह” कहा ; रियादुस सालिहीन (1404)
समयों और उनके दलीलों की तफ़सील हमारे पेज पैग़ंबर पर दुरूद कब पढ़ें में है।
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“सल्लल्लाहुम्म सल्लि अला मुहम्मदिन व अला आले मुहम्मद, कमा सल्लैत अला आले इब्राहीम, इन्नक हमीदुम मजीद ; सल्लल्लाहुम्म बारिक अला मुहम्मदिन व अला आले मुहम्मद, कमा बारिक्त अला आले इब्राहीम, इन्नक हमीदुम मजीद।” पैग़ंबर ने क़ाब इब्ने उजरा को सिखाई, मुस्लिम (406) से मरवी।
नमाज़ के बाहर की दुआ हिंदी में भी हो सकती है (“ऐ अल्लाह! मुहम्मद पर दुरूद पढ़ और उन्हें बरक़तें दे”) ; तशह्हुद में दुरूद अरबी में सीखी जाती है, जैसे नमाज़ की बाक़ी अज़्ज़ा सीखी जाती हैं।
अश-शाफ़ेई इसे आख़िरी तशह्हुद में वाजिब कहते हैं ; हनफ़ी और मालकी उलमा तथा इमाम अहमद की एक रवायत इसे सुन्नत कहती है। जाइज़ होने पर सब इत्तेफ़ाक़ करते हैं, रुतबे पर इख़्तेलाफ़ है।
अज़ान की जुमले दोहराओ, फिर पैग़ंबर पर दुरूद पढ़ो, फिर वसीला माँगो : “जो मेरे लिए वसीला माँगेगा, उसे मेरी सिफ़ारत मिलेगी” (मुस्लिम, 384)।