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नील से बचाया गया बच्चा, तूर पर इल्हाम, असा, फटा समंदर, सीनै पर तौरात : क़ुरआन के मुताबिक़ मूसा का क़िस्सा, और इस्लाम में मूसा की बेनज़ीर जगह क्यों है।
मूसा (अलैहिस्सलाम) क़ुरआन में सबसे ज़्यादा क़बूल होने वाले पैग़ंबर हैं : उनका क़िस्सा दर्जनों इबारतों से गुज़रता है, नील से बचाए गए बच्चे से सीनै पर तौरात दिए जाने तक (क़ुरआन 7:144-145)। इस्लाम उन्हें उस हस्ती की इज़्ज़त देता है जिन्हें "निश्चय वह चुना हुआ था तथा रसूल एवं नबी था" (क़ुरआन 19:51), जिनसे अल्लाह ने सीधे बात की ("अल्लाह ने मूसा से बात की", क़ुरआन 4:164)। मूसा पर और तौरात पर ईमान ईमान-ए-मुसलमानी का हिस्सा है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयक़िस्सा इक ज़ालिमाना फ़रमान से शुरू होता है : फ़िरौन बनी इसराईल के नए पैदा हुए बच्चों को क़त्ल करवाता है। अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्सलाम) की वालिदा के दिल में डाला कि बच्चे को संदूक़चे में रखकर दरिया पर छोड़ दें, और तक़दीर ने सब उलट दिया : महरूम-ए-हयात ठहराया गया बच्चा ख़ुद फ़िरौन के ही घर में परवरिश पाता है। अल्लाह बाद में उनसे कहेगा : "मैंने तुझे अपनी निगरानी के नीचे परवरिश दी"।
वाक़िया सूरह 28 और सूरह 20 में सुनाया गया है : हर तफ़सील सिखाती है कि अल्लाह के मनसूबे इंसानों के मनसूबों को पार कर जाते हैं।
बड़ा होकर, हिजरत में, मूसा को तूर के क़रीब वही मिली : "निःसंदेह मैं ही अल्लाह हूँ, मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं" (क़ुरआन 20:14), और दो निशानियाँ : साँप बनने वाली असा, बिना बीमारी के सफ़ेद होता हाथ। फ़िरौन की तरफ़ भेजे गए, उन्होंने बनी इसराईल की आज़ादी माँगी ; बादशाह के जादूगर असा से मात खाकर सजदे में गिरे और ईमान लाए।
फिर समंदर आया : अल्लाह ने मूसा से कहा "अपनी लाठी को सागर पर मारो। (उसने लाठी मारी) तो वह फट गया और हर टुकड़ा बड़े पहाड़ की तरह हो गया" (क़ुरआन 26:63), और ज़ालिम की फ़ौज डूब गई।
फ़िरौन, जो "मैं तुम्हारा सबसे ऊँचा पालनहार हूँ" (क़ुरआन 79:24) चिल्लाता था, डूबकर मरा, और क़ुरआन ने उसे हर दौर की ज़ालिम हुकूमतों के लिए आबदी इबरत ठहराया। अल्लाह मूसा से सीधे बात करता है, इस हद तक कि क़ुरआन उन्हें "कलीमुल्लाह", जिससे अल्लाह ने बात की, कहता है (क़ुरआन 4:164)।
सीनै पर अल्लाह मूसा से बात करता है, उन्हें तख़्तियाँ देता है : "हर चीज़ से संबंधित निर्देश और हर चीज़ का विवरण" (क़ुरआन 7:144-145) : तौरात, वह इल्हाम जिसे इस्लाम इलाही समझता है।
क़िस्से में क़ौम का गुनाह भी है : पैग़ंबर की ग़ैबूबी में बना सोने का बछड़ा, माँगी गई मग़फ़िरत, चुने हुए क़ौम के लिए यह कलिमा "ऐ बनी इसराईल! मेरी वह नेमत याद करो, जो मैंने तुम्हें प्रदान की" (क़ुरआन 2:40)। क़ुरआन मूसा को माबूद ठहराए बग़ैर सुनाता है : इक ताक़तवर इंसान, आग-बग़ोला मिज़ाज, जो फ़रियाद करता, कभी ग़लती करता और सीखता है, उस वाक़िये तक (क़ुरआन 18:60-82) जहाँ उन्हें अपने इल्म की हद पता चलती है।
शाब-ए-मेराज की हदीसों में मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) आसमानों में मूसा से मिले, और रोज़ाना पाँच नमाज़ें उन्हीं की नसीहत पर ठहरीं (बुख़ारी से मरवा) : दोनों शरीयत-देहिंदों का ताल्लुक़, बड़ा भाई और सील। पूरा क़िस्सा, आयत-ब-आयत दलीलों के साथ, मूसा कलीमुल्लाह के क़िस्से में पढ़ा जा सकता है। और मूसा को दी गई तौरात की जगह इस्लाम में तौरात के पृष्ठ में बयान है।
उनका क़िस्सा पैग़ंबरी दावत के बुनियादी मज़मून रखता है : मज़लूमों की आज़ादी, ज़ालिम से टकराव, इल्हामी शरीयत, इक क़ौम की आज़माइश। क़ुरआन उन्हें तफ़सील से सुनाता है और मुहम्मद (उन पर सलाम हो) से पहले शरीयत-देहिंदा पैग़ंबर के नमूने के तौर पर क़बूल करता है।
शाब-ए-मेराज की हदीसों के मुताबिक़ मुहम्मद (उन पर सलाम हो) मेराज में मूसा (अलैहिस्सलाम) से मिले, और रोज़ाना नमाज़ों की गिनती उन्हीं की नसीहत पर पाँच ठहरी (बुख़ारी से मरवा)। पैग़ंबर इस्लाम में एक-दूसरे के भाई पहचानते हैं।