होम > धर्म और मान्यताएँ > इस्लाम की नज़र में सिख धर्म > क्या सिख धर्म एकेश्वरवादी है ?
सिख धर्म अपनी पहली ही इबारत में बिना तस्वीर अकेला माबूद बयान करता है। यह तौहीद से क्या बाँटता है, और 3 वे इख़्तिलाफ़ जो बने रहते हैं।
हाँ। पंजाब में 16वीं सदी में गुरु नानक द्वारा बुनियाद पाया सिख धर्म अकेले, रचयिता, बिना तस्वीर और बिना जन्म वाले माबूद का इक़रार करता है : "इक ओअंकार", अकेला, गुरु ग्रंथ साहिब, पवित्र किताब, को खोलता है।
यह तौहीद असल बात पर तौहीद के क़रीब आता है : अकेला माबूद बिना शरीक और बिना अवतार। 3 बातों पर अलग होता है : पुनर्जन्म और कर्म मक़बूल हैं, गुरु रूहानी वसीतों का किरदार निभाते हैं, और वही ग्रंथ के उसी नुस में ख़त्म हो जाती है, बिना क़ुरआनी माइने की आख़िरी रिसालत के।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयसिख धर्म एक अकेली निशानी से खुलता है : इक ओअंकार, अकेला है। उसके बाद का मूल मंतर माबूद को बेहतरीन सच्चाई, रचयिता, बिना डर, बिना नफ़रत, बिना तस्वीर, जन्मों से बाला और ख़ुद से मौजूद बताता है।
गुरु नानक (1469-1539) ने, बहु-देवतावादी हिन्दू धर्म और इस्लाम से गुज़रते इलाक़े में, इस तरह एक मज़बूत और बिना समझौते का तौहीद रखा : अकेला माबूद, तस्वीरों से माअतूल, जिसे कोई अवतार नहीं दर्शाता। पवित्र किताब, गुरु ग्रंथ साहिब, गुरुओं की सलामतों और कुछ दूसरे दौर के संतों की सलामतें जमा करता है, और 1708 से वही ख़ुद क़ौम के हमेशा के गुरु का फ़र्ज़ निभाता है।
इस बात पर क़रीबत असली है : न कोई सिख मंदिर और न कोई मस्जिद इलाही नुमाइंदगी दिखाती है। इस्लाम अल्लाह को बयान करता है : "(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है। अल्लाह बेनियाज़ है। न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है। और न कोई उसका समकक्ष है।" (क़ुरआन 112:1-4)।
सिख धर्म मूरतियों में माबूद के अवतार को ठुकराता है, इस्लाम हर शब्हत को ठुकराता है : "उसे निगाहें नहीं पातीं" (क़ुरआन 6:103)। दोनों रिवायतें तस्वीर के इनकार के साथ एक क़रीब अख़लाक़ जोड़ती हैं : माबूद के सामने इंसानों की बराबरी, फ़र्ज़ी ख़ैर (सिख लंगर, सबके लिए खुला क़ौमी खाना, मुसलमानों के ज़कात के जवाब में), इमानदार मेहनत और बाँटना। ये इक़रारात सरगोशी नहीं : ये एक ही सामी बुनियाद से आती हैं जो पंजाब पहुँचकर दोबारा तावील हुई।
इख़्तिलाफ़ साफ़ हैं। 1 : चक्कर। सिख धर्म पुनर्जन्म और कर्म रखता है, जहाँ इस्लाम अकेली ज़िंदगी और अकेले फ़ैसले की तालीम देता है। 2 : वसीत।
सिख गुरु राह इंतक़ाल करते हैं और इबादत में गुरु की रोशनी अल्लाह तक पहुँच को बीच में रखती है ;
इस्लाम दुआ में कोई वसीत नहीं मानता : बंदा सीधे पुकारता है, और अल्लाह जवाब देता है (क़ुरआन 2:186)। 3 : वही। सिख धर्म ग्रंथ पर ख़त्म होता है, बिना क़ुरआनी माइने की पैग़ंबरी बंदिश के ;
इस्लाम रिसालत को मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) के साथ मुहर-बंद करता है। मुसलमान इस तरह सिख धर्म में एक मख़्लूस तौहीद का एहतराम करता है, और उसके सामने ख़ालिस तौहीद, मुहर-बंद रिसालत और अकेला फ़ैसला रखता है।
10 इंसानी गुरु, नानक से गोबिंद सिंह तक (1708 में इंतक़ाल), सिख अक़ीदे में देवता नहीं : वे हक़ीक़त के दरवाज़े हैं, और फिर नुस उनकी जगह लेता है। इस्लाम की नज़र से सरहद उस किरदार पर है जो उन्हें दिया गया : जहाँ कोई मख़्लूक़ नजात का लाज़मी नहर बन जाए, वहदत पीछे हट जाती है।
तौहीद बंदे को बिना नहर, बिना रस्मी पादरी, बिना किताब-माबूद के अपने मालिक के सामने खड़ा करता है : क़ुरआन अल्लाह की बात है, जिसकी इबादत अपने आप में नहीं होती, मगर जिसकी फ़रमानबरदारी होती है कि वह उसी से आई है। फ़र्क़ बारीक है मगर मुकम्ल, और यही बयान करता है कि माबूद पर इतने क़रीब दो तौहीद नजात पर पूरे अलग क्यों हो सकते हैं। सिख धर्म और इस्लाम में अंतर का पृष्ठ अमल को बज़बत संभालता है।
हरफ़-ब-हरफ़ माइने में नहीं : वे 10 गुरुओं की रूहानी रोशनी का एहतराम करते हैं और 1708 से गुरु ग्रंथ साहिब के उसी नुस को हमेशा का गुरु मानते हैं। इस्लाम की नज़र से यहीं तौहीद दूरी बनाता है : मुसलमान किसी के ज़रिए सिफ़ारिश नहीं करता, और सीधे अपने मालिक को पुकारता है जो पुकारने वाले का जवाब देता है (क़ुरआन 2:186)।
तारीख़ी तौर पर गुरु नानक ने पंजाब में दोनों रिवायतों के चौराहे पर ज़िंदगी गुज़ारी, और सिख धर्म उसमें से रोशन तत्व रखता है : मुसलमानों की तरफ़ से बिना तस्वीर अकेला, हिन्दुओं की तरफ़ से चक्कर और कर्म। सिख अपनी वही का दावा करते हैं, जो उनके गुरुओं को मिली। मुसलमान हर अकीदे को उसके मज़मून से आँकता है : बिना जन्म अकेला माबूद मुताबिक़ है, वसीत और चक्कर मुताबिक़ नहीं।
इस्लाम की तरह, वह समझता है कि माबूद हर नुमाइंदगी से बाला है : सिख मंदिर (गुरुद्वारा) किताब को जगह देते हैं, कभी मूरतियों को नहीं। तस्वीर का यह इनकार पंजाब और अरब के दोनों धर्मों के सबसे बड़े मुशतरका पहलुओं में से एक है।