यहूदी धर्म : इस्लाम की नज़र में

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यहूद अपनी किताबों (तौरात, तनख़, मैमोनीदेस के उसूल) के मुताबिक़ क्या ईमान रखते हैं, क़ुरआन बनी इसराईल और मूसा के बारे में क्या कहता है, इत्तेफ़ाक़ और इख़्तिलाफ़, उस इज़्ज़त के साथ जिसका हुक्म इस्लाम देता है।

यहूदी धर्म क़ौम-ए-इसराईल का दीन है, जिसका मरकज़ मूसा (अलैहिस्सलाम) को दी गई तौरात, इबराहीम की मुआहदा और मसीह का इंतज़ार है। इस्लाम मूसा को बड़े पैग़ंबर मानता है (क़ुरआन 19:51) और तौरात को अल्लाह का इल्हाम समझता है जिसमें "हिदायत और नूर" है (क़ुरआन 5:44)। ख़ालिस तौहीद पर दोनों धर्म अक़ाईदी तौर पर क़रीब हैं।

बुनियादी इख़्तिलाफ़ : इस्लाम सिखाता है कि मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) आख़िरी रसूल हैं (क़ुरआन 33:40), जिनका पैग़ाम आम है, जबकि यहूदी धर्म इक क़ौम का दीन रहता है और किसी बाद के पैग़ंबर का मंतज़िर नहीं।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

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यहूद अपनी सरचश्मों के मुताबिक़ क्या ईमान रखते हैं

यहूदी धर्म की बुनियाद तौरात है (रिवायत के मुताबिक़ सीनै पर मूसा (अलैहिस्सलाम) को दी गई शरीयत), जिसे पैग़ंबरों और कुतुब (सब मिलाकर तनख़) और फिर रब्बानी तअबीर से मुकम्ल किया गया।

उनकी इबादती रूह "शमा" है : "ऐ इसराईल! सुन, रब हमारा अल्लाह इक अकेला रब है" (बाइबिल दु रब्बिनात, व्यवस्थाविवरण 6:4) : बेहद तौहीद, बिना त्रित्व, बिना तनस्सुक, बिना तस्वीर। मैमोनीदेस (बारहवीं सदी) के 13 ईमानी उसूल क्लासिकी यहूदी अक़ीदे का ख़ुलासा हैं : इक ख़ालिक़ अल्लाह, पैग़ंबरी, तौरात का सच्चा होना और उसकी ग़ैर-तब्दीली, इलाही इल्म, मसीह की आमद (इक इंसानी बादशाह जो इसराईल को वापस लाएगा), मुर्दों का जी-उठना और हिसाब।

यहूदी ज़िंदगी मुआहदे के गिर्द घूमती है : ख़तना, शब्बात (हफ़्तेवार आराम), खाने-पीने के क़ानून (कशरूत), दुआ और दरस।

एक अहम तफ़सील : यहूदी धर्म इस्लाम या ईसाई धर्म जैसा क़बूल-ए-आम वाला आम दीन नहीं ; वह इक क़ौम, इसराईल, का दीन है, जो पैदाइश और मुआहदे से मुतअर्रिफ़ है। मुहतदी इक सख़्त तरीक़े (गियूर) से दाख़िल होता है, मगर यहूदी मक़सद चुने हुए क़ौम से जुड़ा रहता है।

इस्लाम में मूसा और तौरात

क़ुरआन मूसा (अलैहिस्सलाम) को सबसे ज़्यादा ज़िक्र होने वाले पैग़ंबरों में इज़्ज़त देता है : "आप इस पुस्तक में मूसा की चर्चा करें। निश्चय वह चुना हुआ था तथा रसूल एवं नबी था" (क़ुरआन 19:51)। तौरात इस्लाम के लिए असली इल्हाम है : "निःसंदेह हमने तौरात उतारी, जिसमें मार्गदर्शन और प्रकाश था" (क़ुरआन 5:44)।

बनी इसराईल को क़ुरआन में मुहब्बत भरे तज़किरे मिलते हैं : "ऐ बनी इसराईल! मेरी वह नेमत याद करो, जो मैंने तुम्हें प्रदान की" (क़ुरआन 2:40)।

इबराहीम (अलैहिस्सलाम), इसहाक़, याक़ूब, यूसुफ़, मूसा, हारून, दाऊद और सुलैमान क़ुरआनी और बाइबिली दोनों क़िस्सों के हीरो हैं : इक बहुत बड़ी मुश्तरका ज़मीन।

यहूदी धर्म और इस्लाम के बीच इत्तेफ़ाक़

  • सख़्त तौहीद : अल्लाह की ज़ात पर यहूदी धर्म त्रित्ववादी ईसाई धर्म से ज़्यादा इस्लाम के क़रीब है : न त्रित्व, न तनस्सुक, इक अल्लाह बिना तस्वीर के।
  • पैग़ंबर : मूसा पर और पैग़ंबरी पर ईमान ईमान-ए-मुसलमानी का हिस्सा है ; इस्लाम इसराईल के मक़सद और भेजी गई किताबों की तस्दीक़ करता है।
  • क़रीब अमल : ख़तना, खाने-पीने के क़ानून, दुआ, रोज़ा (यहूदी किप्पुर और इस्लामी रोज़े इक जैसे मंतक़ पर हैं), सामाजिक इंसाफ़।
  • ज़िंदगी और इंसाफ़ की पाकीज़गी : "जो इक ज़ात को बग़ैर जुर्म के क़त्ल करे वह ऐसा है जैसे उसने सारे इंसानों को क़त्ल किया" यह उसूल क़ुरआन बनी इसराईल को क़बूल करते हुए देता है (क़ुरआन 5:32)।

यहूदी धर्म और इस्लाम के बीच अक़ाईदी इख़्तिलाफ़

वह साफ़ हैं और तीन नुक़्तों पर मरकज़। पहला, पैग़ंबरी की बंदी : यहूदी धर्म मसीह का मंतज़िर है मगर बाइबिली दौर के बाद किसी पैग़ंबर को नहीं मानता ; इस्लाम सिखाता है कि मुहम्मद (उन पर सलाम हो) ख़ातम-उन-नबियीन हैं (क़ुरआन 33:40), जिनकी ख़ुशख़बरी तौरात ख़ुद में है (क़ुरआन 7:157)।

क़ुरआन उस तज़ाद को बयान करता है : बनी इसराईल के उलमा मुहम्मद को "वैसे ही जानते हैं, जैसे अपने बेटों को पहचानते हैं" पहचानते थे, बज़ ने अपना मालूम सच छुपाया (क़ुरआन 2:146)।

दूसरा, पैग़ाम की हैसियत : यहूदी दीन इक क़ौम का रहता है, इस्लाम आम है, पूरी इंसानियत की तरफ़, आख़िरी ज़माने तक (क़ुरआन 34:28)। तीसरा, किताबें : क़ुरआन तौरात के इलाही मंबे की तस्दीक़ करते हुए उस दौर की बज़ ख़ुशनवीसों की हुई तब्दीलियाँ बयान करता है (क़ुरआन 2:79, 5:13) ; मुसलमान इसलिए आज की तौरात को क़ुरआन की रोशनी में, आख़िरी मियार से, पढ़ता है (क़ुरआन 5:48)।

इन सब मामलों में इस दस्तावेज़ का तहरीरी उसूल ख़ुद क़ुरआन का है : किताबों और अक़ाईद की बहस, कभी शख़्सों या क़ौमों की नहीं। तब्दीली का इलज़ाम एक दौर के ख़ुशनवीसों की तरफ़ है, आज की यहूदी जमाअतों की तरफ़ नहीं, और किसी आयत ने किसी शख़्स के ईमान पर दुश्मनी की इजाज़त नहीं दी।

यहूद और मुसलमान : इस्लाम के मुताबिक़ हमज़िंदगी

इस्लाम यहूद के साथ साफ़ ढाँचा मुतअय्यन करता है : वे एहले-किताब हैं, जिनसे निकाह और खाना जायज़ है (क़ुरआन 5:5), जिनसे "केवल ऐसे तरीक़े से वाद-विवाद करो, जो सबसे उत्तम हो" बहस की जाती है (क़ुरआन 29:46), और जिनके साथ इंसाफ़ और भलाई फ़र्ज़ है जब तक वे दीन की वजह से जंग नहीं करते : "अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों से अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के विषय में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला।" (क़ुरआन 60:8)।

तारीख़ ने अक्सर यह दिखाया है : यहूदी जमाअतें इस्लामी ज़मीन पर, ख़ासकर अंदलुस में, सदियों हिफ़ाज़त और तरक़्क़ी से रहीं। अक़ाईदी इख़्तिलाफ़, असली और क़बूल-शुदा, दुश्मनी की इजाज़त नहीं : उसके साथ इंसाफ़ और इंसानी क़रीबत की फ़र्ज़ीयत है।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न इस्लाम की नज़र में यहूदी धर्म

क्या यहूद और मुसलमान एक ही अल्लाह की इबादत करते हैं ?

हाँ : इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब का वही अल्लाह आदम और मुहम्मद (उन पर सलाम हो) का अल्लाह है। क़ुरआन एहले-किताब से कहता है : "हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य एक ही है" (क़ुरआन 29:46)। उसके क़ानूनों और रसूलों पर अक़ाईद मुख़्तलिफ़ हैं, ख़ालिक़ की शनाख़्त पर नहीं।

यहूद मुहम्मद (उन पर सलाम हो) को क्यों नहीं मानते ?

उनके मियार दाऊद की औलाद से ऐसे मसीह का मंतज़िर रखते हैं जो इसराईल की हुकूमत वापस लाए, और बाइबिली पैग़ंबरी की बंदी के बाद किसी पैग़ंबर को जगह नहीं देते। क़ुरआन जवाब देता है कि मुहम्मद (उन पर सलाम हो) उनकी तौरात में "लिखा" था और वे उन्हें "वैसे ही जानते हैं, जैसे अपने बेटों को पहचानते हैं" पहचानते थे (क़ुरआन 2:146)।

इस्लाम आज की तौरात के बारे में क्या कहता है ?

क़ुरआन उसका इलाही मंबे तस्दीक़ करता है : "निःसंदेह हमने तौरात उतारी, जिसमें मार्गदर्शन और प्रकाश था" (क़ुरआन 5:44)। हालाँकि उस दौर के बज़ ख़ुशनवीसों पर इलज़ाम है कि उन्होंने अपने हाथों से लिखकर उसे अल्लाह का कलाम पेश किया (क़ुरआन 2:79) : यह किताबों पर अक़ीदी नुक़्ता है, कभी क़ौम पर हुक्म नहीं।

स्रोत: क़ुरआन 19:51-53 · क़ुरआन 5:44 · क़ुरआन 2:146 · क़ुरआन 2:79 · क़ुरआन 29:46 · बाइबिल दु रब्बिनात (व्यवस्थाविवरण 6:4) · मैमोनीदेस के 13 ईमानी उसूल

के बारे में अन्य प्रश्न इस्लाम की नज़र में यहूदी धर्म

  1. यहूदी धर्म और इस्लाम में क्या अंतर हैं ?
  2. इस्लाम में तौरात
  3. क्या अल्लाह और यहवा एक ही माबूद हैं ?
  4. यहूदी मुहम्मद को क्यों नहीं मानते ?
  5. क़ुरआन में मूसा
  6. तौरात में मुहम्मद

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اللهم صل على محمد ऐ अल्लाह, मुहम्मद पर दरूद भेज

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद