होम > धर्म और मान्यताएँ > इस्लाम की नज़र में बौद्ध धर्म > क्या क़ुरआन में बुद्ध का ज़िक्र है ?
क़ुरआन बुद्ध का नाम नहीं लेता। ज़ुल किफ़्ल के गिर्द मशरक़ी-दानों की फ़र्ज़ी राय, बिना-नाम रसूलों के बारे में इस्लाम क्या कहता है, और वह इहतियात जो ज़रूरी है।
नहीं। क़ुरआन न बुद्ध का नाम लेता है और न बौद्ध धर्म का।
कुछ मशरक़ी-दानों ने पैग़ंबर ज़ुल किफ़्ल (क़ुरआन 21:85-86) को सिफ़त की शब्हत (किफ़्ल और कपिल) और जगह की शब्हत से बुद्ध ठहराने की राय दी : यह फ़र्ज़ी राय कभी साबित नहीं हुई और मुसलमान उलमा उसे नहीं रखते। इस्लाम तालीम देता है कि हर क़ौम में दरोग़श आया (क़ुरआन 35:24) : बिना वही के पुराने हकीमों का बज़बत मक़ाम अल्लाह के हाथ में है।
विषय-सूची:
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयक़ुरआन एक आम क़ाइदा बयान करता है : "हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल भेजा" जिन्होंने कहा कि "अल्लाह की इबादत करो और ताग़ूत (अल्लाह के अलावा की पूजा) से बचो" (क़ुरआन 16:36)। और वह नतीजा निकालता है : "कोई समुदाय ऐसा नहीं, जिसमें कोई डराने वाला न आया हो।" (क़ुरआन 35:24)।
दो आयतें आगे, किताब बयान करती है कि जिनमें से कुछ ऐसे हैं जिनका हाल हम आपसे वर्णन कर चुके हैं तथा उनमें से कुछ ऐसे हैं जिनके हाल का वर्णन हमने आपसे नहीं किया है : नाम-बर-नाम पैग़ंबरों की सूची नमूना है, मुकम्ल फ़ेहरिस्त नहीं। इसी ढाँचे में बुद्ध (सिद्धार्थ गौतम, मौजूदा भारत के उत्तर में, ईस्वी से पहले 6वीं-5वीं सदी) का सवाल इमानदारी से उठता है : इतना पुराना हकीम, इतनी बड़ी तहज़ीब में, क्या वह बिना दरोग़श के रह गया होगा ? क़ुरआन यह नतीजा ठुकराता है, बिना किसी का नाम लिए।
क़ुरआन ज़ुल किफ़्ल का ज़िक्र सब्र-वालों में करता है जो बच निकले : "तथा इसमाईल, इदरीस और ज़ुल किफ़्ल को (याद करो)। हर एक धैर्यवानों में से था।" (क़ुरआन 21:85)। कुछ मशरक़ी-दानों ने उसमें बुद्ध पहचानने की राय दी : कपिलवस्तु, जन्म का शहर, किफ़्ल जैसी सुनाई देता है, और बयान की गई सब्र हकीम के चित्र से मिलती है।
क्लासिकी मुसलमान मुफ़स्सिरीन, उलटे, ज़ुल किफ़्ल को इसराईली या अरब शख़्सियतें ठहराते हैं, और कोई पुरानी इस्लामी सरचश्मा इस दावे को साबित नहीं करती। इमानदारी फ़र्ज़ करती है : यह मॉडर्न फ़र्ज़ी राय है बिना मुसलमानों के नुसख़ाई बुनियाद के, जिसे मुसलमान उतना ही मरवा करता है, न ज़्यादा न कम।
बुद्ध कोई रचयिता नहीं बताते : उनकी तालीम दुख से शुरू होती है, उसकी वजहों (ख़्वाहिश) का तज़ज़ी करती है और मुक्ति की राह पेश करती है (8 हिस्सों की शरीफ़ राह, धम्मपद में बज़बत), जो निर्वाण तक ले जाती है। वे क़ुरआनी माइने में इलाही वही का दावा नहीं करते, और बौद्ध आख़िरत दोबारा जी उठने और फ़ैसले की बजाए पुनर्जन्मों से बनती है।
इस्लाम की नज़र से यह एक दमदार अख़लाक़ी निज़ाम है, हमदर्दी और ख़ुद पर क़ाबू की असली फ़िक्र के साथ, मगर उसकी बुनियादें (कोई एलान-शुदा रचयिता नहीं, पुनर्जन्म के चक्कर) तौहीद से अलग हैं। मुसलमान अमली हिकमत को पहचान सकता है बग़ैर इसके कि बौद्ध नुस्ख़ों को महफ़ूज़ वही का मक़ाम दे : इंसानी हिकमत और रिसालत का फ़र्क़ साफ़ है, और यही जवाब को ढालता है।
इस्लाम 2 मुतज़ाद हद-गुज़ारियों को ठुकराता है : बग़ैर वही के बुद्ध को पैग़ंबर एलानना, या बिना इल्म के उन्हें मलून करना। उन क़ौमों पर फ़ैसला जिन तक साफ़ पैग़ाम नहीं पहुँचा, सिर्फ़ अल्लाह का है, और उलमा क़ाइदा ठहराते हैं : जिस तक दावत नहीं पहुँची, वह उस चीज़ का मोहताज नहीं जो उसे मालूम नहीं थी।
इन दोनों के दरमियान मुसलमान की राह है : अख़लाक़ी भलाई को हर जगह पहचानना, यह यक़ीन कि आख़िरी हक़ीक़त आख़िरी पैग़ाम के साथ आ चुकी, और बेहतर की ओर सुकून भरी दावत। निर्वाण और जन्नत में अंतर का पृष्ठ रूह के दोनों अंजाम की मुवाज़नत करता है, और बौद्ध धर्म का पृष्ठ पूरी रिवायत पेश करता है।
यह 19वीं सदी के मशरक़ी-दानों की फ़र्ज़ी राय है, जो सिफ़त की शब्हत और ज़ुल किफ़्ल को सब्र-वाला और इंसाफ़-मंद इंसान बताए जाने पर टिकी है। वह किसी पुरानी इस्लामी सरचश्मे पर टिकी नहीं : क्लासिकी मुफ़स्सिरीन ज़ुल किफ़्ल को इसराईली या अरब शख़्सियतें ठहराते हैं, और कोई इत्तेफ़ाक़ बुद्ध को नहीं रखता। सवाल इस माइने में खुला है कि अपने तमाम भेजे हुओं को सिर्फ़ अल्लाह जानता है।
सवाल क़ौमों और अक़ीदों का फ़ैसला करता है, इफ़्फ़ात-वालों का नहीं : दिलों का फ़ैसला अल्लाह करता है। बौद्ध धर्म अलग-अलग तरीक़ों से अमल में आता है (फ़लसफ़ा, मूरती की पूजा, महज़ मनन, मज़हब के मुताबिक़), और इस्लाम मूरती की पूजा को अमल के तौर पर बुरा कहता है, बिना उन इफ़्फ़ात-वालों पर कुल फ़ैसले के जिन तक अक़ीदे ठीक से नहीं पहुँचे। मुसलमान हिकमत के साथ दावत देता है और आख़िरी फ़ैसला मालिक को छोड़ता है।
क़ुरआन ख़ुद कहता है : कुछ रसूलों का ज़िक्र आया है, कुछ का नहीं (क़ुरआन 40:78)। नाम-बर-नाम सूची तालीमी है, मुकम्ल फ़ेहरिस्त नहीं : असल चीज़ क़ाइदा है, हर क़ौम के लिए दरोग़श, और बिना-इंतक़ाल नामों पर इहतियात।