यहूदी मुहम्मद को क्यों नहीं मानते ?

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मसीह और पैग़ंबरी के यहूदी मियार, क़ुरआन का जवाब (एक गिरोह की शनाख़्त और छुपाव), अब्दुल्लाह इब्ने सलाम की मिसाल, और बग़ैर दुश्मनी के बहस का उसूल।

यहूदी धर्म दाऊद की औलाद से ऐसे मसीह का मंतज़िर रखता है जो इसराईल वापस लाए, और बाइबिली दौर के बाद किसी पैग़ंबर को जगह नहीं देता : मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) इन मियारों में से किसी में नहीं आते, इसी से उनका अक़ीदी इनकार है। क़ुरआन जवाब देता है कि मुहम्मद तौरात में लिखे हुए थे और इसराईल के उलमा उन्हें "वैसे ही जानते हैं, जैसे अपने बेटों को पहचानते हैं" पहचानते थे, उनमें से बज़ ने यह इल्म छुपाया (क़ुरआन 2:146)। बज़ यहूदों ने उन्हें माना और पीछे चले, उनके सरपरस्त अब्दुल्लाह इब्ने सलाम थे।

इख़्तिलाफ़ अक़ीदी रहता है : कभी क़ौम पर हुक्म नहीं।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

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यहूदी मियार : मुहम्मद ढाँचे में क्यों नहीं आते

रब्बानी यहूदी धर्म के मियार साफ़ हैं : बाइबिली पैग़ंबरी बंद है, और मुंतज़िर मसीह दाऊद की औलाद से इक बादशाह है जो परगनों को इकट्ठा करेगा, हैकल दोबारा खड़ा करेगा और इसराईल की शरीयत क़ायम करेगा, जिसका ख़ुलासा बाद में मैमोनीदेस के मिश्ने तोरा (बादशाहों के अहकाम) में हुआ।

मुहम्मद (उन पर सलाम हो), इस्माईल की औलाद से अरब, सारी क़ौमों के लिए नए शरीयत के बरदार, इन ढाँचों में से किसी में नहीं आते : यही इनकार का अक़ीदी दिल है, और उसे वैसा ही, बिना ग़लत तस्वीर के, पेश करना चाहिए। जो पढ़ाई अलग है वह शख़्सों से कम नहीं।

मुहम्मद और यहूदी धर्म : क़ुरआन का जवाब

क़ुरआन पहले बयान करता है कि मुहम्मद किताबों में ख़ुशख़बरी-दीह और मन्सूब थे : "जो उम्मी नबी है, जिसे वे अपने पास तौरात तथा इंजील में लिखा हुआ पाते हैं" (क़ुरआन 7:157)। फिर उस दौर का तज़ाद बयान करता है : "जिन्हें हमने पुस्तक दी है, वे उसे वैसे ही जानते हैं, जैसे अपने बेटों को पहचानते हैं, और निःसंदेह उनमें से एक समूह जानते हुए भी सत्य को छिपाता है" (क़ुरआन 2:146)।

इबारत साफ़ और बारीक है : आम शनाख़्त, और छुपाव "एक गिरोह" की तरफ़ मनसूब, सब की तरफ़ नहीं।

और क़ुरआन उलट क़िस्सा क़बूल करता है, जो मशहूर हो गया : अब्दुल्लाह इब्ने सलाम, मदीना के यहूदी उलमा, जिन्होंने पूछे जाने पर अपना सरेआम ईमान एलान किया (सीरत से मरवा), और तारीफ़-शुदा एहले-किताब की जमाअतें : "किताब वालों में एक समूह (सत्य पर) स्थापित है, जो रात की घड़ियों में अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं" (क़ुरआन 3:113)।

इब्नुल क़य्यिम की इक तफ़सील मुसलमान को एक आम मुनाज़िसाना ग़ुलात से बचाती है : इस्लाम यह नहीं सिखाता कि "मुहम्मद" का नाम सब नुस्ख़ों से, हर जगह, एक ख़ुफ़िया साज़िश से मिटा दिया गया।

हिदायत अल-हयारा (गुमराहों की हिदायत) में वे लिखते हैं कि किसी मुसलमान उलमा ने कभी यह अक़ीदा साबित नहीं की : क़ुरआन कहता है कि पैग़ंबर एहले-किताब के यहाँ अपनी सिफ़ात, अपनी निशानियों और अपनी ख़ासियतों से "लिखा हुआ" पाया जाता है (क़ुरआन 7:157), जो सिर्फ़ नाम से ज़्यादा बयान करता है, क्योंकि एक नाम कई शख़्स रख सकते हैं। यह तफ़सील सब कुछ बदल देती है : इख़्तिलाफ़ किताबों और उनकी सिफ़ात से हल होता है, कभी आम मिटाव की थ्योरी से नहीं (इब्नुल क़य्यिम, हिदायत अल-हयारा, तीसरा सवाल)।

यहूदी-इस्लाम बहस : बग़ैर दुश्मनी और लोक-क़िस्सों के

इस मुद्दे पर कहीं से ज़्यादा तहरीरी इंज़िबात पूरी है : मियारों, किताबों और उस दौर के मरवा अमाल की बहस, कभी आज के शख़्सों या क़ौमों की नहीं।

यहाँ कोई मुनाज़िसाना लोक-क़िस्सा (गढ़े हुए तालमूदी इलज़ाम, साज़िशें) की जगह नहीं : क़ुरआन नुस्ख़े से हुज्जत करता है, तहक़ीर से नहीं, और "केवल ऐसे तरीक़े से वाद-विवाद करो, जो सबसे उत्तम हो" मुक़ालमे (क़ुरआन 29:46) और हर ग़ैर-मुहारिब के साथ इंसाफ़ (क़ुरआन 60:8) का हुक्म देता है। यहूदी धर्म : इस्लाम की नज़र में का पृष्ठ यहूदी दीन को पूरे तौर पर पेश करता है, और इस्लाम में तौरात का पृष्ठ उसकी इस्लामी हैसियत साफ़ करता है।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न मुहम्मद और यहूदी धर्म

क्या उस दौर के सारे यहूदों ने मुहम्मद (उन पर सलाम हो) को ठुकराया ?

नहीं। मदीना के यहूदों में से बज़ ने मुहम्मद (उन पर सलाम हो) को पहचाना और इस्लाम लाए, उनके सरपरस्त उलमा अब्दुल्लाह इब्ने सलाम थे, और क़ुरआन एहले-किताब में गिरोहों को अच्छाई में भी जुदा करता है (क़ुरआन 3:113)। इनकार अक़्सरियत का अक़ीदी मुक़ाम है, एक जैसी हक़ीक़त नहीं।

क्या इस्लाम सिखाता है कि यहूद मलऊन हैं ?

क़ुरआन उस दौर के गिरोहों को ठोस अमाल की वजह से ठोस इलज़ाम लगाता है, जैसे बज़ मुसलमानों को भी लगाता है, और कहीं-कहीं बनी इसराईल को लंबी इज़्ज़त देता है (क़ुरआन 2:40, 2:47)। क़ौम को उसके पूर्वजों पर हुक्म देना क़ुरआन ख़ुद के मुख़ालिफ़ है : "कोई किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा" (क़ुरआन 6:164)।

स्रोत: क़ुरआन 2:146 · क़ुरआन 7:157 · मैमोनीदेस का मिश्ने तोरा (मसीह के मियार) · अब्दुल्लाह इब्ने सलाम (सीरत) · इब्नुल क़य्यिम, हिदायत अल-हयारा (तीसरा सवाल)

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निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद