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क़ुरआन बयान करता है कि मुहम्मद तौरात में "लिखा हुआ" पाए जाते हैं (7:157)। वह आयतें जिन्हें मुसलमान वहाँ पढ़ते हैं : मूसा जैसा पैग़ंबर, इस्माईल की दुआ, व्यवस्थाविवरण 34:10, यशायाह 42 और केदार। नुस्ख़े और दोनों पढ़ाइयाँ, इमानदारी से।
क़ुरआन सिखाता है कि मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) पिछली किताबों में मन्सूब हैं : "जो लोग उस रसूल का अनुसरण करते हैं, जो उम्मी नबी है, जिसे वे अपने पास तौरात तथा इंजील में लिखा हुआ पाते हैं" (क़ुरआन 7:157)।
मुसलमान वहाँ इसराइलियों के "भाइयों" में से निकला और मूसा (अलैहिस्सलाम) जैसा पैग़ंबर (व्यवस्थाविवरण 18:15-18), इस्माईल की दुआ (उत्पत्ति 21:13-18), वह आख़िरी इबारत कि इसराईल में मूसा जैसा कोई पैग़ंबर फिर नहीं उठा (व्यवस्थाविवरण 34:10), और केदार में एलान-शुदा ख़ुशी (यशायाह 42:11) पढ़ते हैं। यहूद इन नुस्ख़ों को दूसरे तौर पर पढ़ते हैं : दोनों पढ़ाइयाँ यहाँ अपनी सरचश्मों के साथ पेश हैं।
विषय-सूची:
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 4 मिनट पढ़ने का समयमुसलमानों की बुनियाद इक ख़ुलूस-अ-क़रीन क़ुरआनी एलान है : "जो लोग उस रसूल का अनुसरण करते हैं, जो उम्मी नबी है, जिसे वे अपने पास तौरात तथा इंजील में लिखा हुआ पाते हैं" (क़ुरआन 7:157)।
क़ुरआन इज़ाफ़ा करता है कि बनी इसराईल के उलमा मुहम्मद (उन पर सलाम हो) को "वैसे ही जानते हैं, जैसे अपने बेटों को पहचानते हैं" पहचानते थे, बज़ ने जो जानते थे छुपाया (क़ुरआन 2:146)। मुसलमानों के लिए बची ख़ातिर यह कि तौरात कहाँ और कैसे पैग़ंबर की ख़ुशख़बरी देती है, और मावाद बहुत है : इसराईल से बाहर पैग़ंबरी का वादा, इस्माईल की दुआ, तीन इल्हाम सुनाने वाले पहाड़, और इस्माईल की औलाद में एलान-शुदा बंदा।
मूसा (अलैहिस्सलाम) वादा सुनाते हैं : "तेरा अल्लाह, ऐ याक़ूब के वाजिब-उल-हुक्म! तुझे तेरे भाइयों में से मेरे जैसा इक पैग़ंबर पैदा करेगा। उसकी ही तुम सुनो" (व्यवस्थाविवरण 18:15, पूरे मावद के लिए बाइबिल दु रब्बिनात), और आयत 18 साफ़ करती है : "मैं अपनी बातें उसके मुँह में डालूँगा और वह उन्हें वह सब कहेगा जो मैं उसे हुक्म दूँगा"। इस्लामी पढ़ाई तीन बातें नोट करती है : "तेरे भाई" इसराइलियों के क़राबती क़ौमों को कहते हैं, यानी इस्माइलियों को ;
"मूसा जैसा पैग़ंबर" उसी प्रोफ़ाइल का शरीयत-देहिंदा मानता है ; और सियाक़ (क़ौम ने अल्लाह से सीधी बात सुनने की गुज़ारिश की थी) ऐसे वसीते की ख़ुशख़बरी देता है जो शरीयत पहुँचाएगा।
और मुहम्मद इन सब नुक़्तों पर मूसा से मिलते हैं : बाप और माँ से पैदाइश, निकाह, ज़ालिम से फ़रार, नया क़ानून, सियासी सल्तनत, तबीअती मौत। इंजीलों के मुताबिक़ ईसा तक़रीबन हर नुक़्ते पर मूसा से मुख़्तलिफ़ हैं (मुज़ज़ब पैदाइश, कोई मदनी क़ानून नहीं, कोई बादशाह नहीं)। ग़ौर-तलब बात : यूहन्ना 1:19-21 में पादरी यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से पूछते हैं कि क्या वह "मसीह", "इलिय्याह" या "पैग़ंबर" है : तीन मुंतज़िर हस्तियाँ, जिनमें तीसरी मसीह से अलग है।
ईसाई पढ़ाई हस्तियों को इक करती है, इस्लामी पढ़ाई उसमें एलान-शुदा पिछले पैग़ंबर का इंतज़ार देखती है।
व्यवस्थाविवरण का आख़िरी बाब किताब को इस नज़र से बंद करता है : इसराईल में मूसा जैसा कोई पैग़ंबर फिर नहीं उठा (व्यवस्थाविवरण 34:10)।
मुसलमान के लिए यह आयत इक कुंजी है : अगर मुवादे पैग़ंबर को मूसा जैसा होना था मगर वह "इसराईल में" मुंतज़िर नहीं था, तो दरवाज़ा भाइयों की तरफ़, इस्माईल की औलाद की तरफ़, खुला रहता है। यही साबित-ए-मअरूज़ा इब्नुल क़य्यिम हिदायत अल-हयारा में तरतीब देते हैं, इस आयत को तीन पहाड़ों वाली आयत से जोड़कर (सीनै, सेइर, पारान की हुज्जत की तफ़सील बाइबिल में मुहम्मद के पृष्ठ में पढ़ी जा सकती है)।
तौरात इस्माईल (अलैहिस्सलाम) को इसहाक़ से अलग दुआ देती है : "मैं उसे बरकत दूँगा... उसे बहुत आबाद करूँगा और बहुत बढ़ाऊँगा ; वह बारह सरदार पैदा करेगा, और मैं उसे इक बड़ी क़ौम बनाऊँगा" (उत्पत्ति 21:13-18, ख़याल के मुताबिक़ बाइबिल दु रब्बिनात)। इस्माईल, अरबों के बाप-दादा, की नस्ल अपना इलाही वादा रखती है, और इस्लाम के मुताबिक़ यही से आख़िरी पैग़ंबर उतरे।
हुज्जत सादा है : अल्लाह की दुआ-शुदा "बड़ी क़ौम" बेपैग़ंबर क़ौम नहीं हो सकती, और इस्लामी पढ़ाई व्यवस्थाविवरण 18 का वादा उसी क़ौम पर रखती है।
यशायाह का बाब 42 अल्लाह के ऐसे बंदे की ख़ुशख़बरी देता है जो क़ौमों को नया क़ानून लाए : "जज़ीरे उसकी शरीयत का मंतज़िर करेंगे" (यशायाह 42:4), और नुस्ख़ा "वह शहर और गाँव जहाँ केदार रहता है" को ख़ुशी की दावत देता है (यशायाह 42:10-11)। हालाँकि केदार उत्पत्ति में इस्माईल की औलाद में नाम-बर-नाम है (उत्पत्ति 25:13) : यह अरबिस्तान का शमाल-मग़रिबी हिस्सा है।
इस्लामी पढ़ाई : नए क़ानून का बरदार बंदा, केदार के बाशिंदों के दरमियान मनाया जाने वाला, हिजाज़ से आने वाले पैग़ंबर से मिलता है ;
ईसाई पढ़ाई उसमें मसीह बंदा देखती है।
दोनों पढ़ाइयाँ यहाँ वैसी ही, अपने अपने नुस्ख़ों के साथ, पेश की गई हैं।
एक मशहूर-ए-ज़माना हुज्जत सुभाषित-संग्रह 5:16 को क़बूल करती है, जहाँ इबरानी "मख़मदीम" (बेहद मोहब्बत-देहिंदा) में मुहम्मद के नाम की जड़ नज़र आती है। इमानदारी तक़ाज़ा करती है : यह बहस-ख़ीज़ दलील-मंद हुज्जत है, इबरानी शक्ल तशद्द का जमा है जो आम तौर पर मोहब्बत-देहिंदा को बयान करता है, और तरजुमें उसे "बेहद मोहब्बत-देहिंदा" तर्जुमा करते हैं। यह बुनियादी हुज्जतों में नहीं : क़ुरआन ख़ुशख़बरी को कभी लुग़त पर नहीं टिकाता, बल्कि क़ुरआन 7:157 और 61:6 के सीधे एलान पर।
इस पृष्ठ ने नुस्ख़े वैसे ही पेश किए जैसे वे हैं, और दोनों पढ़ाइयाँ वैसी ही जैसी वे हैं : यहूदी बंद पैग़ंबरी और बहाली करने वाला मसीह पढ़ता है, ईसाई मसीह पढ़ता है, मुसलमान एलान-शुदा और तस्दीक़-शुदा मुहम्मद पढ़ता है (क़ुरआन 5:48)।
इख़्तिलाफ़ असली है, मावद-मंद है, और बग़ैर दुश्मनी और लोक-क़िस्सों के बहस का बाब है, जैसा क़ुरआन ख़ुद माँगता है : "केवल ऐसे तरीक़े से वाद-विवाद करो, जो सबसे उत्तम हो" एहले-किताब से बहस (क़ुरआन 29:46)। आगे के लिए : यहूदी धर्म : इस्लाम की नज़र में का पृष्ठ, इस्लाम में तौरात का पृष्ठ, और इंजील व पैराक्लीट के लिए बहन पृष्ठ बाइबिल में मुहम्मद।
नहीं, और इस्लाम यह नहीं सिखाता : इब्नुल क़य्यिम याद दिलाते हैं कि किसी उलमा ने कभी नहीं कहा कि नाम लिखा गया फिर हर जगह से मिटा दिया गया। क़ुरआन जो बयान करता है (7:157), वह यह कि पैग़ंबर वहाँ अपनी ख़ासियतों और निशानियों से मन्सूब है, जो एक नाम से ज़्यादा बारीक है।
उनके मियार दाऊद की औलाद से बादशाह मसीह का मंतज़िर रखते हैं जो इसराईल बहाल करे, और बाइबिली दौर में बंद पैग़ंबरी। मुसलमान क़ुरआन से जवाब देता है, जो ख़ुशख़बरी और गुज़री शनाख़्त बयान करता है (क़ुरआन 2:146)। हर रिवायत अपनी पढ़ाई से पढ़ती है, और मुक़ालमा मुमकिन रहता है (क़ुरआन 29:46)।