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इलाही मंबे की तस्दीक़, तब्दीलियों का बयान, क़ुरआन किताबों का हिफ़ाज़त करने वाला : इस्लाम में बाइबिल की तीन हैसियतें, आयतें हाथ में, और मुसलमान की इज़्ज़त।
इस्लाम का ईमान है कि तौरात और इंजील अल्लाह की तरफ़ से हैं : "हमने उनके पीछे उन्हीं के पद-चिन्हों पर मरयम के बेटे ईसा को भेजा, जो उससे पहले (उतरने वाली) तौरात की पुष्टि करने वाला था तथा हमने उसे इंजील प्रदान की, जिसमें मार्गदर्शन और प्रकाश थी" (क़ुरआन 5:46)। वह यह भी सिखाता है कि उस दौर के बज़ ख़ुशनवीसों ने नुस्ख़े तब्दील किए (क़ुरआन 2:79) और क़ुरआन आख़िरी पैग़ाम है, पिछलों का "उनकी संरक्षक" (क़ुरआन 5:48)। मुसलमान बाइबिल की इज़्ज़त करता है, उसके इलाही मंबे पर ईमान रखता है, मगर उसे क़ुरआन के मियार से पढ़ता है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयक़ुरआन पिछली किताबों का इलाही मंबे बयान करता है और उन सब पर ईमान फ़र्ज़ करता है : "रसूल उस चीज़ पर ईमान लाए, जो उनकी तरफ़ उनके पालनहार की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले भी" (क़ुरआन 2:285), जो तौरात, इंजील और पैग़ंबरों की किताबों की सूची बिना किसी फ़र्क़ के देता है।
ख़ास तौर पर इंजील के बारे में : "हमने उनके पीछे उन्हीं के पद-चिन्हों पर मरयम के बेटे ईसा को भेजा, जो उससे पहले (उतरने वाली) तौरात की पुष्टि करने वाला था तथा हमने उसे इंजील प्रदान की, जिसमें मार्गदर्शन और प्रकाश थी" (क़ुरआन 5:46)। मुसलमान की बाइबिल से कोई दुश्मनी नहीं : उसके ईमान में वह अल्लाह का इल्हाम है।
क़ुरआन इक बज़बत, मुअय्यन और महदूद इलज़ाम बयान करता है : "उन लोगों के लिए बड़ा विनाश है, जो अपने हाथों से पुस्तक लिखते हैं, फिर कहते हैं कि यह अल्लाह की ओर से है, ताकि उसके द्वारा थोड़ा मूल्य हासिल करें" (क़ुरआन 2:79), और उस दौर के एहले-किताब में से उन लोगों का ज़िक्र करता है जो "शब्दों को उनके (वास्तविक) स्थानों से फेर देते हैं" (क़ुरआन 4:46)।
फ़िक़्ह इससे इक बारीक मुक़ाम निकालता है : मंबा इलाही है, उसमें असली इबारतें मौजूद रहती हैं, मगर मुकम्ल हिफ़ाज़त, जो क़ुरआन के लिए ज़मानत-शुदा है (क़ुरआन 15:9), पिछली किताबों के लिए नहीं। इसी वजह से अल्लाह ने आख़िरी पैग़ाम भेजा : "हमने आपकी ओर यह पुस्तक (क़ुरआन) सत्य के साथ उतारी, जो अपने पूर्व की पुस्तकों की पुष्टि करने वाली तथा उनकी संरक्षक है" (क़ुरआन 5:48) : क़ुरआन सच्चे की तस्दीक़ करता है, मुख़्तलिफ़ पर फ़ैसला करता है।
कुछ भी मना नहीं, और यह काम का है : ईसाइयों से "केवल ऐसे तरीक़े से वाद-विवाद करो, जो सबसे उत्तम हो" मुक़ालमे के लिए (क़ुरआन 29:46), मुश्तरका पैग़ंबरों को ढूँढने के लिए, हमारे हमसाये को समझने के लिए। मुसलमानों की तरीक़ा इक जुमले में है : क़ुरआन मियार है।
जो उससे हमख़याल हो (अहकाम का तौहीद, पैग़ंबरों की इज़्ज़त, अख़लाक़ी क़ानून) वह तस्दीक़-शुदा है ;
जो उसके मुख़ालिफ़ हो (इक इंसान की इलाहीयत, सूली) वह तब्दीली या तअबीर की तरफ़ रद्द, बिना उन लोगों की हीनता के जो दूसरे तौर पर पढ़ते हैं।
यह मुक़ाम, नुस्ख़ों पर पक्का और लोगों पर मुअत्तरिफ़, इसी पूरे दस्तावेज़ का तरीक़ा है।
इस्लाम के मुताबिक़ इंजील वह इल्हाम है जो ईसा (अलैहिस्सलाम) ख़ुद को दी गई (क़ुरआन 5:46), जो उनके शागिर्दों की दशकों बाद लिखी गई रिवायतों के बराबर नहीं। मुसलमान उनमें इल्हाम के निशान पढ़ता है, बिना उसे मुकम्ल महफ़ूज़ समझे।
हाँ, और क़ुरआन मुश्तरका इल्हामों की बुनियाद पर एहले-किताब से मुक़ालमे की दावत भी देता है (क़ुरआन 29:46)। पढ़ाई क़ुरआन को मियार रखकर होती है : जो हमख़याल हो वह तस्दीक़-शुदा, जो मुख़ालिफ़ हो वह नुस्ख़ों की मुमकिना तब्दीली की तरफ़ रद्द।