होम > धर्म और मान्यताएँ > ईसाई धर्म : इस्लाम की नज़र में
ईसाई अपने अपने नुस्ख़ों के मुताबिक़ क्या ईमान रखते हैं, क़ुरआन ईसा और मरियम के बारे में क्या बयान करता है, असली इत्तेफ़ाक़ के नुक़्ते और बुनियादी इख़्तिलाफ़ : मसीह की इलाहीयत।
ईसाई धर्म तीन व्यक्तियों में एक अल्लाह (त्रित्व) पर ईमान रखता है, ईसा को ख़लासे के लिए मरने वाला सच्चा अल्लाह और सच्चा इंसान मानता है और बाइबिल को इल्हामी कलाम समझता है। इस्लाम ईसा (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह के सबसे बड़े पैग़ंबरों में से इक समझता है : मरियम से मुज़ज़ब तौर पर पैदा हुए, अल्लाह के रसूल, उसकी तरफ़ उठा लिए गए (क़ुरआन 4:171), मगर न अल्लाह और न अल्लाह की औलाद।
सबसे बड़ा इत्तेफ़ाक़ ईसा और मरियम की इज़्ज़त है ;
और बुनियादी इख़्तिलाफ़ उनकी इलाहीयत है (क़ुरआन 5:72-75)।
विषय-सूची:
18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 4 मिनट पढ़ने का समयईसाई धर्म इबराहीमी एकेश्वरवादी धर्म है, जो नासरत के ईसा, यानी मसीह की शख़्सियत पर क़ायम है। नीकिया-कॉन्स्टेंटिनोपल की क़बूल-शुदा इमानीयत, जो बड़े चर्चों की मुश्तरका इमानीयत है, के मुताबिक़ ईसाई "इक अकेले अल्लाह में, जो हर चीज़ के मालिक हैं" और "इक अकेले मौला मसीह में, अल्लाह की इकलौती औलाद, जो सब दौरों से पहले बाप से पैदा हुआ, अल्लाह की ओर से अल्लाह, नूर की ओर से नूर" ईमान रखते हैं। त्रित्व की अक़ीदा इक अल्लाह को तीन व्यक्तियों में मुतअर्रिफ़ करती है : बाप, इब्न और रूहुल-क़ुद्स।
कैथोलिक चर्च का कैटेकिज़्म साफ़ करता है : "हम तीन माबूदों को नहीं, बल्कि तीन व्यक्तियों में इक अल्लाह को मुतअर्रिफ़ होते हैं" (सीईसी, जुज़ 253)।
ईसा के बारे में कल्केदोनिया की मजलिस (451 ईसवी) ने मुतअय्यन किया कि वह इक ही शख़्स में "सच्चा अल्लाह और सच्चा इंसान" है (सीईसी, जुज़ 464) : मरियम पवित्रा से पैदा हुआ, लोगों की ख़लासे के लिए सलीब पर मरा, तीसरे दिन जी उठा, और ज़िंदों और मुर्दों पर फ़ैसला करने को दोबारा आएगा।
ईसाई बाइबिल (पुराना और नया अहदनामा) को अल्लाह का इल्हामी कलाम समझते हैं और अनुग्रह व मसीह की मौत से होने वाली फ़िदा से ख़लासे पर ईमान रखते हैं (1 कुरिन्थियों 15:3)। बड़े फ़िरक़े (कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स, प्रोटेस्टेंट) पोप की सल्तनत, सकरामेंट या किताब और रिवायत के ताल्लुक़ पर इख़्तिलाफ़ करते हैं, मगर यही बुनियादी मज़मून सब के साथ मुश्तरका है।
क़ुरआन ईसा (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह के सबसे बड़े रसूलों में से इक पेश करता है। मरियम पवित्रा से मुज़ज़ब तौर पर पैदा हुए (क़ुरआन 3:45-47), गहवाड़े से ही बोले : "निःसंदेह मैं अल्लाह का बंदा हूँ" (क़ुरआन 19:30)। बनी इसराईल की तरफ़ इंजील के साथ भेजे गए, अल्लाह की इजाज़त से जन्म-जात अंधे और कोढ़ी को शिफ़ा दी, मुर्दों को जिलाया (क़ुरआन 3:49, 5:46)।
क़ुरआन उन्हें "मसीह" (अल-मसीह) और "उनका शब्द जो उसने मरियम की तरफ़ भेजा" कहता है, मगर उनकी इलाहीयत को साफ़ नफ़्ज़ात करता है : "मरयम का बेटा मसीह एक रसूल के सिवा कुछ नहीं। निश्चय उससे पहले बहुत-से रसूल गुज़र चुके" (क़ुरआन 5:75)। क़ुरआन बयान करता है कि उन्हें न क़त्ल किया गया और न सूली पर चढ़ाया गया, बल्कि अल्लाह ने उन्हें अपनी तरफ़ उठा लिया (क़ुरआन 4:157-158), और हदीसें आख़िरी ज़माने में उनकी आमद की ख़ुशख़बरी देती हैं (बुख़ारी और मुस्लिम से मरवा)।
और सब कुछ जुदा भी करता है : ईसाई धर्म के मुताबिक़ ईसा जिस्म में आया हुआ अल्लाह है, गुनाहों की फ़िदा के लिए मरा ; इस्लाम के मुताबिक़ वह अल्लाह का बंदा और रसूल है, और कोई पैग़ंबर दूसरे का बोझ नहीं उठाता (क़ुरआन 6:164)। क़ुरआन एहले-किताब से कहता है : "यह न कहो कि (पूज्य) तीन हैं। बाज़ आ जाओ! तुम्हारे लिए बेहतर होगा। अल्लाह केवल एक ही पूज्य है" (क़ुरआन 4:171), और मसीह को माबूद बनाने को ईमान के मुख़ालिफ़ समझता है (क़ुरआन 5:72), साथ ही साफ़ करता है कि ईसा ख़ुद ने कहा : "निःसंदेह अल्लाह ही मेरा पालनहार और तुम्हारा पालनहार है। अतः उसी की इबादत करो। यही सीधा मार्ग है।" (क़ुरआन 3:51)।
इनकार अक़ीदे का है, कभी शख़्सों का नहीं।
इस दस्तावेज़ के पृष्ठ हर इख़्तिलाफ़ की तफ़सील, दोनों रिवायतों के नुस्ख़ों के साथ, बयान करते हैं।
मुसलमानों की सरचश्मों के मुताबिक़ ईसा का मुकम्ल क़िस्सा इस्लाम में ईसा के पृष्ठ में पढ़ा जा सकता है, इस्लाम और ईसाई धर्म के बीच अंतर इख़्तिलाफ़ों को इक जड़वल में समेटता है, और ईसा या मुहम्मद ? का पृष्ठ बयान करता है कि वे इक-दूसरे के मुख़ालिफ़ क्यों नहीं। अगर आपका रास्ता ईमान के सवाल की तरफ़ जाता है, तो मुसलमान कैसे बनें का सिलसिला क़दम-ब-क़दम राह दिखाता है।
हाँ। ईसा (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह का बंदा और रसूल मानना ईमान-ए-मुसलमानी का हिस्सा है (बुख़ारी 3435)। वह मरियम पवित्रा से पैदा हुए, मुअज़िज़े दिखाए, मसीह हैं और आख़िरी ज़माने में दोबारा आएँगे। इस्लाम जिस चीज़ को ठुकराता है वह उनकी इलाहीयत बनाना है, उनकी शख़्सियत नहीं।
नहीं। क़ुरआन ईसाइयों को एहले-किताब में "मोहब्बत में ईमान वालों के सबसे क़रीब" बयान करता है, उनकी आज़िज़ी और उनके पादरियों व राहिबों की वजह से (क़ुरआन 5:82)। इख़्तिलाफ़ अक़ाईद पर है, शख़्सों पर नहीं।
क़ुरआन एहले-किताब से कहता है : "हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य एक ही है" (क़ुरआन 29:46) : ख़ालिक़ एक ही है। जो इख़्तिलाफ़ है वह उसकी ज़ात के बारे में अक़ीदे का है : इस्लाम के लिए बज़बत वहदानीयत, ईसाई धर्म के लिए त्रित्व।