क्या ईसा दोबारा आएँगे ?

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मसीह की दोबारा आमद उन गिनती-चंद मुद्दों में से है जहाँ ईसाई और मुसलमान इक साथ ईमान रखते हैं : एक तरफ़ पैरूसिया, दूसरी तरफ़ ईसा का उतरना। इत्तेफ़ाक़, अलग-अलग किरदार, एक जैसे अंजाम।

हाँ, दोनों धर्मों के मुताबिक़ : नया अहदनामा मसीह की आमद की ख़ुशख़बरी देता है ("यही ईसा... उसी तरीक़े से आएगा", प्रेरितों के काम 1:11), और इस्लाम सिखाता है कि ईसा आख़िरी ज़माने में उतरेंगे जहाँ इंसाफ़ क़ायम करेंगे (बुख़ारी और मुस्लिम से मरवा)। क़ुरआन उन्हें "वह (ईसा) निश्चय क़ियामत की एक निशानी है" (क़ुरआन 43:61) कहता है। किरदार मुख़्तलिफ़ हैं : ईसाई धर्म के लिए हाकिम और ख़लासे-देहिंदा, इस्लाम के लिए अल्लाह का बंदा जो मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) की शरीयत के मुताबिक़ चलेगा।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

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ईसा की दोबारा आमद : ईसाइयों और मुसलमानों का इत्तेफ़ाक़

गिनती-चंद ईसाई मुद्दों पर मुसलमान इतना इत्तेफ़ाक़ कहीं नहीं रखते : ईसा (अलैहिस्सलाम) दोबारा आएँगे। इंजीलें उनकी आमद के वादे पर ख़त्म होती हैं, और फ़रिश्ते इसकी गवाही देते हैं : "यही ईसा, जो आसमान उठा लिए गए, उसी तरीक़े से आएगा" (प्रेरितों के काम 1:11)। क़ुरआन और सुन्नत उसी आमद सिखाते हैं : ईसा, ज़िंदा उठा लिए गए (क़ुरआन 4:158), आख़िरी ज़माने में "दमश्क के मशरिक़ में सफ़ेद मीनार" पर उतरेंगे, दज्जाल (झूठे मसीह) को क़त्ल करेंगे, इंसाफ़ क़ायम करेंगे और इक आम ज़िंदगी गुज़ारकर मरेंगे (बुख़ारी और मुस्लिम से मरवा)।

क़ुरआन उन्हें साफ़ शब्दों में "वह (ईसा) निश्चय क़ियामत की एक निशानी है" (क़ुरआन 43:61) कहता है।

इक ईसाई और इक मुसलमान तो उसी वाक़िये का मंतज़िर हैं : तारीख़ में ईसा की दूसरी आमद।

किरदार जुदा : हाकिम-इलाह या बंदा-मसीह

इत्तेफ़ाक़ किरदार पर ख़त्म होता है। ईसाई अक़ीदे में आमद पैरूसिया है : मसीह बुज़ुर्ग हाकिम बनकर आते हैं ताकि अल्लाह की आख़िरी हुकूमत क़ायम करें, क्योंकि वह जिस्म में आया अल्लाह हैं। इस्लाम में ईसा अल्लाह के बंदे और रसूल बनकर उतरते हैं : वह सलीब तोड़ते हैं (उस फ़िदे की निशानी जिसे इस्लाम ठुकराता है), आख़िरी पैग़ंबर की शरीयत के मुताबिक़ चलते हैं, अपने इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ते हैं, और इंसानियत पर हुक्म सिर्फ़ अल्लाह चलाएगा।

इसके बल्कि : हिसाब के दिन अल्लाह उनसे सवाल करेगा, और ईसा गवाही देंगे कि उन्होंने कभी अपनी इबादत का हुक्म नहीं दिया (क़ुरआन 5:116-117)।

आमद मुश्तरका है ; आमद की थ्योलॉजी इस पूरे दस्तावेज़ का इख़्तिलाफ़ है, इक वाक़िये में समेटी हुई।

ईसा की दोबारा आमद : यह हर किसी के लिए क्या बदलती है

ईसाई के लिए मसीह का मंतज़िर ज़िंदगी को होशियारी और ख़लासे की उम्मीद की तरफ़ ले जाता है। मुसलमान के लिए ईसा का मंतज़िर आख़िरी ज़माने की निशानियों में से है, दज्जाल, याजूज माजूज और हदीसों में गिनी गई बड़ी निशानियों के साथ : इक साफ़ एस्कैटोलॉजी जिसमें ईसा इक ख़त्म होती दुनिया के आख़िरी सच्चे हीरो हैं, अगली दुनिया के हाकिम नहीं। दोनों मामलों में उम्मीद का अमली असर एक जैसा है : अभी सीधा जियो, क्योंकि वक़्त कम है।

अगर आमद का सवाल आपको ईमान के सवाल तक ले जाए, तो मुसलमान कैसे बनें का सिलसिला अमली सवालों का जवाब देता है, और इस्लाम में ईसा का पृष्ठ इस्लाम में उनकी जगह, गहवाड़े से आमद तक, समेटता है।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न ईसा की दोबारा आमद

ईसा (अलैहिस्सलाम) कब उतरेंगे ?

क़ुरआन सिर्फ़ यह कहता है कि वह "वह (ईसा) निश्चय क़ियामत की एक निशानी है" (क़ुरआन 43:61) : उनकी तारीख़ कोई नहीं जानता, जैसे आख़िरी घड़ी कोई नहीं जानता। हदीसें उन्हें हिसाब के दिन से पहले, आख़िरी ज़माने की बड़ी निशानियों के बाद रखती हैं।

क्या ईसा (अलैहिस्सलाम) अपनी आमद पर इंसानियत पर हुक्म चलाएँगे ?

इस्लाम में नहीं : वह अल्लाह के बंदे बनकर उतरेंगे, सलीब को उसकी निशानी के तौर पर तोड़ेंगे, दज्जाल को क़त्ल करेंगे और मुहम्मद (उन पर सलाम हो) की शरीयत के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारेंगे। आख़िरी हिसाब सिर्फ़ अल्लाह का हक़ है, और ईसा (अलैहिस्सलाम) ख़ुद उसके सामने यही बयान करेंगे (क़ुरआन 5:116-117)।

स्रोत: प्रेरितों के काम 1:11 (ईसाई मुक़ाम) · क़ुरआन 43:61 · बुख़ारी और मुस्लिम से मरवा (ईसा का उतरना)

के बारे में अन्य प्रश्न ईसा की दोबारा आमद

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निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद