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"अल्लाह को किसने बनाया ?" का सवाल ख़ुद-अपने-आप-का-ख़िलाफ़ क्यों है : बेइंतहा सिलसिला नामुमकिन है, बेसबब ज़ात-ए-आबदी (क़ुरआन 57:3), और इतराज़ के पीछे छुपा असली सवाल।
"अल्लाह को किसने बनाया ?" का सवाल यह मफ़रूज़ा करता है कि सब की वजह ज़रूरी है। मगर मुमतने की हुज्जत ने कभी यह नहीं कहा : वह कहती है कि जो चीज़ शुरू होती है उसकी वजह होती है। अल्लाह, मअर्रफ़ के मुताबिक़, शुरू नहीं हुए : "वही सबसे पहले है और सबसे आख़िर है" (क़ुरआन 57:3)।
ज़ात-ए-आबदी के ख़ालिक़ को पूछना वैसा है जैसा जिसकी तख़लीक़ ज़रूरी नहीं उसके ख़ालिक़ को पूछना : सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ाली होता है, और नास्तिक बदल (बिना वजह इब्तिदा या बेइंतहा सिलसिला) उस अक़्ल के मुख़ालिफ़ है जिसे वह तक़ाज़ा करता है।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समय"अगर सब की वजह है तो अल्लाह को किसने बनाया ?" इतराज़ नाक़ाबिल-ए-इतराज़ लगता है, और वही नास्तिक इतराज़ों में सबसे मशहूर है। वह इक फ़रेब-आमीज़ नस्ब-अल-असामी पर टिका है : वह मुमतने की ज़बान वह मुतअय्यन देता है जो उसकी नहीं। मुमतना नहीं कहता "सब की वजह है"।
वह कहता है "जो चीज़ शुरू होती है उसकी वजह होती है"। फ़र्क़ पूरी बहस है : ज़ात-ए-आबदी, बेइब्तिदा, वजहों की ज़ंजीर में दाख़िल नहीं होती, क्योंकि उससे पहले समझाने की कोई चीज़ नहीं।
सवाल को संजीदा लो और आगे बढ़ाओ : अगर अल्लाह को ख़ालिक़ चाहिए तो उसके ख़ालिक़ को भी चाहिए, और यूँ बेइंतहा। और बेइंतहा सिलसिला, पहली कड़ी के बग़ैर, कभी कुछ पूरा नहीं करता : बिना पहले डोमिनो के बेइंतहा डोमिनो कोई डोमिनो नहीं गिराता। इसलिए वह हस्ती चाहिए जिसका वजूद मसाला नहीं, अता किया गया है : बेइब्तिदा, बेसबब, "वही सबसे पहले है और सबसे आख़िर है" (क़ुरआन 57:3), वह जिसने "न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।" (क़ुरआन 112:3)।
"ज़ात-ए-आबदी के ख़ालिक़ को पूछना" वैसा है जैसा "जिसकी तख़लीक़ ज़रूरी नहीं उसके ख़ालिक़ को पूछना" : सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ाली हो जाता है।
और नास्तिक बदल ज़्यादा आराम-देह नहीं : बिना वजह नेहायत से निकली कायनात, या पहले से तय बेइंतहा सिलसिला, वह मुमतनअ हैं जिन्हें अक़्ल कहीं और क़बूल नहीं करती। अल्लाह का वजूद : इस्लाम की दलीलें का पृष्ठ इब्तिदा की हुज्जत तफ़सील से देता है।
अक्सर इतराज़ इक गहरे और शख़्सी सवाल को छुपाता है : "यह सब किसने बनाया, और मैं क्यों ?" यह बज़बत वही सवाल है जो क़ुरआन पूछता है : "या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए हैं, या वे (स्वयं) पैदा करने वाले हैं? या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया है? बल्कि वे विश्वास ही नहीं करते।" (क़ुरआन 52:35-36)। सवाल फ़लसफ़ी पहेली नहीं : वह आपसे मुताल्लिक़ है, आपके मंबे, आपकी मंज़िल, आपकी ज़िम्मेदारी से।
अल्लाह अपना जवाब नहीं छुपाता : इक पैग़ाम, इक ख़ालिक़, इक रास्ता।
आख़िरी तफ़सील, फ़ैसलकुन : जो पूछता है "अल्लाह को किसने बनाया ?" वह यह मफ़रूज़ा करता है कि कुछ भी बग़ैर बाहरी वजह के मौजूद नहीं हो सकता, यानी कायनात भी नहीं। अच्छा पकड़ा : यही मुसलमानों का मुक़ाम है।
कायनात, जो शुरू हुई, की वजह है ;
ज़ात-ए-आबदी, जो शुरू नहीं हुई, उसकी वजह है।
इतराज़, इमानदारी से आगे ले जाया जाए, जवाब ही की तरफ़ लौटता है। अगर यह आपको मुतअस्सिर करे तो दरवाज़ा खुला है : मुसलमान कैसे बनें का सिलसिला आगे के सारे अमली सवालों का जवाब देता है।
यह इख़्तियास नहीं, ज़ात-ए-आबदी की मअर्रफ़ है : सिर्फ़ वह चीज़ वजह माँगती है जो शुरू होती है। ज़ात-ए-आबदी, बेइब्तिदा, वजहों की ज़ंजीर में दाख़िल नहीं होती। पहली वजह पहली होनी चाहिए, वरना कुछ भी कभी मौजूद न होता : पहले से पूरी हो चुकी वजहों की बेइंतहा क़तार मंतक़ी मुमतनअ है।
नहीं : सवाल इक जुमले में हल होता है (ज़ात-ए-आबदी को ख़ालिक़ नहीं चाहिए, क़ुरआन 57:3), और अक्सर उसके पीछे इक असली सवाल छुपा होता है, ज़्यादा शख़्सी : जिसने मुझे बनाया वह कौन है, और क्यों ? वही सवाल क़ुरआन सीधे पूछता है (क़ुरआन 52:35)।