होम > धर्म और मान्यताएँ > नास्तिकता : इस्लाम की नज़र में > अल्लाह दुख-तकलीफ़ की क्यों इजाज़त देता है ?
अल्लाह के वजूद के ख़िलाफ़ सबसे संजीदा इतराज़, क़ुरआन से जवाब : ज़िंदगी इम्तिहान के तौर पर, हर अच्छाई की क़ीमत के तौर पर इरादे की आज़ादी, और आख़िरी इंसाफ़ जो कोई सिलवट नहीं छोड़ता।
क़ुरआन तीन नुक़्तों में जवाब देता है : ज़िंदगी अमाल को जुदा करने के लिए इक आज़माइश है ("जिसने मृत्यु तथा जीवन को पैदा किया, ताकि तुम्हारा परीक्षण करे कि तुम में किसका कर्म अधिक अच्छा है?", क़ुरआन 67:2) ; इंसान की की गई बुराई इरादे की आज़ादी से निकलती है, जिसके बग़ैर कोई अच्छाई मौजूद नहीं ; और हर ज़ुल्म हिसाब के दिन अदा होगा, बिना इस्तिसना के (अल्लाह फरमाता है "तुम अल्लाह को उससे हरगिज़ असावधान न समझो, जो अत्याचारी लोग कर रहे हैं! वह तो उन्हें उस दिन के लिए विलंबित कर रहा है, जिस दिन आँखें खुली रह जाएँगी", क़ुरआन 14:42)। वह तकलीफ़ जिसे हम नहीं समझते उस पूरी हिकमत में है जिसे हमारी जुज़वी नज़र नहीं घेरती।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 3 मिनट पढ़ने का समयक़ुरआन शुरू से ढाँचा रखता है : "जिसने मृत्यु तथा जीवन को पैदा किया, ताकि तुम्हारा परीक्षण करे कि तुम में किसका कर्म अधिक अच्छा है?" (क़ुरआन 67:2)। बिना मुश्किल की आज़माइश कुछ आज़माती नहीं : बिना दर्द, बिना जुदाई, बिना महँगे फ़ैसलों की दुनिया सजावट होगी, ज़िंदगी नहीं। तकलीफ़ इसी वजह से मौजूद है कि सब्र की क़ीमत है, बहादुरी के मअनी हैं, और नातक़वत पर रहम इक अमल है, रिफ़्लेक्स नहीं।
क़ुरआन आज़माइश को ईमानदार रास्ते की शरीयत भी ठहराता है : "निश्चय हम तुम्हें भय और भूख तथा धनों, प्राणों और फलों की कमी में से किसी न किसी चीज़ के साथ अवश्य आज़माएँगे। और (ऐ नबी!) सब्र करने वालों को शुभ समाचार सुना दें" (क़ुरआन 2:155)।
तकलीफ़ का सबसे सख़्त हिस्सा वह है जो लोग इक-दूसरे को पहुँचाते हैं। क़ुरआन उसे इरादे की आज़ादी से जोड़ता है : इंसान को इंतिख़ाब मिला, और उसके साथ ज़िम्मेदारी। ऐसी दुनिया जहाँ अल्लाह हर क़ातिल हाथ को तरतीबी तौर पर रोक लेता, कठपुतलियों की दुनिया होगी, बिना असली मोहब्बत, बिना असली बहादुरी, बिना असली सख़ावत : उसके उलट की मुमकिनत के बग़ैर कोई अच्छाई मौजूद नहीं।
और मज़लूम के मुताल्लिक़ क़ुरआन बेहद साफ़ है : "तुम अल्लाह को उससे हरगिज़ असावधान न समझो, जो अत्याचारी लोग कर रहे हैं! वह तो उन्हें उस दिन के लिए विलंबित कर रहा है, जिस दिन आँखें खुली रह जाएँगी" (क़ुरआन 14:42) : दुनिया की अदालतें रास्ता दें, बेसज़ा होना मौजूद नहीं।
जो चीज़ बुराई को असहनीय बनाती है वह यह ख़याल है कि वह बेसज़ा रहेगी और मज़लूम भूला दिया जाएगा। इस्लामी जवाब हिसाब का दिन है : हर ज़ुल्म अदा, हर आँसू गिना हुआ, हर ज़ुल्म की गवाही। कुछ बेतरतीब नहीं छोड़ा गया : न ख़ामोश जुर्म, न गवाह-ब-गवाह दर्द।
यह ख़ुलूस की दलील नहीं : यह ईमान का वह आँकड़ा है जो मौजूदा सलूक बदलता है, क्योंकि हर की गई बुराई मुअल्लक़ क़र्ज़ है।
जो इस इंसाफ़ पर ईमान रखता है वह तारीख़ से मायूस नहीं होता, और ख़ुद कानून का हाथ नहीं बनता : वह अमल करता है, मदद करता है, बाक़ी अल्लाह के हवाले करता है।
बुराई का इतराज़ इख़्लाक़ी इतराज़ है : वह मफ़रूज़ा करती है कि तकलीफ़ इक स्कैंडल है, यानी ऐसी अच्छाई मौजूद है जिसका हक़दार हम हैं। मगर मर्रे से निकली दुनिया में यह "हक़" कहाँ से आता है ? अगर सब मर्रा है तो तकलीफ़ सिर्फ़ आँकड़ा है, न इंसाफ़ वाली न नाइंसाफ़, और स्कैंडल का लफ़्ज़ ख़ुद मिट जाता है।
अल्लाह के ख़िलाफ़ सबसे मज़बूत इतराज़ इसलिए दुनिया की ख़ारिजी इख़्लाक़ीयत को मफ़रूज़ा करता है, जो सिर्फ़ तब टिकती है जब दुनिया का इक शरीयत-देहिंदा हो : बुराई की हुज्जत, आख़िर तक ले जाने पर, ईमान को उलटने की बजाए मज़बूत करती है।
नास्तिकता : इस्लाम की नज़र में का पृष्ठ नास्तिक हुज्जतों और उनके जवाबों का पूरा ज़ख़ीरा दोहराता है।
यह इस्लामी इल्म-उल-कलाम का सबसे दर्दनाक और सबसे मुअत्तरिफ़ मामला है : मासूम बच्चा किसी गुनाह का बदला नहीं भुगतता, उसका इनाम और उसका इंसाफ़ पूरी तरह आख़िरत से है, और लोगों पर उसकी मदद फ़र्ज़ है। इस्लाम यह ईमान मना करता है कि मज़लूम अपनी तकलीफ़ का हक़दार है।
हाँ : याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने कहा "मैं तो अपने दुःख तथा शोक की शिकायत केवल अल्लाह से करता हूँ" (क़ुरआन 12:86) : आज़माइश अल्लाह के सामने, सब्र और दुआओं के साथ बयान होती है, कभी उस बेसाबरी में नहीं जो उसकी हिकमत को नफ़्ज़ात करती है। पैग़ंबर अय्यूब (अलैहिस्सलाम) उस फ़रियाद का नमूना हैं जो ईमान के अंदर रहती है।