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क्या आदम ने अपना गुनाह पूरी इंसानियत को विरासत में दिया ? अपनी सरचश्मों के मुताबिक़ ईसाई अक़ीदा, इस्लामी जवाब (क़बूल-शुदा तौबा, पाक फ़ितरत, हर कोई अपना बोझ), और यह कि हर रास्ता क्या बदलता है।
इस्लाम के मुताबिक़ नहीं : आदम ने तौबा की और अल्लाह ने क़बूल की (क़ुरआन 2:37), कोई ज़ात दूसरे का बोझ नहीं उठाती (क़ुरआन 6:164), और हर बच्चा पाक फ़ितरत पर पैदा होता है (बुख़ारी 1358)। ईसाई धर्म सिखाता है कि आदम का गुनाह उसकी पूरी औलाद में विरासत में आया, जिसे बपतिस्मा के ज़रिए, फ़िदा के ढाँचे में, धोया जाता है (रोमियो 5:12 ; कैथोलिक चर्च का कैटेकिज़्म)।
यह इख़्तिलाफ़ सब कुछ बदलता है : इंसान पाक और ज़िम्मेदार पैदा होता है, या मुजरिम और फ़िदा-तलब।
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18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया
📖 2 मिनट पढ़ने का समयईसाई धर्म सिखाता है कि आदम की नाफ़रमानी ने पूरी दुनिया में गुनाह और मौत ले आई : "इक अकेले इंसान के ज़रिए गुनाह दुनिया में आया, और गुनाह के ज़रिए मौत" (रोमियो 5:12)।
कैथोलिक चर्च का कैटेकिज़्म साफ़ करता है कि यह मूल पाप पूरी इंसानियत में इक़्तिबास से नहीं, इज़्दवाज (प्रसार) से विरासत में आता है : हर इंसान असली पाकीज़गी से महरूम पैदा होता है, और बपतिस्मा यह गुनाह मसीह के साथ जोड़कर मिटाता है। यह अक़ीदा पूरी ईसाई इमारत का गर्दन है : अगर इंसानियत मुजरिम पैदा होती है तो फ़िदा ज़रूरी है, और सलीब लाज़िम बन जाता है।
क़ुरआन वही गिरना सुनाता है, मगर वहाँ रुकता दूसरी जगह है : आदम और उनकी हमसर ने अपना गुनाह क़बूल किया और दुआ की : "ऐ हमारे पालनहार! हमने अपने आपपर अत्याचार किया है। और यदि तूने हमें क्षमा न किया तथा हमपर दया न की, तो निश्चय हम अवश्य घाटा उठाने वालों में से हो जाएँगे" (क़ुरआन 7:23), और अल्लाह ने "उसने उसकी तौबा क़बूल कर ली" (क़ुरआन 2:37)। कोई विरासती हुक्म नहीं : आदम का गुनाह आदम को माफ़ हुआ, और उनके बच्चों के लिए उससे कुछ पैदा नहीं हुआ।
तीन इस्लामी बुनियादें इसके बाद आती हैं : कोई ज़ात दूसरे का बोझ नहीं उठाती (क़ुरआन 6:164)।
हर बच्चा फ़ितरत, यानी पाक तबीअत, पर पैदा होता है, और "उसके वालिदैन उसे यहूदी, ईसाई या मजूसी बनाते हैं" (बुख़ारी 1358) ;
और इंसान नाज़ुक रहता है, भुलाने की तरफ़ झुका हुआ (क़ुरआन 20:115), बग़ैर पैदाइशी मुजरिमी के।
पहले अल्लाह पर : इक ख़ालिक़ जो अरबों इंसानों को उनकी पैदाइश से पहले के गुनाह पर सज़ा दे, वह ज़ालिम होगा, और क़ुरआन इसे नफ़्ज़ात करता है : "आपका पालनहार बंदों पर तनिक भी अत्याचार करने वाला नहीं है" (क़ुरआन 41:46)।
फिर इंसान पर : पाक पैदा होना हर ज़िंदगी को शख़्सी ज़िम्मेदारी और बेदाग़ इज़्ज़त देता है, बिना फ़िदा के बोझ के। और ख़लासे पर, आख़िर में : अगर मुश्तरका तौर पर कोई फ़िदा नहीं देनी, तो सलीब की ज़रूरत नहीं, और मग़फ़िरत वही बन जाती है जो क़ुरआन में है : बंदे और उसके मौला के दरमियान खुला दरवाज़ा, "तुम अल्लाह की दया से निराश न हो। निःसंदेह अल्लाह सब पापों को क्षमा कर देता है" (क़ुरआन 39:53)।
यह दोनों इंसानी इंजीलों के दरमियान पूरा फ़र्क़ है : एक पुराने क़र्ज़ का क़र्ज़दार पैदा होता है, दूसरा आज़ाद पैदा होता है, अपने मौला के सामने जो उसका मंतज़िर है। इस्लाम और ईसाई धर्म के बीच अंतर का पृष्ठ इस नुक़्ते को पूरी मुवाज़नत में वापस रखता है।
उलमा सिखाते हैं कि वे अल्लाह की रहमत में हैं और जन्नतियों में से हैं : उन पर कोई शख़्सी गुनाह नहीं लिखा जाता, क्योंकि इस्लाम में कोई विरासती गुनाह मौजूद नहीं।
क्योंकि धोने की कोई चीज़ नहीं : बच्चा पाक (फ़ितरत) पैदा होता है, बिना विरासती मुजरिमी के। इस्लाम की पैदाइशी रसमें (अज़ान सुनाना, 'अक़ीक़ा) शुक्र के अमल हैं, किसी गुनाह की पाकीज़गी नहीं।
वह कहता है कि इंसान पाक पैदा होता है, भुलाने की रज्जाहत के साथ : आदम को एक हुक्म मिला जिसे वह "वह भूल गया और हमने उसमें कोई दृढ़ संकल्प नहीं पाया" (क़ुरआन 20:115)। शख़्सी गुनाह मुमकिन रहता है, मगर वह सिर्फ़ शख़्सी है : हर कोई अपने गुनाह का जवाबदेह है।