शहादा

होम > मुसलमान कैसे बनें > शहादा

ईमान की गवाही की अरबी इबारत, उसका उच्चारण, हिन्दी में लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ मअनी, और इस्लाम में आने के लिए इख़लास के साथ उसे पढ़ने का तरीक़ा।

शहादा ऐसे पढ़ी जाती है : "Ash-hadou an la ilaha illa-Llah, wa ash-hadou anna Mouhammadan rassoulou-Llah" : मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (उन पर अल्लाह की रहमत और सलामत हो) अल्लाह के रसूल हैं। इसे इक बार, इख़लास और यक़ीन के साथ पढ़ा जाता है। अरबी में पढ़ना मंसून है, मगर शर्त नहीं : नया मुसलमान अपनी भाषा से शुरू कर सकता है और अरबी बाद में सीख सकता है।

18 अक्टूबर 2026 को 20h58 बजे अपडेट किया गया

📖 3 मिनट पढ़ने का समय

शहादा की इबारत

शहादा (गवाही) वह इबारत है जो इंसान को इस्लाम में दाख़िल करती है। यह तीन लिखावटों में मौजूद है :

أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَٰهَ إِلَّا اللهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللهِ

Phonétique : Ash-hadou an la ilaha illa-Llah, wa ash-hadou anna Mouhammadan rassoulou-Llah.

मतलब : "मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।"

यह गवाही बाद की गढ़ी हुई चीज़ नहीं : क़ुरआन बताता है कि ज्ञान वाले और फ़रिश्ते गवाही देते हैं कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं (क़ुरआन 3:18), और वह पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ख़ुद को हुक्म देता है : "अतः जान लें कि निःसंदेह तथ्य यह है कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं" (क़ुरआन 47:19)। इसकी गवाही देना ईमान के आमाल में सबसे बुलंद है।

शहादा : लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ मअनी

  • Ash-hadou : "मैं गवाही देता हूँ" : दिल की गहराई से और अपनी ज़बान से, यक़ीन के साथ इसका ऐलान करता हूँ।
  • An la ilaha : "कि कोई पूज्य नहीं" : इस बात का इंकार करता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई और चीज़ (पैसा, शख़्स, बुत, शहवतें) इबादत के लायक़ है।
  • Illa-Llah : "अल्लाह के सिवा" : ऐलान करता हूँ कि सिर्फ़ अल्लाह पैदा करने वाला, रोज़ी देने वाला और हर इबादत के लायक़ है। यही तौहीद है, अल्लाह की वहदानीयत।
  • Wa ash-hadou anna Mouhammadan rassoulou-Llah : "और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं" : उनका पैग़ाम, क़ुरआन और उनकी राह (सुन्नत) मान लेता हूँ और उन्हें रहनुमा बनाता हूँ।

शहादा इंकार और इक़रार दोनों है : पहले दिल को अल्लाह के सिवा किसी की इबादत से ख़ाली करते हैं, फिर उसे सिर्फ़ अल्लाह की इबादत और उनके रसूल की पैरवी से भरते हैं।

शहादा की सात शर्तें

इमाम अल-हाज़िमी की क्लासिकी किताब शरूत ला इलाहा इल्लल्लाह ("अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं" की शर्तें) सात शर्तें गिनाती है, जिनके बग़ैर गवाही अपना पूरा असर नहीं करती :

  • इल्म (al-'ilm) : यह जानना कि इन लफ़्ज़ों को कहते वक़्त तुम किस चीज़ का इंकार और किस चीज़ का इक़रार करते हो।
  • यक़ीन (al-yaqin) : ऐसा विश्वास जिसके मुक़ाबले में कोई शक न आए।
  • इख़लास (al-ikhlas) : ऐसी पाक गवाही जिसमें कोई दुनियावी मक़सद न हो।
  • सच्चाई (as-sidq) : ज़बान वही कहे जो दिल मानता हो।
  • मोहब्बत (al-mahabba) : इस गवाही और इसके सारे तक़ाज़ों से मोहब्बत हो।
  • फ़रमानबरदारी (al-inqiyad) : इससे पैदा होने वाले फ़राइज़ मान लेना।
  • क़बूलियत (al-qabul) : घमंड या आदत से इस्लाम की सिखाई हुई चीज़ों का इंकार न करना।

नए मुसलमान के लिए ये शर्तें दाख़िले के इम्तिहान से ज़्यादा एक राह का बयान करती हैं : इस्लाम में आने के वक़्त मौजूद इख़लास से शुरू करके, सीखते और अमल करते हुए इन्हें मज़बूत किया जाता है।

शहादा कैसे पढ़ें ?

  • इख़लास के साथ : दिल में यक़ीन मरकज़ी शर्त है। बग़ैर ईमान के, रट्टे की तरह पढ़ी गई इबारत इंसान को इस्लाम में दाख़िल नहीं करती।
  • समझकर : पढ़ने से पहले ऊपर दिया गया मअनी दोबारा पढ़ लें।
  • बुलंद या धीमी आवाज़ में : दोनों जायज़ हैं। बुलंद आवाज़ में यह लम्हा ज़्यादा अज़मत-मंद होता है और अपनों के सामने गवाही बन सकता है।
  • इक बार काफ़ी है। कोई सुकून-भरा लम्हा चुनें जब कोई तंग न करे।
  • अपनी भाषा या अरबी में : अरबी मंसून है और ऊपर दी गई लफ़्ज़ी आवाज़ की बदौलत पहले ही दिन से सही पढ़ा जा सकता है ; अपनी भाषा का तर्जुमा भी जायज़ रहता है।

शहादा उसी लम्हे क्या बदल देती है

इख़लास के साथ पढ़ते ही आप मुसलमान हैं। पैग़ंबर (उन पर सलाम हो) ने अम्र इब्न अल-आस से फ़रमाया : "क्या तुम नहीं जानते कि इस्लाम अपने से पहले के सब कुछ को मिटा देता है ?" (सहीह मुस्लिम 121)। इस्लाम से पहले के तुम्हारे सारे गुनाह मिटा दिए जाते हैं : तुम साफ़ सफ़हे से शुरू करते हो।

बस सीखना बाक़ी रहता है : मुसलमान बनने का मुकम्ल सफ़र अपनाएँ, शुरुआत इस्लाम में आने के बाद के पहले क़दमों से करें।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न इस्लाम में शहादा

क्या मुझे शहादा अरबी में पढ़नी चाहिए ?

मंसून है, मगर ज़्यादातर उलमा के हुक़्म में जवाज़त की शर्त नहीं। नया मुसलमान अपनी भाषा में गवाही दे सकता है, फिर अरबी इबारत सीख सकता है, जिसका उच्चारण इसी पृष्ठ पर दिया गया है।

कितनी बार पढ़नी चाहिए ?

इक बार, इख़लास के साथ, काफ़ी है। उसके बाद दोहराना, अकेले या लोगों के सामने, एक मंसून ऐलान है, फ़र्ज़ नहीं।

क्या मैं इसे अकेले, बिना किसी के, पढ़ सकता हूँ ?

हाँ। शहादा अल्लाह की तरफ़ की गवाही है : अकेले पढ़ी गई शहादा पूरी तरह जायज़ है।

स्रोत: क़ुरआन 3:18 · क़ुरआन 47:19 · सहीह मुस्लिम 121 · शरूत ला इलाहा इल्लल्लाह (अल-हाज़िमी)

के लिए अन्य चरण मुसलमान कैसे बनें : मुकम्ल गाइड

आगे पढ़ें इस्लाम में शहादा

بسم الله الرحمن الرحيم बुध 9 जुमादा अल-अव्वल
الأربعاء 9 جمادى الأولى
أحدب متزايد बढ़ता हुआ कूबड़ दिन 10.1 / 29.5
रोशनी 77%
5 दिनों में पूर्णिमा
اللهم صل على محمد ऐ अल्लाह, मुहम्मद पर दरूद भेज

إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا

निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो

Al-Ahzab 33:56

पैग़ंबर पर दुरूद